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मति अनुरूप राम गुण गायन

रामायण भारत की सर्वाधिक समादृत कृतियों में से एक है। इसकी लोकप्रियता असंदिग्ध है। विष्णु के अवतार राम अनेक लोगों की आस्था के केंद्र हैं। इसका एक प्रभाव यह हुआ है कि रामकथा के प्रचलित रूपों में मौजूद विविधता की उपेक्षा कर उसका मानकीकरण करने की कोशिश की गई है। यह प्रयास आस्था से अधिक राजनीतिक मसला रहा है। इसके विपरीत रामकथा को एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक विरासत मानते हुए उसके विभिन्न पहलुओं को परखने और व्याख्यायित करने की कोशिश की गई है। राम वर्मा की पुस्तक इसी कोशिश का उल्लेखनीय उदाहरण है। वर्मा ने इस पुस्तक में वाल्मीकि रामायण का आधार लेकर रामकथा की सरस भावसृष्टि की है। उन्होंने रामकथा के उद्भव, विकास और ऐतिहासिकता से जुड़े शोध-अध्ययनों का भी जिक्र किया है।
ईश्वरत्व से पूर्व सत्य स्वरूप रामायण, राम वर्मा, रूपा पब्लिकेशंस, नई दिल्ली-2, मूल्य: 1500 रु.

आस्था का दर्शन

यह पुस्तक करोड़ों लोगों की आस्था के केंद्र, तिरुमला मंदिर के श्री वेंकटेश्वर पर केंद्रित है, जो जनता में भगवान तिरुपति के रूप में विख्यात हैं। श्री वेंकटेश्वर विष्णु से अभिन्न हैं और तिरुमला में उनका अर्चावतार प्रतिष्ठित है ताकि लोग भौतिक रूप से भी अपने प्रिय भगवान का दर्शन और पूजन-अर्चन कर सकें। इस संदर्भ में यह पुस्तक तिरुमला मंदिर और श्री वेंकटेश्वर संबंधी पौराणिक कथाओं, ऐतिहासिक वृत्तांतों और लोकप्रिय मान्यताओं को सविस्तार प्रस्तुत करती है। यह भगवान की अवधारणा और तीर्थयात्रा के अर्थ की व्याख्या करने के साथ तिरुमला मंदिर के विधान और पूजा के मंत्रों के बारे में भी बतलाती है। इसमें परंपरागत विश्वास के आधारों को स्पष्ट करने की कोशिश है और प्राचीन धार्मिक-आध्यात्मिक मान्यताओं की सार्थकता को आधुनिक जीवन संदर्भो में देखा गया है।
तिरुपति: एक जीवन-दर्शन, कोटा नीलिमा, अनुवाद: रचना भोला ‘यामिनी’, रैंडम हाउस इंडिया, मूल्य:195 रु.

कितने कितने सवाल

अब्दुल बिस्मिल्लाह की कहानियों के बगैर हिन्दी कहानी को खासकर सामाजिक परिप्रेक्ष्य में ठीक से देख पाना मुश्किल होगा। उनकी ज्यादातर कहानियां हमारे समाज के निचले और मध्यवर्गीय तबके के जीवन संघर्ष को प्रस्तुत करती हैं। वह साधारण लोगों की जद्दोजहद, मामूली इच्छाओं को पूरा करने के लिए उनकी हाड़तोड़ मेहनत और विफलताओं को बेहद आत्मीयता से चित्रित करते हैं। हैरत नहीं कि यहां कुलीनता का वैभव अनुपस्थित है। वास्तव में उनकी कहानियां एक माने में कुलीनता के वैभव की आलोचना हैं, जो साधारण के संघर्ष की महत्ता को रेखांकित करती हैं। बिस्मिल्लाह के अब तक सात कहानी संग्रह छप चुके हैं। उनका नए कहानी संग्रह में शुरुआती चार संग्रहों की कहानियां संकलित हैं।

ताकि सनद रहे, अब्दुल बिस्मिल्लाह, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली-2, मूल्य: 700 रु.

स्त्री की संघर्षगाथा

पटना से डॉक्टर नीलिमा सिंह के संपादन में निकलने वाली पत्रिका ‘निरंजना’ का सद्य प्रकाशित विशेषांक बिहार के बहाने हमारे समाज में स्त्री की स्थिति की पड़ताल करने का सार्थक प्रयास है। बिहार के नाम पर लगा पिछड़ापन का ठप्पा जितना पुराना है, उतना ही पुराना यह सच भी है कि वहां राजनीतिक-सामाजिक बदलाव के आंदोलन भी हमेशा चलते रहे हैं। यह विशेषता इस विशेषांक में भी देखी जा सकती है। इसमें पितृसत्ता के अत्याचारों तले दबी स्त्रियों की मार्मिक गाथा दी गई है तो उन स्त्रियों का भी उल्लेख है जिन्होंने प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अपने और अपनी तरह की तमाम दूसरी स्त्रियों के अधिकार और आजादी के लिए संघर्ष किया। मानभूम के जमींदार घर की औरतें और पटना में 1853 में जन्मी रशीदुन्निसा ऐसी ही दो उदाहरण हैं, जिनका इसमें जिक्र है। बिहार में स्त्री मताधिकार का दस्तावेज भी आंखें खोलने वाला है।
निरंजना, विशेषांक संपादक: अरुण नारायण, पटना, मूल्य: 100 रु.

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