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हिमालय में सुनामी

पिछले डेढ़ सौ सालों के ज्ञात इतिहास में उत्तराखंड सबसे बड़ी तबाही का सामना कर रहा है। दो सौ से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं। आशंका है कि यह आंकड़ा दो हजार पार कर सकता है। सरकार जोर-शोर से राहत और बचाव कार्य में लगी हुई है। देहरादून से पूरन बिष्ट की रिपोर्ट

प्राकृतिक आपदाओं के पिछले डेढ़ सौ सालों के ज्ञात इतिहास में उत्तराखंड सबसे बड़ी त्रासदी का सामना कर रहा है। सबसे बड़ी इसलिए कि उत्तरकाशी से लेकर पिथौरागढ़ तक एक साथ इतनी बड़ी आफत पहले कभी नहीं आयी। दो सौ से ज्यादा मौतों की पुष्टि राज्य सरकार के अधिकारी कर चुके हैं, लेकिन आशंका है कि यह आंकड़ा दो हजार से ऊपर जाएगा। आपदा का निशाना बने केदारनाथ क्षेत्र की विधायक शैलारानी रावत तो दो हजार से ज्यादा मौतों की आशंका जता चुकी हैं। केदारघाटी के अलावा चमोली जिले के जोशीमठ, बदरीनाथ, गोविन्द घाट और पिथौरागढ़ जिले की धारचूला तहसील से लगातार मौत की खबरें आ रही हैं।

यह जानलेवा बारिश बीते शनिवार से शुरू हुई थी, जब मौसम विभाग ने राज्य में 20 दिन पहले मानसून पहुंचने का ऐलान किया था। सोमवार तक लगातार आफत बरसती रही। रविवार शाम से नदियों के कहर बरपाने की खबरें आने लगीं। रविवार देर रात केदारनाथ घाटी में तबाही की सूचनाएं आयीं, पर यहां प्रकृति ने इस तरह तहस-नहस कर दिया है, यह मंगलवार को तब पता चला, जब सेना के हेलीकॉप्टर इस इलाके में पहुंचे। पूरा केदारनाथ कस्बा मंदाकिनी, सरस्वती, मधु, गंगा और क्षीर गंगा में एक साथ आयी बाढ़ से तबाह हो गया। एक मोटे अनुमान के अनुसार रविवार के दिन इस घाटी के अलग-अलग स्थानों पर करीब तीस हजार यात्राी और स्थानीय लोग थे। इनमें से कितने लोग अपनी जान बचा पाए और कितने काल के गाल में समा गए, इसकी आधिकारिक जानकारी अब तक सरकार के पास नहीं है।

केदारघाटी के अलावा चमोली जिले का गोविन्द घाट इस प्राकृतिक त्रसदी का शिकार बना। यहां जनहानि कम हुई, पर हेमकुंड साहिब जा रहे सिख श्रद्धालुओं की ढाई सौ से ज्यादा छोटी-बड़ी गाड़ियां अलकनंदा बहा कर ले गई। पिथौरागढ़ जिले की धारचूला तहसील में काली नदी ने तबाही मचायी।

इस सबसे बड़ी त्रासदी में यह खास बात देखी गई कि बारिश का सबसे अधिक कोप राज्य के ऊंचाई वाले क्षेत्रों पर बरपा। हिमालय से निकलने वाली नदियों में इतनी अपार जलराशि एक साथ आयी कि नदियों का बहाव मापने के पैमाने तक जलमग्न हो गए।

कुदरत के कहर से कांपी केदारघाटी
कुदरत के कहर ने सर्वाधिक तबाही केदारघाटी में मचाई है। यहां मंदाकिनी नदी ने रामबाड़ा, सोनप्रयाग को नक्शे से मिटा दिया। गौरीकुंड, अगस्त्यमुनि का आधा बाजार नदी में समा गया। रुद्रप्रयाग में कई घर और पुल नदी बहा कर ले गई। मंदाकिनी के कहर से मारे गए लोगों का ठीक-ठीक आंकड़ा तक सरकार के पास अब तक नहीं है।

गोविन्द घाट दोबारा तबाह
गोविन्द घाट में 30 जून 2005 में बादल फटने की घटना के बाद 14  लोग मारे गए और 24 से ज्यादा गाड़ियां बह गई थीं। इस बार यहां जनहानि का आंकड़ा कम है, लेकिन एक हेलीकॉप्टर और 250 गाड़ियां अलकनंदा के वेग में समा गईं।

अलकनंदा ने फिर दिखाया रौद्र रूप
उत्तराखंड में बाढ़ों की दृष्टि से सबसे अधिक आक्रांत अलकनंदा घाटी एक बार फिर चपेट में है। श्रीनगर में 1970 के बाद अलकनंदा का पानी बाजार तक घुस आया। 70 से अधिक आवासीय घर, एसएसबी के कई भवन अलकनंदा की भेंट चढ़ गए।

धारचूला में बादल फटने से कहर
कुमाऊं मंडल में धारचूला प्रकृति की इस तबाही  का सबसे अधिक शिकार हुआ है। मंगलवार को यहां छिपलाकेदार में बादल फटने से कीड़ाजड़ी निकालने गए नौ लोग मलबे में दब कर मारे गए। धारचूला में काली नदी में एनएचपीसी की कॉलोनी का बड़ा हिस्सा बह गया। बलुवाकोट में नेपाल को जोड़ने वाला पुल भी काली में समा गया।

विकराल होती जा रही आपदाएं
यदि केवल पिछले पांच साल के भीतर हुई प्राकृतिक आपदाओं से हुए नुकसान पर नजर डालें तो यह साफ हो जाता है कि हिमालय क्षेत्र में प्राकृतिक आपदाओं की संख्या और इनकी मारक क्षमता बढ़ती जा रही है। पर्यावरण के विशेषज्ञ इसके लिए हिमालयी क्षेत्र में मनुष्य के बढ़ते हस्तक्षेप, वन विनाश, बिजली परियोजनाओं के बेतरतीब निर्माण को मुख्य वजह बताते हैं। वैज्ञानिकों का एक धड़ा इसके लिए ग्लोबल वार्मिग को जिम्मेदार ठहराता है। उन्हीं का एक वर्ग ऐसा भी है, जो उत्तराखंड के भूगोल को इस क्षेत्र में मूसलाधार बारिश को जिम्मेदार ठहराता है। कुमाऊं विश्वविद्यालय में भूगोल विभाग के प्रोफेसर जीएल साह कहते हैं कि उच्च हिमालय में नम हवाओं को जब आगे बढ़ने की जगह नहीं मिलती तो ये पहाड़ों से टकरा कर बादल का रूप लेकर बरसने लगती हैं। असल कारण क्या है? क्या इन घटनाओं से बचाव के कोई उपाय किए जा सकते हैं? यह बातें अभी सरकारों की चिंता में शामिल नहीं हो सकी हैं। हर आपदा के बाद सर्वे करके संवेदनशील स्थानों को चुनने और वहां बचाव का सिस्टम मजबूत करने की बात की जाती है, पर आपदा के निशान ठंडे पड़ते ही यह वादे भुला दिए जाते हैं।

पिछले पांच साल में हुई बड़ी घटनाएं
1. 11 और 18 अगस्त 1998 को ऊ खीमठ क्षेत्र में हुए भूस्खलनों से घाटी के दर्जनों गांव जमींदोज। 109 लोग मारे गए।
2. 6 अगस्त 2009 को मुनस्यारी के पास ला-ङोकला गांव में भूस्खलन से 42 लोगों की जान गई। इस घटना में 7 लोग लापता हुए और आधा दजर्न गांव पूरी तरह तबाह हो गए।
3. 18 अगस्त, 2010 को बागेश्वर के सुमगढ़ में भारी बारिश के बाद आए मलबे में दब कर 18 स्कूली बच्चों की मौत हुई। इसी साल अल्मोड़ा और इसके आसपास के गांवों में बारिश के बाद हुए भूस्खलन में 24 से अधिक लोग मारे गए।
4. पिछले साल 3 और 9 अगस्त की रात उत्तरकाशी में असी गंगा घाटी में बादल फटने के बाद गंगोरी, संगमचट्टी क्षेत्र में आयी बाढ़ में 31 लोग मारे गए।
5. 13 सितंबर को बादल फटने से ऊखीमठ के आसपास कई गांव तबाह, 70 लोगों की मौत

 

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