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अपने गुरु का पुण्य स्मरण

वरिष्ठ लेखक विश्वनाथ त्रिपाठी को व्यास सम्मान से विभूषित किया गया है। त्रिपाठी जी के लिए यह ज्यादा खुशी की बात है कि यह सम्मान उन्हें अपने गुरु हजारी प्रसाद द्विवेदी पर लिखी किताब ‘व्योमकेश दरवेश’ पर मिला है। प्रस्तुत है इसी पुस्तक का एक अंश

उनके व्यवहार से कोई आहत हो, यह उन्हें सह्य नहीं था। वैसे जीवन-जगत में हमेशा इससे बचे रहना असंभव है। लेकिन गुरुदेव का यह स्वभाव था। वे सबको, विशेष रूप से आस-पास के लोगों को अपने व्यवहार से संतुष्ट रखते थे। उनके व्यवहार से किसी को कोई दुख पहुंचे तो वे अपराध-बोध से बहुत पीड़ित होते थे। प्राय: कहते- तुम लोगों को क्या पता। कई अनुचित काम करने पड़ते हैं। बाद में यह सोचकर कि गुरुदेव रवीन्द्रनाथ के साथ रहा हूं और ऐसा काम करना पड़ा- बहुत क्लेश पहुंचता है। फिर ठठाकर हंसते - यह हंसी पीड़ा-असहायता की होती। उनका अट्टहास हमेशा उल्लास का नहीं होता था। प्राय: नहीं होता था - जीवन-जगत की विसंगति-ऐब्सर्डिटी-बोध उनके अट्टहास का स्नोत था। रात को वे मेरे निवास पर रुके। वे नैनीताल भी आने के लिए कहते थे। जब मैं वहां डी.एस.बी. गवर्नमेंट कॉलेज में लगभग एक वर्ष के लिए अध्यापक था लेकिन आए नहीं। संकोच किया होगा। जाने से दौड़-धूप करेगा। यह उसके बस का नहीं है, परेशान होगा। नहीं आए। खैर पंडितजी रात को छत पर सोए। उन दिनों 1970 तक दिल्ली के मॉडल टाउन जैसे इलाकों की रातें ठंडी हो जाती थीं। गर्मी में भी मच्छर नहीं लगते थे। पंडितजी की चारपाई के पास मेरी भी चारपाई थी। रात को करीब दो बजे मुझे पैरों के तलवे में गुदगुदी महसूस हुई। उठा तो देखा पंडितजी खड़े हैं- फुसफुसाते हुए पूछा- ‘छत पर कोई टायलेट है?’ टायलेट था।

सोते हुए आदमी को जगाने का यह उनका तरीका था। मैं उनका ऐसा शिष्य था जिसे उन्होंने विद्या ही नहीं दी थी, खाने-पीने का इंतजाम भी किया था। मुझे नैनीताल और दिल्ली में नौकरी उन्हीं के कहने से मिली थी। मुझ तक को उन्होंने जोर से बोलकर नहीं जगाया। कच्ची नींद में जगाने से सोने वाले को तकलीफ होती है। यह उनका सहज जीवन-व्यापार था। इसमें कोई आरोपित भद्रता, बड़प्पन या परोपकार का भाव नहीं था। पंडितजी का पारिवारिक जीवन सुखी था। वे अपने परिवार को जनसंकुल कहते थे। परिवार उनके भाव-बोध में मूल्यपरक विचार था। एक बार किसी पत्रिका (शायद कादम्बिनी) ने अनेक प्रख्यात लेखकों से प्रश्न पूछा- आपको पता चले कि दुनिया कुछ ही समय में नष्ट हो जाने वाली है तो आप क्या करेंगे? लोगों ने लम्बे-चौड़े गंभीर दार्शनिक उत्तर दिए थे। पंडितजी ने एकाध पंक्तियों में उत्तर दिया था-
‘अपने परिवार को बांहों में बटोरकर घर में बैठ जाऊंगा।’
वे अवसरोचित मर्यादा और शिष्टता का बहुत ध्यान रखते थे। डॉ. देवीशंकर अवस्थी की मृत्यु दुर्घटना में हुई। चंडीगढ़ से मुझे चिट्ठी लिखी- ‘भगवान करे यह समाचार झूठा हो।’ माताजी के साथ अवस्थी जी की पत्नी को दिलासा देने, उनके निवास की ओर चले। माताजी ने पान खा रखा था। चलने के पहले पंडितजी ने खुद अपना मुंह धोया- उन्होंने भी पान खा रखा था। माताजी से भी धीमे से कहा- ‘मुंह धो लो।’ बात बहुत छोटी-सी है, लेकिन अवसर की संवेदनशीलता को देखते हुए, महत्वपूर्ण है। डॉ. देवीशंकर अवस्थी ने पंडितजी के साथ ही पीएचडी. का शोध-प्रबंध लिखा था। कुछ ही दिनों पूर्व द्विवेदी जी के उपन्यास ‘चारुचन्द्रलेख’ की बिना किसी रू-रियात के निर्मम आलोचना की थी। ‘टूटा हुआ दर्पण’ कहा था। पंडितजी का परिवार संरक्षणशील था। उन्होंने मंझली बेटी तितिल (मालती) का विवाह कान्यकुब्ज ब्राह्मण परिवार में किया- प्रोफेसर विनयमोहन शर्मा के पुत्र शिरीष तिवारी से। जेष्ठ पुत्री पुतुल (इन्दुमती) का विवाह डॉ. दशरथ ओझा के भाई पं. जीवनाथ ओझा के पुत्र कैलाशपति से। और छोटी कन्या मुन्नू (भारती) का विवाह जटाशंकर मिश्र से हुआ। ये दोनों सरयूपारीय ब्राह्मण परिवार से थे।
दो पुत्रों बबुआ (जगदीश द्विवेदी) और लाल जी का विवाह भी सरयूपारीय ब्राह्मण परिवार में हुआ। सबसे छोटे पुत्र पुट्ट (आनन्द) का विवाह त्यागी परिवार में हुआ।

मामला फंसा, तीसरे पुत्र गिप्पी (सिद्धार्थ) के विवाह में। आयुष्मान ने प्रसिद्ध अंग्रेजी पत्रकार पैट्रियाट के सम्पादक श्री वी. डी. चोपड़ा की पुत्री से प्रेम विवाह का प्रस्ताव रखा। चोपड़ा जी पत्रकार जगत में प्रसिद्ध तो थे, वामपंथी विचारकों में भी प्रसिद्ध थे। पंडितजी जनम-भर जात-पांत का विरोध करते रहे थे। उनके भाइयों के परिवार, सगे-संबंधी इसे स्वीकार नहीं कर सकते थे। पंडितजी ने अपने संस्कारों को दबाकर अपने विचारों का कहना माना। विवाह हंसी-खुशी से सम्पन्न हुआ। लेकिन इस विवाद में उनके संस्कारी मन को सगे-संबंधियों ने आहत किया। मैंने पंडितजी की ही किसी संतान से सुना है कि विवाह के उपरान्त कुछ रक्त-संबंधियों ने पंडितजी के यहां खाना-पीना छोड़ दिया। पंडितजी को आहत करने के लिए इतना बहुत था। आत्मीय संबंधों के विषय में वे अतीव संवेदनशील थे।

अपने अनुज रमानाथ द्विवेदी से बातचीत करते समय कोई समझता कि दो मित्रों में बातचीत हो रही है। लेकिन रमानाथ जी कर्मकांडी और छूत-अछूत का विचार करने में अतीव कठोर थे। संस्कारों से जूझने के लिए पंडितजी को मानसिक सहारे की जरूरत महसूस हुई होगी। विचारों में प्रगतिशील होना एक बात है, किन्तु उसे व्यवहार में उतारना बिल्कुल अलग बात है। मैं पंडितजी की तीनों लड़कियों के विवाह में मौजूद था। पुत्रों की शादी में शामिल होना जरूरी नहीं समझा था। लड़की की शादी में काम-काज की जरूरत पड़ती है। विवाह में ज्यादा जोर कन्या पक्ष पर पड़ता है। हालांकि पंडितजी की पुत्रियों के विवाह में कामकाज देखने वालों की कमी नहीं थी। प्रत्येक पुत्री के विवाह में हिन्दी के दिग्गज एकत्र होते थे। लेकिन गिप्पी के विवाह में अन्तर्जातीय विवाह करके पंडितजी प्रगतिशील होने का व्यावहारिक परिचय दे रहे थे।

उनके शिष्यों में डॉ. नामवर सिंह सबसे विख्यात प्रगतिशील थे। उस समय तक मैं भी प्रगतिशील कहलाने लगा था। लाल जी ने मुझे पत्र लिखा कि बाबू जी की इच्छा है कि आप विवाह में शामिल हों। लाल जी का व्यक्तित्व हम लोगों के नजदीक ऐसा रहा है कि उनकी रुलाई हंसी वाली होती है, हंसी रुलाई वाली। उनकी कौन-सी गंभीर बात मजाक और कौन मजाक गंभीर इसका फैसला दुष्कर है। मैंने सोचा लालजी ने ऐसे ही लिख दिया होगा। विवाह हो गया। पंडितजी दिल्ली आए। मैं मिलने गया तो थोड़ा देर बाद बोले- तुम लोग प्रगतिशील बनते हो। प्रगतिशील विवाह में आए नहीं। मैंने हंसी-हंसी में कहा- वाह पंडितजी आप प्रगतिशील हैं? अन्तर्जातीय विवाह कर लिया तो हम लोगों से अधिक प्रगतिशील हो गए? पंडितजी चुप हो गए। अगली बार आए तब भी उन्होंने वही बात कही- ‘तुम सब नकली प्रगतिशील हो। गिप्पी के विवाह तक में नहीं आए।’ मैंने फिर हंसी में जवाब दिया- ‘बहुत बड़ी प्रगतिशीलता कर दी आपने।’
इस बार वे चुप नहीं हुए-
‘तुम नहीं आए नामवर भी नहीं आया।’ मैं चौंक पड़ा, स्वर भारी था। चेहरा थरथरा रहा था। मैं इस भावावेग के सामने आत्मग्लानि से भर उठा। इतना जानता तो विवाह में सर के बल चलकर पहुंचता। पंडितजी की वह भावविह्वल वाणी और मुद्रा अब भी नहीं भूली है। उनके सगे-संबंधियों ने जो-जो व्यवहार किया था, उनके संस्कारों ने ही उन्हें मथा होगा। उसकी थोड़ी-बहुत रोक हम लोग कर सकते थे। उन्हें भी सहारे की जरूरत पड़ती थी। यह सुनकर कि वे घोर कर्मकांडी उच्चकुल के ब्राह्मण होकर भी पुत्र का विवाह अन्तर्जातीय कर रहे हैं। चोपड़ा महोदय को दिखाते कि हमारे शिष्य कम्युनिस्ट भी हैं, उन्हें थोड़ा-बहुत सहारा मिलता। पंडितजी को पारंपरिक पारिवारिक कट्टरपन से अकेले जूझना पड़ा। हम जो वामपंथी कहलाते थे, बात-बात में सोवियत संघ, कम्युनिस्ट पार्टी, वर्णाश्रम व्यवस्था आदि पर उनसे बहस करते थे, उनके साथ नहीं हुए। यह सब उन्हें खल गया होगा। वे माख गए। हम उनसे सहारा लेना ही जानते थे। उन्हें हम सहारा दे सकते हैं, यह कल्पनातीत था। पं. जी के सम्पर्क में मैं 1953 ई. से 1979 ई. तक रहा। उन्हें कई रूपों में देखने का सौभाग्य मुझे मिला। छोटे लोगों से, बच्चों, शिष्यों, नौकर-चाकरों, पड़ोसियों से दोष छिपा नहीं रह सकता।

मैंने उनकी आंखों में ओछेपन की लहर कभी नहीं देखी। दूसरों- शत्रु या अपकारी निन्दक की भी अशुभ-कामना करते हुए या उसका बुरा चाहते हुए मैंने कभी नहीं जाना-सुना। लड़कियां, महिलाएं उनसे आत्मीय अकुंठ होकर बात करती थीं। उनकी आंखों में वासना की लहर कभी नहीं देखी। उनके पाठक जानते हैं कि वे नारी-सौंदर्य से परम प्रभावित लेखक-चिंतक हैं। व्यक्ति रूप में भी सौंदर्य से प्रभावित होने की उनमें अतीव क्षमता थी। वे रम्भा, उर्वशी के माथे पर हाथ रखकर आशीर्वाद दे सकते थे। महिलाएं उन पर बहुत विश्वास करती थीं। वे उनसे अपनी बहुत बातें, समस्याएं बतातीं। वे धैर्यपूर्वक सुनते और परामर्श देते। सुन्दर महिलाओं से आंखें चुराकर, पवित्रता की रक्षा के लिए, दूसरी तरफ देखते हुए भी उन्हें कभी नहीं पाया। वे गुरु, बाबा, पिता, भाई के समान उनसे व्यवहार करते। निश्चय ही जीवन में कभी उनका साक्षात्कार किसी अपूर्व सुन्दर व्यक्तित्व से हुआ होगा। जिसने उनके हृदय को सौंदर्य के उदात्ततम अनुभव से आपूरित कर दिया होगा।

सुन्दरी नारी-पात्रों के लिए उनके उपन्यासों में पार्वती की उपमा प्राय: आती है। जीवन में भी ऐसा था। अपनी बड़ी लड़की पुतुल (इन्दुमती) के बारे में कहते-कहते क्या कालिदास की पंक्ति पढ़ते, जिसमें कहा गया है कि हिमाचल का कुल पार्वती से पवित्र हुआ-
प्रभामहत्या शिखयेव दीपस्त्रिमार्गयेव त्रिदिवस्य मार्ग:
संस्कारवत्येव गिरा मनीषी तया स पूतश्च विभूषितश्च
राजभाषा आयोग के सदस्य के रूप में द्विवेदी जी कई स्थानों पर गए। कश्मीर भी। कश्मीर की प्राकृतिक शोभा से तो प्रभावित हुए ही वहां के नारी-सौंदर्य से भी अत्यधिक प्रभावित हुए। बहुत दिनों तक कश्मीर-सौंदर्य की चर्चा करते।
‘लड़कियां इतनी सुन्दर, इतनी सुन्दर कि क्या कहूं।’ हम लोग सांस रोककर सोचते ‘गुरु जी का यह रूप पहले नहीं देखा था- लड़कियों की सुन्दरता की इतनी तारीफ करते।’ ‘इतनी सुन्दर किशोरियां-इतनी सुन्दर! साक्षात् पार्वती।’ हम लोग अपने मानसिक ओछेपन से उबरकर ऊपर उठ पाते।

हमारा गुरु है कि उसे सुन्दर लड़कियां देखकर पार्वती याद आती हैं। भट्टिनी को पं. जी ने कहां देखा होगा? नामवर जी की अध्यक्षता में हमारी जो चिन्तन-गोष्ठी होती उसमें कुछ पता नहीं चल पाता। नामवर जी अनुमान करते कोई ईरान की छात्र न हो जो शान्तिनिकेतन में रही हो। उपन्यास के अंत में आचार्य भवरुपाद बाण के पुरुषपुर जाने की आज्ञा देते हैं। भट्टिनी से बाण का साथ छूट जाता है। ‘लेकिन फिर क्या मिलना होगा?’ नामवर जी कहते-भवरुपाद गुरुदेव रवीन्द्र न हों। हम सब जानते कि अनुमान अनुमान ही है। द्विवेदी जी से कौन पूछता? वे कहते थे- रचना में सर्वत्र रचनाकार के जीवन को ढूंढ़ना भोंडा प्रयास है। लेकिन सत्त्वस्थ कर देने वाले लोकोत्तर सौंदर्य के अधिष्ठान का कोई लौकिक आधार तो रहा होगा।

(राजकमल प्रकाशन से साभार)

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