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भीड़ में अकेले

हमारा दौर पूरी दुनिया को मुट्ठी में करने की लालसा का दौर है, लेकिन इसका एक और पक्ष भी है। वैश्वीकरण से भौगोलिक दूरियां भले बेमानी लगने लगी हैं, पर इससे पारस्परिक संबंध भी प्रभावित हुए हैं। आज वह सामुदायिकता छिन्न-भिन्न होती नजर आ रही है, जो कल तक समाज व परिवार की धुरी थी। सब कुछ बिकाऊ हो चला है। महानगरों में यह समस्या और विकराल रूप में उपस्थित है, जहां एक ही इमारत में रहने वाले लोग एक-दूसरे को जानने की कोशिश नहीं करते। प्रमोद त्रिवेदी का नवीनतम उपन्यास ‘काले कोस’ इसी मानवीय संकट को उजागर करता है। मुंबई में अन्ना अपने परिवार के बीच हैं, फिर भी अकेले होने को अभिशप्त। उपन्यास सवाल उठाता है कि प्रचलित प्रगति हमें कहां ले जा रही है और रिश्ते तकलीफदेह स्मृति क्यों बनते जा रहे हैं!
काले कोस, प्रमोद त्रिवेदी, सस्ता साहित्य मंडल प्रकाशन, कनॉट सर्कस, नई दिल्ली-1, मूल्य: 150 रु.

प्रेरक उद्बोधन

एक सार्थक दृष्टिकोण के अभाव में व्यक्ति अपने जीवन में अपेक्षित उपलब्धि हासिल नहीं कर सकता। दुनियादारी या रोजमर्रा के कार्य व्यापार में सफलता के लिए भी सुनियोजन आवश्यक है। वस्तुत: सफलता हमारे सामान्य सामाजिक जीवन का बहुप्रचारित आदर्श है और उसके लिए अनुशासन जरूरी है। लेकिन ज्यादातर लोग यह नहीं जानते कि यह अनुशासन वे कहां से और कैसे ला सकते हैं। युवा पत्रकार-कहानीकार रत्नेश्वर की यह पुस्तक इस अनुशासन का पता बतलाती है। यह एक प्रेरक पुस्तक है, जिसमें कर्म के प्रति निष्ठा पर सबसे ज्यादा जोर दिया गया है। लेखक का मानना है कि व्यक्ति जन्म से ही एक संघर्ष में शामिल हो जाता है, जिसे अस्तित्व का संघर्ष कहते हैं। इसलिए उसका जीवन निरंतर जीत का प्रमाण है। ऐसे में व्यक्ति यदि अपने लक्ष्य के प्रति एकाग्र हो तो वह अपेक्षित सफलता हासिल कर सकता है।
जीत का जादू, रत्नेश्वर के सिंह, प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली-2, मूल्य: 125 रु.


अचेबे का स्मरण

अनियतकालीन पत्रिका ‘कथांतर’ का नवीनतम अंक इसी साल मार्च में दिवंगत हुए चिनुआ अचेबे पर केंद्रित है, जिन्हें आधुनिक अफ्रीकी साहित्य का पिता माना जाता है। 1930 में नाइजीरिया में जन्मे अचेबे ने अपने लेखन से औपनिवेशिक दासता के शिकार बनाए गए समाजों की जातीय अस्मिता और स्वतंत्रता को पुनर्जीवित किया। उन्होंने पश्चिम केंद्रित आधुनिकता की खामियां उजागर कीं और औपनिवेशिक गुलामी से मुठभेड़ के अफ्रीकी अनुभवों को दुनिया के सामने रखा। इसलिए अकारण नहीं है कि अचेबे की कृतियों को पूरी दुनिया में अत्यंत प्रतिष्ठा और लोकप्रियता मिली। उनके उपन्यास ‘थिंग्स फॉल अपार्ट’ के हिन्दी समेत दुनिया की प्राय: सभी प्रमुख भाषाओं में अनुवाद हुए हैं।
कथांतर, संपादक: राणा प्रताप, बंगाली कॉलोनी, बेगमपुर, पटना -9, मूल्य: 50 रु.

दायरों के बाहर कदम

गीताश्री उन चुनिंदा समकालीन कहानीकारों में हैं, जिनकी कहानियां विवादित होने की हद तक चर्चित रही हैं। उनकी ज्यादातर कहानियां स्त्री जीवन की अनेक अनजानी-अप्रत्याशित सच्चाइयों को सामने लाती हैं। उनकी नायिकाएं अपनी पूर्ववर्ती पीढ़ी के विपरीत काफी मुखर हैं। वे अश्लील कहे जाने की परवाह किए बगैर बेलाग अपनी बातें कहती हैं। वस्तुत: वे स्वाधीनता के सुख की खोज में पराधीनता के घेरे से बाहर निकलती स्त्रियां हैं, जो पितृसत्ता के वर्चस्व की मुखालफत करती हैं। कई बार इनके कदम स्त्री-विमर्श की प्रचलित मान्यताओं और मानकों से मेल नहीं खाते। यह भी लगता है कि जाने-अनजाने कई बार ये पुरुषवादी सोच की चपेट में आ रही हैं। इतना तो स्पष्ट है कि वे दूसरों की बनाई सीमा में कैद होने को तैयार नहीं हैं। वे अपनी शर्तों पर अपनी जिंदगी जीना चाहती हैं, जिसमें सफलता हो या विफलता, सब कुछ उनका अपना हो।
प्रार्थना के बाहर और अन्य कहानियां, गीताश्री, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली-2, मूल्य: 250 रु.

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