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साहित्य की थाती

वर्तमान साहित्य का प्रकाशन 1983 में शुरू हुआ था। प्रस्तुत अंक में विभिन्न ऐतिहासिक-समसामयिक महत्व की सामग्री एकत्र की गई है। इस अंक से पत्रिका के साथ रवींद्र कालिया और भारत भारद्वाज जैसे सुपरिचित साहित्यकार भी जुड़ गए हैं और उनके योगदान से पत्रिका ने नया कलेवर धारण किया है। इसके इतिहास और संस्कृति खंड में जवाहरलाल नेहरू, राममनोहर लोहिया, अमरनाथ झा, प्रो. रामशरण शर्मा आदि के लेख हैं। अभिलेख खंड में रामचरितमानस के रचनाक्रम पर कामिल बुल्के का और साहित्य में अश्लीलता के सवाल पर विजयदेव नारायण साही का लेख है। संवाद खंड में मिखाइल गोर्बाचेव से माक्र्वेज की और जॉर्ज लुकाच से कथाकार-चित्रकार रामकुमार की बातचीत है। वर्तमान साहित्य, संपादक : विभूति नारायण राय, नई दिल्ली, मूल्य : 50 रु.

आज के जमाने में चिट्ठी लिखना
युवा कथाकार आशुतोष का यह पहला कहानी संग्रह है। भारतीय ज्ञानपीठ के नवलेखन प्रसार से अनुशंसित इस संग्रह में छह कहानियां हैं, जिनका ठेठपन खासा प्रभावशाली है। दरअसल, आशुतोष के पास कहानी कहने की कला है - सधी हुई और बांकपन से भरी हुई। जिस समय का बयान आशुतोष अपनी कहानियों से करते हैं, वह हमारे आसपास का ही है और खासा त्रासद है। इन कहानियों में तरह-तरह के पाटों के बीच पिसती-टूटती, फिर भी आगे बढ़ निकलती जिंदगी के चित्र हैं। एक कहानी में उन्होंने लिखा है, राम बहोरन की समस्या है कि वह जीते हैं इक्कीसवीं सदी में और समस्या पाले हुए हैं उन्नीसवीं सदी की। पिता की आंखों की चमक, मां की ममता, बहन की शादी, यह सब इक्कीसवीं सदी की ‘ग्लोबल विलेज’ की नहीं, पुराने दिनों के गांव-गंवार की बातें हैं। मरें तो उम्र भर के लिए, आशुतोष, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली-3, मू. 160 रु.

कला और समाज
कविता का यह दूसरा उपन्यास है। बदलते समय में पारंपरिक कलाओं की सामाजिक उपयोगिता या प्रासंगिकता अस्थिर होती गई है। ज्यादातर मामलों में तो कथित वैश्विक-आधुनिक दौर में ये कलाएं तिरोहित हो जाने या निरी ऐतिहासिक  रह जाने को विवश हैं। जनजीवन के साथ दैनंदिन का इनका पारस्परिक संबंध संकटग्रस्त होता गया है। ऐसी स्थिति में इन कलाओं से जुड़े कलाकारों का जीवन भी मुश्किल में पड़ गया है। इस उपन्यास में बहुरूपिया कलाकारों के जीवन संघर्ष के बहाने कविता ने उपरोक्त तथ्यों को रेखांकित किया है। इसमें एक कला-परंपरा के छीजते जाने के दुखांत के साथ स्वतंत्रता संग्राम में उसके कलाकारों की योगदान की गाथा भी दर्ज है। ये दिये रात की जरूरत थे, कविता, आधार प्रकाशन, पंचकूला (हरियाणा), मू. 250 रु.

साहित्य-विभूति प्रेमघन
प्रेमघन अर्थात उपाध्याय पंडित बदरीनारायण चौधरी (1855-1923) भारतेंदु युग के महत्वपूर्ण साहित्यकार हैं। कवि, नाटककार, निबंधकार, साहित्यिक पत्रकार और समाजसेवी। इन्होंने कविताएं प्राय: ब्रजभाषा में लिखीं, लेकिन खड़ी बोली की कविता को आगे बढ़ाने में भी योगदान दिया। वास्तव में हिंदी साहित्य व देवनागरी लिपि के प्रचार-प्रसार में ‘आनंद कादंबिनी’ और ‘नागरी नीरव’ नामक दो पत्रिकाओं का संपादन करके उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रेमघन, रामनिरंजन परिमलेंदु, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, 50 रु.
धर्मेंद्र सुशांत

 

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