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अबाबील

यह वर्ष देश के तरक्की पसंद लेखकों में से एक ख्वाजा अहमद अब्बास का जन्मशती वर्ष है। प्रगतिशील धड़े के लेखकों की फेहरिस्त में ख्वाजा अहमद अब्बास का नाम बहुत अदब से लिया जाता है। बतौर पत्रकार, उपन्यासकार, पटकथा लेखक और फिल्मकार अब्बास साहब ने बहुत काम किया और उनका रचनाकार उर्दू, हिन्दी व अंग्रेजी भाषाओं में एक समान तरीके से खुद को अभिव्यक्त करता था। ख्वाजा अहमद अब्बास ने उस समय लिखना शुरू किया जब देश गुलाम था और तरक्कीपसंद शायर व लेखक एक मंच पर जुटना शुरू हुए थे, जिसकी शुरुआत में ‘इप्टा’ की स्थापना एक महत्वपूर्ण बिंदु थी। हालांकि अब्बास के पिता चाहते थे कि वह वकील बनें और उन्होंने वकालत पास भी की, लेकिन एक ही शर्त के साथ कि वह वकील नहीं, बल्कि पत्रकार बनेंगे। 1935 में अब्बास ने अपने पत्रकारीय जीवन की शुरुआत की थी, जो भूमिका उन्होंने ताउम्र निभाई। ‘बॉम्बे क्रॉनिकल’ में उस वर्ष शुरू हुआ उनका स्तंभ ‘लास्ट पेज’ (जो बाद में ब्लिट्ज में छपने लगा) 1987 में उनकी मृत्यु तक चला था। अब्बास के व्यक्तित्व के कई पहलू थे। वे पत्रकार, लेखक, सामाजिक व राजनीतिक टिप्पणीकार और फिल्मकार थे। उन्होंने एक बार लिखा था, ‘उपन्यासकार समझते हैं कि मैं सिर्फ एक लघुकथा लेखक हूं, जबकि कहानियां लिखने वाले मुझे एक पत्रकार से अधिक कुछ नहीं समझते। और इन सबका कहना है कि मैं एक खराब फिल्मकार से अधिक और कुछ नहीं हूं।’ दरअसल, ख्वाजा अहमद अब्बास सचमुच एक बहुमुखी व्यक्तित्व थे। यह सच उनकी लिखी हुई किताबों के अलावा, उनके द्वारा लिखी और बनाई गई फिल्मों से बार-बार जाहिर होता है। ‘इप्टा’ द्वारा बनाई गई पहली फिल्म ‘धरती के लाल’ उन्होंने ही निर्देशित की थी, वहीं चेतन आनंद की कान्स फिल्म समारोह में पुरस्कृत फिल्म ‘नीचा नगर’ के वह लेखक थे। देश की पहली विदेशी सह-निर्मिति ‘परदेसी’ (रूस के साथ) के भी वह सह-निर्देशक थे। राज कपूर की ‘आवारा’ से लेकर ‘हिना’ तक फिल्मों के भी लेखक थे। ख्वाजा अहमद अब्बास के प्रपितामह ख्वाजा अल्ताफ हुसैन हाली खुद एक बड़े शायर और मिर्जा गालिब के मित्र और शिष्य रहे थे। उनके पितामह ख्वाजा गुलाम अब्बास 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख सेनानियों में से एक थे और वह पानीपत के पहले क्रांतिकारी थे, जिन्हें तत्कालीन अंग्रेज सरकार ने तोप के मुंह से बांधकर शहीद किया था। यह सच है कि अब्बास की कई कहानियां विवादों की शिकार हुई थीं। ‘एक इनसान की मौत’ और ‘अबाबील’ के प्रकाशन हर बार विवादों के घेरे में रहे, जिनके कारण अब्बास को अदालतों के चक्कर भी काटने पड़े थे, लेकिन उनका कहना था कि वह किसी राजनीतिक विचारधारा से प्रेरित होकर नहीं, बल्कि इनसान को इनसान की तरह देखकर लिखते और संबंध गांठते हैं। प्रस्तुत कहानी ‘अबाबील’ उनके इसी सच का पुख्ता प्रमाण है।
(कहानी अबाबील ‘ख्वाजा अहमद और उनकी श्रेष्ठ कहानियां’, इन्द्रप्रस्थ प्रकाशन से साभार)



उसका नाम तो रहीम खां था मगर उस जैसा जालिम भी शायद ही कोई हो। गांव भर उसके नाम से कांपता था। न आदमी पर तरस खाए न जानवर पर। एक दिन रामू लोहार के बच्चे ने उसके बैल की पूंछ में कांटे बांध दिए तो मारते-मारते उसका बुरा हाल कर दिया था। अगले दिन जिलादार की घोड़ी उसके खेत में घुस आई तो लाठी लेकर इतना मारा कि लहू-लुहान कर दिया। लोग कहते थे कि कमबख्त को खुदा का खौफ भी तो नहीं। मासूम बच्चों और बे-जवान जानवरों तक को माफ नहीं करता। यह जरूर जहन्नुम की आग में जलेगा। मगर यह सब उसकी पीठ के पीछे कहा जाता था। उसके सामने किसी की हिम्मत जबान चलाने की न होती थी। एक दिन बुदूं ने कह दिया- ‘‘अरे भाई रहीम खां तू क्यों बच्चों को मारता है’’- बस उस गरीब की यह दुरगत बनाई कि उस दिन से लोगों ने उससे बात करनी छोड़ दी कि मालूम नहीं किस बात पर बिगड़ जाए। कुछ लोगों का खयाल था कि उसका दिमाग खराब हो गया है, उसको पागलखाने भेजना चाहिए। कोई कहता था कि अब किसी को मारे तो थाने में रपट दिलवा दो। मगर किसकी मजाल थी कि उसके खिलाफ गवाही देकर उससे दुश्मनी मोल लेता।

गांव भर ने उससे बात करनी छोड़ दी मगर उस पर कोई प्रभाव न पड़ा। सुबह सवेरे वह हल कांधे पर धरे अपने खेतों की तरफ जाता दिखाई देता था। रास्ते में किसी से न बोलता। खेतों में जाकर बैलों से आदमियों की तरह बातें करता। उसने दोनों के नाम रख दिए थे। एक को कहता था-नत्थू, दूसरे को छिद्दू.. हल चलाते हुए बोलता— ‘क्यों बे नत्थू तू सीधा नहीं चलता। यह खेत आज तेरा बाप पूरा करेगा? और अबे छिद्दू तेरी भी क्या शामत आई है?’
और फिर उन गरीबों की शामत आ जाती। सूत की रस्सी की मार से दोनों बैलों की पीठ पर जख्म पड़ गए थे।
शाम को घर आता तो अपनी बीवी और बच्चों पर गुस्सा उतारता। दाल या साग में नमक कम है, बीवी को उधेड़ डाला। कोई बच्चा शरारत कर रहा है उसको उल्टा लटका कर बैलों वाली रस्सी से मारते-मारते बेहोश कर दिया। ग़रज़ हर रोज एक आफत मची रहती। आसपास के झोंपड़े वाले रोज रात को रहीम खां की गालियों और उसके बीवी बच्चों के मार खाने और रोने की आवाज सुनते, मगर बेचारे क्या कर सकते थे। अगर कोई मना करने जाए तो वह भी मार खाए। मार खाते-खाते बीवी गरीब तो अधमुई हो गई थी। चालीस बरस की उम्र में साठ साल की मालूम होती थी। बच्चे जब छोटे थे तो पिटते रहे। बड़ा जब बारह बरस का हुआ तो एक बार मार खाकर जो भागा तो वापस नहीं लौटा। निकट के गांव में रिश्ते के एक चच्चा रहते थे, उन्होंने अपने पास रख लिया।

बीवी ने एक दिन डरते-डरते कहा- ‘बिलासपुर की तरफ जाना तो जरा नूरू को भी लेते आना।’ फिर क्या था, आग-बबूला हो गया- ‘मैं उस बदमाश को लेने जाऊं, अब वह खुद भी आया तो टांगें चीरकर फैंक दूंगा।’
वह बदमाश क्यों मौत के मुंह में आने लगा था। दो-तीन साल बाद छोटा लड़का भी भाग गया और भाई के पास रहने लगा तो बस बीवी ही रह गई। वह गरीब तो इतनी पिट चुकी थी कि उससे भी न रहा गया और अवसर पाकर, जब रहीम खां खेत पर गया हुआ था, वह अपने भाई को बुलाकर, उसके साथ अपने मायके चली गई। रहीम ने खामोशी से बात सुनी और बैल बांधने चला गया। उसको यकीन था कि उसकी बीवी कभी नहीं आएगी। अहाते में बैल बांधकर झोंपड़े के अंदर गया तो एक बिल्ली मियाओ-मियाओ कर रही थी। कोई और नजर न आया तो उसकी ही दुम पकड़कर दरवाजे से बाहर फैंक दिया। चूल्हे को जाकर देखा तो ठंडा पड़ गया। आग जलाकर रोटी कौन डालता। बगैर खाए-पिए ही पड़कर सो गया। अगले दिन रहीम खां जब सोकर उठा तो दिन चढ़ चुका था। आज खेत पर जाने की जल्दी न थी। बकरियों का दूध दुहकर पिया और हुक्का भरकर पलंग पर लेट गया। अब झोंपड़े में धूप भर आई थी। एक कोने में देखा तो जाले लगे हुए थे। सोचा कि सफाई ही कर डालूं।

एक बांस में कपड़ा बांधकर जाले उतार रहा था कि खपरैल में अबाबीलों का एक घौंसला नजर आया। दो अबाबीलें कभी अंदर जाती थीं, कभी बाहर आती थीं। पहले उसने इरादा किया कि बांस से घौंसला तोड़ डाले। फिर मालूम नहीं क्या सोचा एक सीढ़ी लाकर उस पर चढ़ा और घौंसले में झांककर देखा अंदर दो लाल बोटी के बच्चे पड़े चूं-चूं कर रहे थे और उनके मां-बाप अपनी औलाद की हिफाजत के लिए उसके सिर पर मंडला रहे थे। घौंसले की तरफ उसने हाथ बढ़ाया ही था कि मादा अबाबील ने चोंच से उस पर हमला कर दिया- ‘अरी आंख फोड़ेगी?’  उसने अपना भयानक कहकहा भरकर कहा और सीढ़ी से उतर आया। अबाबीलों का घौंसला सुरक्षित रहा। अगले दिन उसने खेत पर जाना शुरू कर दिया। गांव वालों में अब कोई उससे बात नहीं करता था। दिन भर हल चलाता, पानी देता या खेती काटता लेकिन शाम सूरज छिपने से पहले ही घर आ जाता। हुक्का भरकर पलंग पर लेटकर अबाबीलों के घौंसले की तरफ देखता रहता। अब दोनों बच्चे उड़ने के काबिल हो रहे थे। उसने दोनों बच्चों के नाम अपने बच्चों के नाम पर नूरू और बुंदू रख दिए थे। अब दुनिया में उसके दोस्त-यार अबाबील ही रह गए थे। लोगों को हैरानी जरूर थी कि मुद्दत से किसी ने उसको अपने बैलों को मारते न देखा था।

नत्थू और छिद्दू दोनों खुश थे। उनकी कमरों से जख्मों के निशान भी अब करीब-करीब गायब हो गए थे। रहीम खां एक दिन खेत से जल्दी आ रहा था कि कुछ बच्चे सड़क पर कबड्डी खेल रहे थे। उसको देखते ही सब अपने जूते छोड़कर भाग गए। वह कहता ही रहा- ‘अरे मैं तुम्हें मारता थोड़े ही हूं।’ आसमान पर बादल छाए हुए थे। वह जल्दी-जल्दी बैलों को हांकता हुआ घर आया। उनको बांधा ही था कि बादल जोर से गरजा और बारिश शुरू हो गई। अंदर आकर किवाड़ बंद किए और चिराग जलाकर उजाला किया। रोज की तरह बासी रोटी के टुकड़े करके अबाबीलों के जाले में डाल दिए। ‘अरे नूरू, अरे बुंदू’ पुकारा मगर वे बाहर न आए। घौंसले में झांका तो चारों अपने पंखों पर सिर दिए सहमे बैठे थे। ठीक जिस जगह छत में घौंसला था, वहां एक सुराख था और बारिश का पानी टपक  रहा था। कुछ देर तक यह पानी इसी तरह आता रहा तो घौंसला तबाह हो जाएगा और अबाबीलें बेचारी बे-घर हो जाएंगी। यह सोचकर उसने किवाड़ खोले और मूसलाधार बारिश में सीढ़ी लगाकर छत पर चढ़ गया। जब तक मिट्टी डालकर सुराख बंद करके उतरा तो बिल्कुल भीग चुका था।

पलंग पर जाकर बैठा तो कई छींकें आईं मगर उसने परवाह नहीं की और गीले कपड़ों को निचोड़ चादर ओढ़कर सो गया। अगले दिन सुबह उठा तो तमाम बदन में दर्द और सख्त बुखार था। कौन हाल पूछता और कौन दवा लाता। दो दिन वह इसी हालत में पड़ा रहा। जब दो दिन उसे खेत पर जाते हुए न देखा तो गांव वालों को चिंता हुई। कालू जिलादार और कई किसान शाम को उसे झोंपड़े में देखने आए। झांककर देखा तो वह पलंग पर पड़ा आप ही आप बातें कर रहा था- ‘अरे बुंदू अरे नूरू। कहां मर गए? आज तुम्हें खाना कौन देगा?’ कुछ अबाबीलें कमरे में फड़फड़ा रही थीं। ‘बेचारा पागल हो गया है।’ कालू जिलादार ने सिर हिलाकर कहा, ‘सुबह को शफाखाने वालों को सूचना देंगे कि इसे पागलखाने भिजवा दें।’ अगले दिन सुबह को जब उसके पड़ोसी शफाखाने वालों को लेकर आए, उसका दरवाजा खोला तो वह मर चुका था। उसकी पांयती चार अबाबीलें खामोश बैठी थीं।

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