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class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

तालाब बांधता धरम सुभाव

अनुपम मिश्र की लिखी किताब ‘आज भी खरे हैं तालाब’ को छपे बीस साल हो गए हैं। इन बीस सालों में इस किताब की दो लाख से भी ज्यादा प्रतियां पाठकों तक पहुंच चुकी हैं और आज भी इसकी मांग है। यह सब बिना किसी भारी भरकम विक्रय और प्रचार तंत्र के संभव हुआ है। गांधी शांति प्रतिष्ठान के पर्यावरण कक्ष से प्रकाशित इस किताब के लिए शोध करने से लेकर प्रेस में छपवाने तक का काम अनुपम मिश्र ने अपनी सहयोगी शीना और मंजुश्री के साथ किया। दिलीप चिंचालकर के चित्रों से सज्जित इस सुरुचिपूर्ण किताब के पहले संस्करण में भी शायद ही कोई प्रूफ या छपाई की गलती हो, हिंदी पुस्तकों के आम माहौल में यह बात उल्लेखनीय है। किताब की जानकारी लोगों तक चिट्ठियों के जरिए पहुंचाई गई और देखते ही देखते 2000 प्रतियों का पहला संस्करण खत्म हो गया। इसके बाद एक के बाद एक संस्करण आते रहे। खास बात यह है कि इस किताब का कोई कॉपीराइट नहीं है और कोई भी इसे छाप सकता है। आग्रह सिर्फ यह है कि किताब की सामग्री के साथ कोई छेड़छाड़ न की जाए। इसके कई संस्करण हिंदी के नामी और गुमनाम प्रकाशकों ने छापे। जाहिर है इस किताब की मांग थी, इसलिए व्यावसायिक प्रकाशकों की इसमें दिलचस्पी थी। कई स्वयंसेवी संस्थाओं ने भी इस किताब को छापा। कई भाषाओं में इसके अनुवाद हुए।

इतनी ही महत्वपूर्ण बात यह है कि इस किताब के असर से देश भर में तालाब बनाने की एक मुहिम सी छिड़ गई। इस किताब से प्रेरणा लेकर कई लोग और संस्थाएं अपने-अपने क्षेत्र में नए तालाब बनाने और पुराने तालाबों के संरक्षण में जुट गईं। अंदाजा यह है कि इस तरह 25,000-30,000 तालाबों के बनने- संवरने में इस किताब का योगदान है। लगभग साल भर पहले इस किताब को पढ़कर तालाब के काम में जुटने वाले लोगों में से एक ने बिना अपना नाम दिए इस किताब की छपाई का खर्च उठाने का प्रस्ताव रखा। उसके बाद पाठकों को इस किताब की एक-एक प्रति नि:शुल्क दी जाती है, सिर्फ व्यावसायिक वजहों से या ज्यादा प्रतियां चाहने वालों को कीमत चुकानी पड़ती है। इससे जाहिर होता है कि तालाबों की तरह ही यह किताब आज भी खरी है। प्रस्तुत है इसका एक अंश: रेखांकन: दिलीप चिंचालकर

जो समाज को जीवन दे, उसे निर्जीव कैसे माना जा सकता है? तालाबों में, जलस्रोतों में जीवन माना गया और समाज ने उनके चारों ओर अपने जीवन को रचा। जिसके साथ जितना निकट का संबंध, जितना स्नेह, मन उसके उतने ही नाम रख लेता है। देश के अलग-अलग राज्यों में, भाषाओं में, बोलियों में तालाब के कई नाम हैं। बोलियों के कोष में, उनके व्याकरण के ग्रंथों में, पर्यायवाची शब्दों की सूची में तालाब के नामों का एक भरा-पूरा परिवार देखने को मिलता है। डिंगल भाषा के व्याकरण का एक ग्रंथ हमीर नाम-माला तालाबों के पर्यायवाची नाम तो गिनता ही है, साथ ही उनके स्वभाव का भी वर्णन करते हुए तालाबों को ‘धरम सुभाव’ कहता है। लोक धरम सुभाव से जुड़ जाता है। प्रसंग सुख का हो तो तालाब बन जाएगा। प्रसंग दुख का भी हो तो तालाब बन जाएगा। जैसलमेर, बाड़मेर में परिवार में साधन कम हों, पूरा तालाब बनाने की गुंजाइश न हो तो उन सीमित साधनों का उपयोग पहले से बने किसी तालाब की पाल पर मिट्टी डालने, छोटी मोटी मरम्मत करने में होता था। मृत्यु किस परिवार में नहीं आती? हर परिवार अपने दुखद प्रसंग को समाज के सुख के लिए तालाब से जोड़ देता था।

पूरे समाज पर दुख आता, अकाल पड़ता तब भी तालाब बनाने का काम होता। लोगों को तात्कालिक राहत मिलती और पानी का इंतजाम होने के बाद में फिर कभी आ सकने वाले इस दुख को सह सकने की शक्ति समाज में बनती थी। बिहार के मधुबनी इलाके में छठवीं सदी में आए एक बड़े अकाल के समय पूरे क्षेत्र के गांवों ने मिलकर 63 तालाब बनाए थे। इतनी बड़ी योजना बनाने से लेकर उसे पूरी करने तक के लिए कितना बड़ा संगठन बना होगा, कितने साधन जुटाए गए होंगे- नए लोग, नई सामाजिक और राजनैतिक संस्थाएं, इसे सोचकर तो देखें। मधुबनी में ये तालाब आज भी हैं और लोग इन्हें आज भी कृतज्ञता से याद रखे हैं। कहीं पुरस्कार की तरह तालाब बना दिया जाता, तो कहीं तालाब बनाने का पुरस्कार मिलता। गोंड राजाओं की सीमा में जो भी तालाब बनाता, उसे उसके नीचे की जमीन का लगान नहीं देना पड़ता था। संबलपुर क्षेत्र में यह प्रथा विशेष रूप से मिलती थी। दंड-विधान में भी तालाब मिलता है। बुंदेलखंड में जातीय पंचायतें अपने किसी सदस्य की अक्षम्य गलती पर जब दंड देती थीं तो उसे दंड में प्राय: तालाब बनाने को कहती थीं।

यह परंपरा आज भी राजस्थान में मिलती है। अलवर जिले के एक छोटे से गांव गोपालपुरा में पंचायती फैसलों को न मानने की गलती करने वालों से दंड स्वरूप कुछ पैसा ग्राम कोष में जमा करवाया जाता है। उस कोष से यहां पिछले दिनों दो छोटे-छोटे तालाब बनाए गए हैं। गड़ा हुआ कोष किसी के हाथ लग जाए तो उसे अपने पर नहीं, परोपकार में लगाने की परंपरा रही है। परोपकार का अर्थ प्राय: तालाब बनाना या उनकी मरम्मत करना माना जाता था। कहा जाता है कि बुंदेलखंड के महाराजा छत्रसाल के बेटे को गड़े हुए खजाने के बारे में एक बीजक मिला था। बीजक की सूचना के अनुसार जगतराज ने खजाना खोद निकाला। छत्रसाल को पता चला तो बहुत नाराज हुए: ‘मृतक द्रव्य चंदेल को, क्यों तुम लियो उखार’। अब जब खजाना उखाड़ ही लिया है तो उसका सबसे अच्छा उपयोग किया जाएगा। पिता ने बेटे को आज्ञा दी कि उससे चंदेलों के बने सभी तालाबों की मरम्मत की जाए और नए तालाब बनवाए जाएं। खजाना बहुत बड़ा था। पुराने तालाबों की मरम्मत हो गई और नए भी बनने शुरू हुए। वंशवृक्ष देखकर विक्रम संवत् 286 से 1162 तक की 22 पीढ़ियों के नाम पर पूरे 22 बड़े-बड़े तालाब बने थे।

ये बुंदेलखंड में आज भी हैं। गड़ा हुआ धन सबको नहीं मिलता। लेकिन सबको तालाब से जोड़कर देखने के लिए भी समाज में कुछ मान्यताएं रही हैं। अमावस और पूनों, इन दो दिनों को कारज यानी अच्छे और वह भी सार्वजनिक कामों का दिन माना गया। इन दोनों दिनों में निजी काम से हटने और सार्वजनिक काम से जुड़ने का विधान रहा है। किसान अमावस और पूनों को अपने खेत में काम नहीं करते थे। उस समय का उपयोग वे अपने क्षेत्र के तालाब आदि की देखरेख व मरम्मत में लगाते थे। समाज में श्रम भी पूंजी है और उस पूंजी को निजी हित के साथ सार्वजनिक हित में भी लगाते जाते थे। श्रम के साथ-साथ पूंजी का अलग से प्रबंध किया जाता रहा है। इस पूंजी की जरूरत प्राय: ठंड के बाद तालाब में पानी उतर जाने पर पड़ती है। तब गरमी का मौसम सामने खड़ा है और यही सबसे अच्छा समय है तालाब में कोई बड़ी टूट-फूट पर ध्यान देने का।

वर्ष की बारह पूर्णिमाओं में से ग्यारह पूर्णिमाओं को श्रमदान के लिए रखा जाता रहा है, पर पूस माह की पूनों पर तालाब के लिए धान या पैसा एकत्र किए जाने की परंपरा रही है। छत्तीसगढ़ में उस दिन छेर-छेरा त्योहार मनाया जाता है। छेर-छेरा में लोगों के दल निकलते हैं, घर-घर जाकर गीत गाते हैं और गृहस्थ से धान एकत्र करते हैं। धान की फसल कट कर घर आ चुकी होती है। हरेक घर अपने-अपने सामथ्र्य से धान का दान करता है। इस तरह जमा किया गया धान ग्रामकोष में रखा जाता है। इसी कोष से आने वाले दिनों में तालाब और अन्य सार्वजनिक स्थानों की मरम्मत और नए काम पूरे किए जाते हैं। सार्वजनिक तालाबों में तो सबका श्रम और पूंजी लगती रही थी, निहायत निजी किस्म के तालाबों में भी सार्वजनिक स्पर्श आवश्यक माना जाता रहा है।

तालाब बनने के बाद उस इलाके के सभी सार्वजनिक स्थलों से थोड़ी-थोड़ी मिट्टी लाकर तालाब में डालने का चलन आज भी मिलता है। छत्तीसगढ़ में तालाब बनते ही उसमें घुड़साल, हाथीखाना, बाजार, मंदिर, श्मशान भूमि, वेश्यालय, अखाड़ों और विद्यालयों की मिट्टी डाली जाती थी। शायद आज ज्यादा पढ़-लिख जाने वाले अपने समाज से कट जाते हैं। लेकिन तब बड़े विद्या केन्द्रों से निकलने का अवसर तालाब बनवाने के प्रसंग में बदल जाता था।  मधुबनी, दरभंगा क्षेत्र में यह परंपरा बहुत बाद तक चलती रही है। तालाबों में प्राण हैं। प्राण प्रतिष्ठा का उत्सव बड़ी धूमधाम से होता था। उसी दिन उनका नाम रखा जाता था। कहीं-कहीं ताम्रपत्र या शिलालेख पर तालाब का पूरा विवरण उकेरा जाता था। कहीं-कहीं तालाबों का पूरी विधि के साथ विवाह भी होता था। छत्तीसगढ़ में यह प्रथा आज भी जारी है। विवाह से पहले तालाब का उपयोग नहीं हो सकता। न तो उससे पानी निकालेंगे और न उसे पार करेंगे। विवाह में क्षेत्र के सभी लोग, सारा गांव पाल पर उमड़ आता है।

आसपास के मंदिरों की मिट्टी लाई जाती है, गंगा जल आता है और इसी के साथ अन्य पांच या सात कुओं या तालाबों का जल मिलाकर विवाह पूरा होता है। कहीं-कहीं बनाने वाले अपने सामथ्र्य के हिसाब से दहेज तक का प्रबंध करते हैं। विवाहोत्सव की स्मृति में भी तालाब पर स्तंभ लगाया जाता है। बहुत बाद में जब तालाब की सफाई-खुदाई दुबारा होती है, तब भी उस घटना की याद में स्तंभ लगाने की परंपरा रही है। आज बड़े शहरों की परिभाषा में आबादी का हिसाब केन्द्र में है। पहले बड़े शहर या गांव की परिभाषा में उसके तालाबों की गिनती होती थी। कितनी आबादी का शहर या गांव है, इसके बदले पूछा जाता था कितने तालाबों का गांव है।

छत्तीसगढ़ी में बड़े गांव के लिए कहावत है कि वहां ‘छै आगर छै कोरी’ यानी 6 बीसी और 6 अधिक, 120 और 6 या 126 तालाब होने चाहिए। आज के बिलासपुर जिले के मल्हार क्षेत्र में, जो ईसा पूर्व बसाया गया था, पूरे 126 तालाब थे। उसी क्षेत्र में रतनपुर (दसवीं से बारहवीं शताब्दी), खरौदी (सातवीं से बारहवीं शताब्दी), रायपुर के आरंग और कुबरा और सरगुजा जिले के दीपाडीह गांव में आज आठ सौ, हजार बरस बाद भी सौ, कहीं-कहीं तो पूरे 126 तालाब गिने जा सकते हैं। इन तालाबों के दीर्ष जीवन का एक ही रहस्य था- ममत्व। यह मेरा है, हमारा है। ऐसी मान्यता के बाद रखरखाव जैसे शब्द छोटे लगने लगेंगे। भुजलिया के आठों अंग पानी में डूब सकें- इतना पानी ताल में रखना- ऐसा गीत गाने वाली, ऐसी कामना करने वाली स्त्रियां हैं तो उनके पीछे ऐसा समाज भी रहा है जो अपने कर्तव्य से इस कामना को पूरा करने का वातावरण बनाता था।

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