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चिर प्रासंगिक

‘हिन्द स्वराज’ महात्मा गांधी की विश्वविख्यात कृति है। उनकी आत्मकथा ‘सत्य के मेरे प्रयोग’ उनके प्रत्यक्ष जीवन और कार्यों की जानकारी देती है। विचारों का भी पता चलता है, मगर हिन्द स्वराज में तो मानो गांधी की देश-चिंता अत्यंत संघनित रूप में प्रकट हुई है। यह देश चिंता न केवल हिंदुस्तान को एक अलहदा रास्ता दिखाने की कोशिश है, बल्कि साहसिक सभ्यता समीक्षा भी है। गांधी ने यह किताब 1909 में लिखी थी और इसमें उन्होंने पश्चिम की औद्योगिक-आधुनिक सभ्यता की सीमाओं को रेखांकित करते हुए बतलाया कि उनकी नजर में भारत का भावी मार्ग क्या हो सकता है। सहमति या असहमति अपनी जगह है, मगर भावी मार्ग की जरूरत आज भी बनी हुई है। त्रिदीप सहृद ने हिन्द स्वराज के अपने पाठ में इसी भावना को आधार बनाया है।
हिन्द स्वराज एक अनुशीलन, त्रिदीप सहृद, राजकमल प्रकाशन, दरियागंज, नई दिल्ली-110002, मूल्य:250 रु.

विभक्त परछाइयां

मीरा सीकरी के नवीनतम कहानी संग्रह की पहली कहानी की शुरुआत एक मां और उसके बेटे के संवाद से होती है। मां अभी-अभी ऋषिकेश से घूमकर आए बेटे को फिर मनाली जाने से मना कर रही है, लेकिन बेटा कहता है कि वह घर में रहकर बोर हो जाता है। मां को डर है कि बेपरवाह घुमक्कड़ी में बेटे को कुछ हो न जाए, जबकि बेटे को लगता है कि उसकी अपनी ही ऊब उसे कहीं खत्म न कर दे। ‘तप्तसमाधि’ शीर्षक से लिखी गई यह कहानी हमारे समसामयिक जीवन के विरोधाभासों और विसंगतियों को बखूबी उद्घाटित करती है, जिनका अंत प्राय: त्रासद होता है। जो लोग लगातार एकाकी पड़ते जाने के खिलाफ नेह-नातों के बंधन को बनाए रखने की जिद पाले रहते हैं, वे इस त्रासदी को और गहरे जाकर भुगतते हैं। कहानियां समाज और जीवन की ऐसी ही अनेक परिस्थितियों व पात्रों के इर्दगिर्द बुनी गई हैं।
तप्त समाधि तथा अन्य कहानियां, मीरा सीकरी, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली-3,  मूल्य: 120 रु.

आध्यात्मिक यात्रा

प्रस्तुत पुस्तक आत्मकथात्मक शैली में कही गई एक व्यक्ति की आध्यात्मिक यात्रा और विचारों का लेखाजोखा है। फकीर नामक चर्चित पुस्तक के लेखक रुजबेह एन. भरूचा ने इस किताब में अपने गुरु और अन्य आध्यात्मिक व्यक्तियों के साथ अपनी बातचीत और अनुभवों को कथात्मक शैली में लिखा है। भरूचा की पिछली किताबें जिन लोगों को दिलचस्प लगी थीं, उन्हें यह किताब भी पसंद आएगी। कहानी की पृष्ठभूमि दिल्ली और गुड़गांव है, जहां अपनी बेटी के साथ लेखक अपने गुरु से मिलने आया है। इस बीच कई और लोगों से उसकी मुलाकातें होती हैं, जो उसकी आध्यात्मिक कथा को आगे बढ़ाती हैं। इसमें कहानी की अपेक्षा उसमें व्यक्त किए गए विचार ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।

ओउम नम: ओउम्, रुजबेह एन. भरूचा, हिन्द पॉकेट बुक्स, नई दिल्ली-110003, मूल्य: 175 रु.

आवाहन-उद्बोधन

उद्बोधन वैसे तो साहित्य मात्र का गुण है, लेकिन कविता का एक अच्छा-खासा हिस्सा ऐसा है जिसमें सीधे-सीधे यह आधार की तरह मौजूद है। यह कोई नई चीज नहीं है। कबीर ने भी अपने पदों में अक्सर ‘सुनो भई साधो’ कहा है। वास्तव में जब कोई रचनाकार साहित्य को सामाजिक परिवर्तन का एक माध्यम बानकर सक्रिय होता है तो वह ऐसी रचनाओं के सृजन में प्रवृत्त होता है, जिनमें समाज के आवाहन पर बल दिया गया हो। हीरा ऐसे ही एक रचनाकार हैं। उनके प्रस्तुत कविता संग्रह की ज्यादातर कविताएं एक तरफ जन सामान्य के जटिल जीवन-संघर्ष का बखान करती हैं, वहीं दूसरी तरफ व्यवस्था के विद्रूप को उद्घाटित करती चलती हैं। उनकी जनोन्मुखता इतनी प्रबल है कि उनकी कविता वर्णन और विचार से आगे बढ़कर अक्सर पाठक का आवाहन करती है कि वह आगे बढ़कर प्रतिकूलताओं पर प्रहार करे। उनका जोर विषमता दूर करने पर है।
उठ! वतन की आस, डॉ. हीरानंद सिंह ‘हीरा’, समीक्षा प्रकाशन, मुजफ्फरपुर, बिहार, मूल्य: 100रु.

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