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जिंदगी पर जुए की बिसात

डेविड वाल्श साल 2009 में तब वैश्विक सुर्खियों में छा गया, जब उसने क्रिश्चियन बोल्तांस्की की जिंदगी पर दांव लगाया। बोल्तांस्की एक फ्रांसीसी कलाकार हैं, जिनकी कृतियां अक्सर मौत पर केंद्रित होती हैं। वाल्श अपने देश तस्मानिया में भी एक रहस्यमयी चेहरा है। तस्मानिया श्रीलंका के आकार का एक द्वीप है, जो ऑस्ट्रेलिया महादेश से 150 मील दक्षिण में स्थित है। वहां भी उसके बारे में लोग बहुत कम जानते हैं, सिर्फ यह सनसनीखेज अफवाह फैली हुई है कि उसने जुए के धंधे से अपनी दौलत बनाई है।

बोल्तांस्की के स्टूडियो की, जो पेरिस के बाहर था, रिकॉर्डिंग के अधिकार को वाल्श खरीदने के लिए राजी हो गया। दिन-रात, चौबीसों घंटे की उसकी रिकॉर्डिंग होती है और उसकी सीधी तस्वीरें वाल्श को तस्मानिया भेजी जाती हैं। लेकिन इसका भुगतान एक घिनौने जुए जैसा है। तय रकम को आठ वर्षों के हिसाब से बांटा गया और इसे बोल्तांस्की को उन वर्षों में, उन्हें जिंदा रहने तक मासिक दरमाहे के तौर पर दिया जाता है। अगर बोल्तांस्की, जो 65 साल के हैं, आठ साल से अधिक जीवित रहेंगे, तो वाल्श को वाजिब कीमत से अधिक रकम चुकानी होगी और वह शर्त हार जाएगा। लेकिन यदि बोल्तांस्की आठ साल के अंदर मर जाते हैं, तो वह सारी कलाकृतियां तय कीमत से कम में वाल्श हासिल कर लेगा और उसकी जीत होगी।

वर्ष 2009 में एजेंसी फ्रांस-प्रेस को बोल्तांस्की ने कहा, ‘उसने मुझे यह यकीन दिलाया है कि मैं आठ साल से पहले ही मर जाऊंगा, क्योंकि वह कभी जुए में हारता नहीं है। मैं अपनी सेहत का खयाल नहीं रख पा रहा हूं। लेकिन मैं जीवित रहने की कोशिश कर रहा हूं। उसने यह भी कहा, ‘ऐसा कोई, जो कभी नहीं हारता या यह सोचता है कि कतई नहीं हारेगा, वह जरूर शैतान ही होगा।’ एक दूसरे इंटरव्यू में बोल्तांस्की ने वाल्श को ‘मृत्यु के प्रति मंत्रमुग्ध’ बताया। उन्होंने कहा, ‘अंतत: वह मेरी मौत का सचित्र प्रसारण देखना चाहता है। वह कहता है कि वह लगातार उस पल के बारे में सोच रहा है। वह अपने पास मेरी आखिरी तस्वीर चाहेगा।’

द न्यूयॉर्क टाइम्स ने जब बोल्तांस्की के बारे में वाल्श से पूछा, तो उसने कहा, ‘यह बहुत अच्छा होगा कि वह अपने स्टूडियो में ही आखिरी सांसें गिनें। लेकिन मुझे नहीं लगता कि इसके लिए कोशिश करना एक नैतिक कर्म होगा।’

बोल्तांस्की का शैतान का पूरा वर्णन करना वैसे ही है, जैसे चिमटे से पारे को उठाने की कोशिश की जाए। 51 साल के वाल्श में प्राचीन मिस्र के नौजवान राजा जैसा व्यवहार है और कामकाजी तस्मानियाई तबके की तरह बोलने का लहजा। वह ग्लोनॉर्की में पला-बढ़ा था, जो ऑस्ट्रेलियाई संघ में सबसे गरीब राज्य के सबसे गरीब नगरों में एक है। उसके चांदी जैसे सफेद-चमकीले बाल कभी काफी लंबे होते, तो कभी छोटे। वाल्श या तो धाराप्रवाह बोलता या बिल्कुल चुप रहता है। वह कभी बहुत मधुर होता है, कभी उद्दंड और कभी खामोश रहता है। वह मुंह फेर लेता है और हंसता है और कभी शांत रहता है।

जिस समय में वह एक कलाकार की जिंदगी पर दांव लगा रहा था, उसी समय में वह अपने स्वप्न सरीखे प्रोजेक्ट की शुरुआत भी कर रहा था। यह प्रोजेक्ट था, तस्मानिया में एक निजी कला संग्रहालय बनाना, जो सेक्स और मौत के लिए समर्पित हो। म्यूजियम ऑफ ओल्ड ऐंड न्यू आर्ट (मोना)  जनवरी, 2011 में खुल गया और जल्द ही इसे कुछ लोगों ने संग्रहालय के क्षेत्र में एक नई शुरुआत के तौर पर सराहा, तो अन्य लोगों ने कला की मौत के तौर पर इसका मजाक उड़ाया।

वाल्श चाहता था कि आगंतुक समुद्र या नदी से संग्रहालय की सीढ़ियां चढ़ें, कुछ वैसे ही, जैसे पुराने समय में यूनानी लोग मंदिरों में प्रवेश किया करते थे। लेकिन डेरवंट नदी से-जहां से संग्रहालय को देखने वाले राजधानी होबार्ट की तरफ से नौकाओं से आते-मोना दुनिया के अंत के बाद बने किसी किले जैसा दिखता है, जो विषम चतुर्भुजाकार है। इसके ऊंचे-ऊंचे लौह स्तंभ उसकी क्रंकीट की दीवारों को परस्पर काटते नजर आते थे। छोटे-से प्रायद्वीपीय क्षेत्र में यह चार मंजिला आलीशान भवन न्यूयॉर्क के गुग्नेइनिम संग्रहालय के आकार का लगभग दोगुना है।

संग्रहालय में तस्मानियाई लोगों का प्रवेश निशुल्क है और इसके अलावा, सभी से प्रवेश शुल्क लिया जाता है। आगंतुक एक बड़ी सर्पीली सीढ़ी या शीशे की बनी बेलनाकार लिफ्ट से नीचे पहुंचते हैं, जहां से कई गुफादार गलियारे शुरू होते हैं और उनकी दीवारें मेसोजिक युग के जीवाश्म पत्थर से बनी हैं। ये तमाम गलियारे एक जगह पर जा मिलते, जहां एक शराब घर है। कभी-कभार पीने वालों के लिए यहां से एक रहस्यमयी रात की शुरुआत होती है। वहां मंद रोशनी में कहीं एक पुस्तकालय छिपा हुआ है, तो कहीं सिनेमा-घर, तो कहीं कई सारे प्रदर्शनी स्थल। वहां तीन अलग-अलग दीर्घाएं भी हैं। ये सब अलग-अलग जगहों पर हैं और भिन्न खासियत से पूर्ण है। कुछ भव्य दीवारें सुनहरी थीं। एक दीर्घा सुर्ख लाल मखमल से सजाई गई है। दूसरा कमरा काले रंग से युक्त पानी से भरा हुआ है। टापू तक पहुंचने के लिए पत्थरों पर पांव रख-रखकर लोग इसे पार करते हैं, जो पानी के बीच-बीच में लगाए गए हैं। उस पार दो बड़ी और समान कोठरियां हैं। एक में मिस्र का पुराना ताबूत रखा हुआ है और दूसरी में, डिजिटल एनिमेशन के माध्यम से पहले के ताबूत के रहस्यों का परदा उठाया जाता है और ममी की एक-एक परत हटाकर इंसान की हड्डियों तक की तस्वीरें दिखाई जाती हैं।

ऐसे समय में, मोना पेट्रा के एक खोए शहर और बर्लिन की एक देर रात का एक अपभ्रंश रूप नजर आता है। इससे जुड़ी सभी चीजें भटकाती हैं, मगर फिर भी जानी-पहचानी लगतीं हैं, बढ़ा-चढ़ाकर कही गई बातों से
लेकर बहकी हुई निम्न-स्तरीय बातों तक। अफवाह को इतना तूल मिल चुका है कि लगता है कि क्या संग्रहालय वाकई सुंदर है और अगर है, तो क्या यह सुंदरता महत्व रखती है?

यह होर्हे लुइ बॉर्खेस (एक अर्जेंटाइनी कथाकार) की भूलभुलैया भरी कहानी जैसा है। यह नाइट क्लब जैसा जगमग रहता है। हालांकि, मोना एक सुदूर द्वीप में बना हुआ है, जहां की आबादी 50 लाख है, लेकिन यह 70 लाख से अधिक लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर चुका है। इसे देखने के लिए सबसे पहले तस्मानिया से लोग आए, फिर ऑस्ट्रेलिया से और अब दुनिया भर से लोगों के आने का सिलसिला बढ़ रहा है। प्रसिद्ध हस्तियों, कला-प्रेमियों, अनुयायियों और उत्सुकों का काफिला यहां पहुंच रहा है। दो साल से भी कम समय में मोना तस्मानिया का सबसे बड़ा पर्यटन केंद्र बन गया है और तस्मानिया की मुरझाई हुई अर्थव्यवस्था को इसने गति दे दी है। लोनली प्लैनेट ने साल 2013 में यात्रा के लिहाज से, काफी हद तक मोना के कारण, हॉबर्ट को दुनिया के शीर्ष दस शहरों में चुना।

वाल्श इस मामले में बेहद स्पष्ट था कि उसका संग्रहालय क्या नहीं है। जैसे, एक रईस द्वारा अपने समुदाय को आभार जताने वाला यह काम नहीं था। यह एक कालजयी प्रयास भी नहीं था, क्योंकि वाल्श यह खुलेआम स्वीकारता है कि उसका संग्रह अगले दशक में ही बेकार मान लिया जाएगा।
(अनुवाद : प्रवीण प्रभाकर)

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