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आकाश का फैलाव

सुपरिचित कवि शैलेंद्र चौहान के इस कविता संग्रह का शीर्षक ही स्पष्ट करता है कि इसमें यथार्थ के कठिन-कठोर अनुभव की आंच है। चौहान के लिए कविता जीवन-संघर्ष का महत्वपूर्ण औजार है। यही वजह है कि जीवन के दैनन्दिन दबावों और प्रेरणाओं से बल ग्रहण करने वाली ये कविताएं मूल रूप से विचार प्रधान हैं। अस्वाभाविक नहीं कि चौहान समाज के विभिन्न स्तरों पर मौजूद और सक्रिय शोषण तंत्र को निशाना बनाते हैं। इन कविताओं में लड़ते-बढ़ते जन सामान्य के अनेक चित्र और चरित्र हैं। वास्तविक धरातल से उपजे इन चित्रों और चरित्रों की चर्चा से ये कविताएं कहानीपन की हदों को छूने लगती हैं। कुछ कविताएं जैसे-‘सर्दियों में अलाव के पास’ बिल्कुल सादा चित्र प्रस्तुत करती हैं। मगर उनकी सादगी समग्रता में गहरा प्रतीकार्थ उपस्थित करती हैं।
नौ रुपए बीस पैसे के लिए, शैलेंद्र चौहान, शब्दालोक, सी-3/59, सादतपुर विस्तार, दिल्ली-94, मूल्य: 90 रु.

अपसंस्कृति पर चोट

प्रेमपाल शर्मा उन लेखकों में हैं, जिनके लिए कहानी लिखना मानवीय मूल्यों की तरफदारी करने और इन मूल्यों पर चोट पहुंचाने वाली शक्तियों के खिलाफ प्रतिरोध करने का जरिया है। इसलिए इन कहानियों में सबसे ज्यादा जोर मानवीय जीवन-स्थितियों के विपर्यय को उद्घाटित करने पर है। स्वाभाविक रूप से ये कहानियां इनसानी व्यवहार व मनोगत विकृतियों पर रोशनी डालती हैं, साथ ही ये हमें उन खतरों से भी सावधान करती हैं, जो हमारे सामने एक नया सांस्कृतिक मूल्यबोध का रूप धारण करके आती हैं। संग्रह की पहली कहानी है ‘पिज्जा और छेदीलाल’, जो एक बड़े सांस्कृतिक विघटन के साथ व्यक्ति के छद्म स्वप्न की कहानी भी कहती है। इसमें पिज्जा खाने की बात एक नई चीज का स्वाद खाने की इच्छा से बढ़कर एक हसरत का रूप ले लेती है, क्योंकि इसके साथ कई प्रचारित मूल्य जुड़े हैं।
प्रेमपाल शर्मा की यादगारी कहानियां, हिंद पॉकेट बुक्स, नई दिल्ली-3, मूल्य: 150 रु.

काव्यात्मक यात्राएं

वरिष्ठ लेखक प्रताप सहगल की यह किताब यूं तो यात्रा वृत्तांत है, मगर इन्हें सिर्फ वृत्तांत नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इनमें विभिन्न स्थानों के वृत्तांत के साथ इतिहास, भूगोल, लोकाचार आदि अनेक चीजें घुलमिल कर ऐसा एक पाठ रचती हैं जिनमें केवल विवरण या सिर्फ संस्मरण की बजाय एक पूरा जीवन परिदृश्य और व्यापक परिप्रेक्ष्य निर्मित हो जाता है। लेखक ने स्वयं इन वृत्तांतों के संदर्भ में ‘अनुभव-वृत’ पद का जिक्र किया है, जो वाजिब है। पुस्तक में बाज बहादुर और रूपमती की प्रेमकथा के गवाह मांडू से लेकर हिंदुस्तान के आदि निवासियों की आश्रयस्थली भीमबेटका और धरती के स्वर्ग कश्मीर से लेकर नर्मदा के जल सिंचित अमरकंटक तक के यात्रा संस्मरण हैं। लेखक इनके वृत्तांत देते हुए खुद को एकात्म कर लेता है।
हर बार मुसाफिर होता हूं, प्रताप सहगल, किताब घर प्रकाशन, नई दिल्ली-2, मूल्य :280 रु.


खबरों की खबर

युवा पत्रकार-शोधार्थी अरविंद दास की यह पुस्तक वैश्वीकरण के दौर में उभरे नव पूंजीतंत्र की छाया में विकसित और परिवर्तित हुई हिंदी पत्रकारिता का गहन विवेचन करती है। जिस परिघटना को आज सूचना-संचार क्रांति कहा जाता है, उसके दौर में हिंदी समाचार जगत ने न केवल नई पहचान कायम की, बल्कि अपने व्यावसायिक हितों को भी नए सिरे से बढ़ने-व्यापक होने की दिशा में दूर तक पहुंचाया। इस सफलता के बरअक्स हिंदी मीडिया को दूसरी तरफ ‘पेड न्यूज’ जैसे लांछन का सामना भी करना पड़ा। मिश्रित अर्थव्यवस्था के दौर में जहां सियासी और समाजी महत्व की खबरों के बदले मनोरंजन के तत्व हावी होते चले गए, वहीं प्रमुख मीडिया के सरोकार भी स्पष्ट तौर पर बदल गए। दास की यह किताब मीडिया के बहुआयामी बदलाव को सोदाहरण सामने रखती है। पिछले दो दशक का मीडिया जगत इस विवेचना के दायरे में शामिल है।
हिंदी में समाचार, अरविंद दास, अंतिका प्रकाशन, गाजियाबाद-5, मूल्य: 390 रु.

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