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गंगा की बाढ़ पर रेणु की आंखोंदेखी

महान कथाकार फणीश्वर नाथ रेणु पर अभी-अभी प्रकाशित किताब ‘रेणु का है अंदाजे बयां और’ में उनका एक कथा रिपोर्ताज ‘जै गंगे’ प्रकाशित हुआ है, जो रामवृक्ष बेनीपुरी द्वारा संपादित साप्ताहिक ‘जनता’ में 7 नवंबर 1948 को छपा था और अब तक असंकलित था। यहां प्रस्तुत हैं इसी कथा रिपोर्ताज के संपादित अंश

उस दिन आधी रात को ‘मनहरना दियारा’ के बिखरे गांवों और दूर-दूर के टोलों में अचानक एक सम्मिलित करुण पुकार मची, नींद में माती हुई हवा कांप उठी - ‘जै गंगा मैया की जै..!’ अंधेरी रात में गंगा मैया की क्रुद्ध लहरें हहराती, घहराती पछाड़ खाती और फुफकारती हुई तेजी से बढ़ रही थीं। लहरें उग्र होती गईं, कोलाहल बढ़ता गया- ‘जै गंगा मैया..मैया रे..दुहाई गंगा मैया..भगवान..।’ ‘..गाय बैलों का बंधन काटो..औरतों को चुप करो भाई, कुछ सुनने भी नहीं देती हैं, बच्चों को देखो, ऊंचला बांध पर औरतों को भेजो, अरे बाप रे, पानी बढ़ रहा है, रे बाप!..दुहाई..’ पानी ऊपर की ओर बढ़ रहा था, मानो ऊपर की ओर उठती हुई क्रंदन-ध्वनि को पकड़ना चाहता हो।.. ‘दुहाई गंगे..’ ‘कलकल कलकल छहर-छहर-’
‘बचाओ बाबा बटेश्वरनाथ..’ ‘ओसारे पर पानी!’ ‘बाप रे, दुहाई गंगा..’ लहरें असंख्य फण फैला कर गांव में घुसीं। घर के कोने कोने में छिपे हुए पापों को खोजती हुई पतितपावनी माता अट्टहास कर उठी। शस्य श्यामला धरती रो पड़ी। गूंगे प्राणियों की आखिरी आवाज घिघियाती हुई पुकार, गंगाजल के कलकल छलछल में डूब गई।.. दुहाई..!

शाम को ही मनहरना घाट से रेलवे स्टीमर को हटा कर ‘कैसलयाबंड’ के पास लाया गया था। स्टीमर के सभी कर्मचारी, रेलवे नावों के मल्लाह, बंड ओवरसियर, बंड कर्मचारीगण, कुलियों का एक विशाल जत्था, बंड पर मेला लगा हुआ है। पानी खलासी रह- रहकर जरा नाटकीय ढंग से चिल्ला कर रिपोर्ट देता- ‘दो फीट..।’
‘अरे धुत्त साला..कान फाड़ डाला।’- सब हंस पड़ते। गंगा चिढ़ जाती है इस हांसी को सुन कर। पानी बढ़ता, लकड़ी के सुफेद खम्भे के काले काले दाग धीरे धीरे पानी के नीचे डूबने लगे। सब हांसते रहे। स्टीमर रह-रहकर हिल उठता। बंड पर कोई कमर मटका-मटकाकर गाता- ‘छोटी सी मोरी दिल की तलैया, अरे हां डगमग डोले, अरे हां डगमग डोले..’ ‘चुप हरामी का बच्चा!’ स्टीमर पर से बूढ़ा फैजू चिल्ला उठता। फैजू के दिमाग में तूफान चल रहा था। स्टीमर के छत पर वह अकेला ही टहल रहा था। डेढ़ सौ से ज्यादा सरकारी कुली, स्टीमर और पच्चीस नावें। सब बेकार पड़े हैं। हुक्म है स्टीमरों और नावों को सुरक्षित रखो। कुलियों को तैयार रखो। जब तक कि हुक्म न मिले, कुछ मत करो।

डी.टी.एस. साहब कंठहापुर जंक्शन के आरामदेह बंगले में मजे से रेडियो प्रोग्राम सुन रहे होंगे। जिला मजिस्ट्रेट को शायद खबर भी न मिली हो कि दर्जनों गांव के सैकड़ों प्राणी किसी भी क्षण मौत के मुंह में समा जा सकते हैं। आज पांच दिनों से दरिया की हालात खराब है। ओवरसियर से बार-बार कहा कि इस बार पूरब दियारा के गांवों पर आफत है। दरिया के रुझान को भला मैं नहीं समझूंगा। ओवरसियर हांसता था। उसने पढ़-लिखकर पास जरूर किया है, लेकिन मेरा जन्म ही नाव पर ही हुआ है।.. ‘घहर-घहर..छहर-छरर..’ गंगा गरजती।

फैजू के कानों में पूरब दियारा की, खून को सर्द कर देने वाली, क्रन्दन-ध्वनि रह- रहकर पड़ती थी। उसकी बेबसी! वह कुछ नहीं कर सकता। वह चाहे तो उन गांवों के बच्चों को बचा सकता है, कानून?.. उसकी आंखों के सामने कितने ही डूबते हुए प्राणियों की तस्वीरें नाच जातीं। वह बचपन से ही जलचर है। मिट्टी से उसे बहुत कम नाता रहा है। बहुत बार डूबते हुए यात्रियों की करुण पुकार को सुन कर उसने अनसुनी कर दी है। नावों को डूबते छोड़कर भागा है। स्टीमर में खतरे का भोंपा बजाने के पहले ‘लाइफ बेल्ट’ उसने संभाला है। लेकिन, उस दिन आधी रात को उसका दिमाग गर्म हो रहा था। ..हुक्म है, दुनिया डूबती रहे, तुम पानी मापते रहो। रिपोर्ट दो। अजीब कानून है।.. ‘ट्राऩ..ट्रान, ट्रान..ट्रान।’

बिरौली के स्टेशन के मास्टर साहब की जान आफत में है। एक ओर घाट स्टेशन बाबू हैं, दूसरी ओर चकमका के। एक जनाब घबराए हुए मिनट-मिनट पर रिपोर्ट देते हैं और दूसरे साहब बेवजह की बहुत सी बातें पूछने की आदत से लाचार हैं।.. ‘ओ, एई घाटवाला तार बांचने नहीं देगा।..’ ‘हल्लो..चकमका। हां, मनहरना घाट का इस्टार्न साइड का गांव सब में पानी चला गया। स्टेशन मास्टर का क्वार्टर में पानी चला आया। कंठहारपुर बोलिए।..क्या? गोडाउन? आरे हमारा गोडाउन में कहां जगह है! सामान से भर्ती है। सो काहे?.. गोडाउन का बात काहे वास्ते पूछा?..अच्छा। हां।’ रात भर के जगे मास्टर बाबू कुर्सी पर ही सो गये हैं। प्लेटफॉर्म पर कोलाहल हो रहा है। घाट स्टेशन के स्टेशन मास्टर साहब बाल बच्चों और स्टाफ को लेकर ट्रॉली से भाग आये हैं। उनकी आसन्न-प्रसूता स्त्री डर से नीली पड़ गई है।

बच्चे रो रहे हैं। स्टेशन मास्टर साहब शरणार्थियों की सी मुद्रा बनाये हुए टहल रहे हैं। हांफता हुआ आता है बंड का चौकीदार- ‘मास्टर बाबू कहां हैं, मास्टर बाब? ओवरसियर भेजिन हैं। फैजू बिला हुकुम के पैंतीसो नाव और दोनों स्टीमर ले के चला गया है। कुली और मल्लाह लोग तैयार नहीं होता था। कसम धरा के ले गया है। हिन्दू को गाय कसम, मुसलमान को क्या जाने कौन कसम,..सब महात्मा जी की जै बोल के स्टीमर खोल दिया। बोला ‘जो राकेगा उसको बस गंगा मइया को..’ टेलीफून कर दीजिये बाबू डी.टी.एस. साहब को..’
 ‘लेकिन उधर तो मुसलमानों की एक बस्ती भी नहीं है?’ -बिरौली स्कूल के हेड पंडित जी के समझ में फैजू की यह हरकत एकदम नहीं आती।
..

बाढ़ कचहरी।
सभी दफ्तर मशीन की तरह चल रहे हैं- ‘देखिए’ सभी दरखास्तें प्रापर चैनल से आनी चाहिए। सबसे पहले उस पर थाना कांग्रेस कमीटी के दफतर का मुहर होना चाहिए, फिर स. डि. कांग्रेस और जिला कांग्रेस वालों का नोट। समझते हैं तो? हां, नहीं तो पीछे मुश्किल हो जायगा। सीधे कोई दरखास्त मत लीजिए। जरा-सी कुछ हो जाने से ही मामला प्राईम मिनिस्टर तक..हां, समझते हैं तो। ..और हां, सुनिए। जिला कांग्रेस कमेटी के मंत्री..और हां, धर्मदेव बाबू, उनके नोट को ठिकाने से पढ़िएगा। चपरासी आकर सलाम करता है- ‘हजोर’ दो कांगरेसी बाबू आये हैं।’ साहब कुर्सी छोड़कर उठे- ‘नमस्ते’ आइए। ‘हम लोग सोशलिस्ट पार्टी के कार्यकर्ता हैं। बाढ़ पीड़ितों की सहायता करने आए हैं। कल कलक्टर साहब से बातें हुईं। उन्होंने आपसे मिलने को कहा। हम लोगों के साथ तीस विद्यार्थी हैं।’ ‘ओ, सोशलिस्ट पार्टी के वर्कर हैं आप लोग!’ -साहब को गुस्सा आ रहा था अपने चपरासी पर। बदतमीज ने सोशलिस्टों को भी कांग्रेसियों में शुमार कर दिया। नहीं तो मुझे कुर्सी छोड़कर उठने की क्या जरूरत थी। -बोले- ‘ठीक है कहिए।’ ‘हमलोग स्टेशन, प्लेटफॉर्म पर पड़े हैं। हमारे रहने के लिए जगह का इन्तजाम कर दीजिए और स्वयंसेवकों के भोजन का..’ ‘देखिये, जगह का तो बड़ा दिक्कत है। वहां तो देख ही रहे हैं..धर्मदेव बाबू के लिए अभी तक अलग रसोईघर..’ ‘स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर तो..अच्छा देखा जाएगा।’ ‘और एक बात पूछनी है बिरौली स्टेशन के पास रिलीफ कैम्प नहीं रखकर चकमका रखने से कोई खास सुविधा है क्या?’ ‘जी ?.. हां, यहां के स्टेशन का माल-गोदाम अभी एकदम खाली है। रिलीफ कमिटी का गोदाम ठहरा..’‘नमस्ते!’ ‘नमस्ते! अरे हां, सुनिए। कांग्रेस से अलग हो गई है न आपकी पार्टी ?..’


‘..हां, सो तो ठीक है। लेकिन फिर भी..। आपकी पार्टी के जन्मदाता तो मालवीय जी थे न? नहीं? अरे, हां साहब, आपको पता नहीं। आखिर हमलोग भी तो कुछ पढ़ते- लिखते हैं।..नेशनलिस्ट पार्टी? हां, हां, मालवीय जी नेशनलिस्ट पार्टी के थे। ठीक-ठीक! अरे साहब, रोज-ब-रोज इतनी पार्टी हो रही है कि याद रखना मुश्किल है।.. ओ, मार्क्स साहब..कोई पारसी थे क्या?..ओ ठीक ठीक। नमस्ते!’
‘हजोर सेठ कुंदनमल आए हैं।’
‘आइए सेठ जी! कहिए क्या खबर लाए हैं?’
‘हजुर उदर तो ठीक है। कडक्टर साब तो पहले कांगरेसी सुवापति (सभापति) पर बात फेंक दीहिन। मैंने कहा हुजुर तीन-तीन सुवापति की बात है। फिर बाढ़ कुमेटी के शिकरेटरी साब हैं। भोत हंगामा है। और करक्टर साब तो राजी हो गये। अब परस्तुती (परिस्थिति) है कि सिपढ़ाई आपिसर (सप्लाई ऑफिसर) को राजी करनी है। हुजुर से..’
‘हुजुर कोई बात नहीं। सब ठीक हो जाएगा। हम आज ही कड़कत्ता गिद्दी (गही) में खबर देते हैं। डालिमचंद कड़कत्ते में हैं।..उसके लिए आप बेफिक्र रहिए। कंट्रोल के समय में डालिमचंद ने इतना रेडियो खरीदा है कि एकदम उस्ताद हो गया है।.. जी? जानीवाकर? आज ही भेज देता हूं।.. जी उसके लिए आप बेफिक्र रहिए। म्हारा नौकर शिवदास एकदम उस्ताद है। पांच बरस में एकदम उस्ताद हो गया है।’ ‘आइए धर्मदेव बाबू।’
‘हुजुर, वे सोशलिस्ट पार्टी वाले कहां से आए थे?..लेकिन सवाल है कि सहायता वे रिलीफ कमिटी की करने आए हैं या बाढ़ पीड़ितों की?.. तो गांवों में जाएं..ये लोग खामख्वाह हर जगह अड़ंगा डालने पहुंच जाते हैं।’
‘स्टेनों बाबू को सलाम दो।’
‘हां देखिए। लिखिए टू द मैनेजर..नहीं, सेक्रेटरी सोशलिस्ट पार्टी। योर सर्विस..!’
‘अरे आप यह क्या कह रहे हैं?’ -धर्मदेव बाबू रोकते हैं। ‘लिखा-पढ़ी की क्या जरूरत है? चपरासी से खबर दे दीजिए..।’
‘जै गंगा मैया की जै!’
पानी घट गया। जमीन धीरे-धीरे सूख रही है। गंगा की काली मिटी खेतिहरों को बुला रही है -‘आओ, बोओ और पंचगुना उपजाओ।’ आज आखिरी बंटवारा था। बांस, फूस, रस्सी, अनाज, बीज और पैसे। लोग अपने-अपने गांवों को जा रहे हैं। बीमार, बेघरवार, सर्वहारा की टोली बचे-खुचे मवेशियों के झुण्ड के साथ जा रही है। जिन्हें सहायता मिली है वे खुश हैं। जिन्हें नहीं मिली, उनके मन में गुस्सा है। जग्गू भोलंटियर सबसे कहता फिरता है- ‘किस्सा खत्म और पैसा हजम।’
(रेणु का है अंदाजे बयां और, संपादक: भारत यायावर, राजकमल प्रकाशन से साभार)

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