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खूब रास आयी दिल्ली

मर्चेट ऑफ वेनिस, मैकबेथ, ओथेलो, महानिर्वाण जैसे नाटकों के माध्यम से थिएटर प्रेमियों के दिल में अपनी खास जगह बनाने वाले लोकप्रिय युवा रंगकर्मी रोयस्टेन ऐबल लगभग 23 साल से दिल्ली में हैं, उनसे सत्यसिंधु की बातचीत।

दिल्ली आपको कैसी लगती है?
दिल्ली मुंबई से तो अच्छी ही लगती है। मुंबई में आप प्रवेश करते हैं तो उतना अच्छा महसूस नहीं होता, लेकिन दिल्ली में प्रवेश करते ही काफी आत्मीय सा माहौल लगता है जहां का वातावरण भी काफी खुला खुला सा महसूस होता है। वैसे दोनों शहरों में कोई तुलना नहीं है, लेकिन मुझे यह एक प्रमुख कारण लगता है। यहां हमारे काफी दोस्त है, यहीं एनएसडी में पढ़ा जिस कारण अपनी पूरी दुनिया यहां नजर आती है। एक कलाकार के रूप में भी मैं यहीं आगे बढ़ पाया हूं, इसलिए भी बहुत अच्छा लगता है शहर।

दिल्ली से आपकी पहचान कब हुई?
मैं तो केरल का रहने वाला हूं जहां रहते हुए दिल्ली के बारे में सुना जरूर करता था कि यहां का मौसम बड़ा अलग है। काफी आबादी है, काफी अच्छे लोग हैं, लेकिन जब मैं लगभग 23 साल पहले एनएसडी में प्रवेश लेने के लिए दिल्ली आया तो काफी कुछ भिन्न लगी थी दिल्ली। तब यहां पावर कट नहीं होता था। उस समय दिल्ली हर तरह से अच्छी लगती थी। वैसे इस बात में भी कोई संदेह नहीं कि भारत में अभी भी दिल्ली सबसे अच्छा शहर है।

मुझे पहले दिल्ली आने में डर लगता था। स्कूली पढ़ाई ऊटी में और कॉलेजी पढ़ाई बेंग्लुरु में की जो काफी अच्छी जगहें थीं। उनकी तुलना में दिल्ली के बारे में काफी गलत ही सुना था। मौसम से लेकर व्यवस्था तक के बारे में तरह-तरह की बातें सुनी थीं जो परेशान करने वाली थीं। मैं जून में दिल्ली पहली बार आया था तो गर्मी से सामना हुआ। रात में 8-10 बार स्नान करना पड़ता था। कई बार तो गीले कपड़े पहनकर सो जाया करता था। वह ऐसा समय था जब दिल्ली से मेरी पहचान हो रही थी और बिल्कुल अलग अनुभव मिल रहे थे।

दिल्ली की ऐसी बातें जिन्हें आप कभी भूल नहीं पाते?
अभी मुझे दिल्ली की सर्दी बहुत पसंद है। यह मौसम इतना पसंद आया कि गर्मी की परेशानियों को भूल गया। कलाकारों के लिए तो यह शहर बहुत ही अच्छा है जहां विविधतापूर्ण संस्कृति से लेकर देशभर के लोग रहते हैं। यह विविधतापूर्ण संस्कृति हम कलाकारों के लिए बड़ी खास होती है, जो मुझे बहुत पसंद है। यहां के लोग भी अन्य शहरों की तुलना में अच्छे लगते हैं जिनका व्यवहार बड़ा ही आत्मीय होता है।

इन वर्षों में आप दिल्ली में क्या-क्या बदलाव महसूस करते हैं?
दिल्ली में ट्रैफिक काफी बढ़ गया है। राजधानी है तो हर किसी को आकर्षित करती है। लेकिन जिस रफ्तार से दिल्ली बदल रही है उसको देखते हुए लगता है कि 20 साल बाद दिल्ली रहने लायक जगह नहीं रह जाएगी।

यहां के सांस्कृतिक माहौल में क्या परिवर्तन पाते हैं?
तब यहां काफी सांस्कृतिक गतिविधियां हुआ करती थी। हर तरह के सांस्कृतिक कार्यक्रम यहां होते थे। इस कारण मैं कह सकता हूं कि मेरा आर्टिस्टिक ग्रोथ भी दिल्ली में हुआ। तब कलाकार शौकिया हुआ करते थे और अपने मन का काम कर लेते थे। लेकिन अब सारा माहौल ग्लोबल हो जाने के कारण संस्कृति पर भी उसका असर पड़ा है। इसका लाभ भी हुआ है। तब हमारे पास पैसे नहीं होते थे और हम किसी कलाकार को भी पैसे नहीं दे पाते थे, लेकिन अब पैसा ज्यादा हावी हो गया है। इन्सानियत में कमी आई है। 70-80 के दौर में रंगकर्मियों की दुनिया अलग होती थी। नाटक तो आज भी 70 और 80 के अंदाज में ही हो रहे हैं, लेकिन व्यावसायिक नजरिया बदल गया है। हमारे समय तक लोग काफी जुनूनी काम करते थे, जिसमें पैसे के अलावा भी चीजें मायने रखती थीं, लेकिन अब लोग सिर्फ पैसे के लिए काम करना चाहते हैं।

समय मिले तो आप यहां किन-किन जगहों पर बार-बार जाना पसंद करेंगे?
पुरानी दिल्ली मुझे अभी भी काफी आकर्षक लगती है। एक अलग सी दुनिया है वहां। चितरंजन पार्क में एक अलग ही बंगाली दुनिया है। मयूर विहार के फेज 1 में केरल के लोग बसे हुए हैं। इस तरह से पूरे देश की संस्कृति यहां मिल जाती है जो मुझे काफी अच्छी लगती है। मैं तो बाहर ज्यादा जा नहीं पाता, कभी-कभी दोस्तों के घर चला जाता हूं। पहले अड्डेबाजी बहुत हुआ करती थी, लेकिन अब वह भी बहुत कम हो गयी है। अब कभी कभार ही एनएसडी के कैंपस में नीम के पेड़ के नीचे आयोजित होने वाले एनके शर्मा के गैंग में बैठ पाता हूं। इस गैंग में शामिल होना पहले एक खास अनुभव हुआ करता था।

और खाने पीने की कौन कौन सी जगहें पसंद हैं?
सबसे पहले तो करीम का मटन बर्रा बहुत पसंद आता है। यहां शुरू से ही काफी जाता रहा हूं। इसके अलावा बंगाली मार्केट में नाथू के छोले भटूरे खाना काफी पसंद आता था, लेकिन अब उतना नहीं जा पाता। भीकाजी कामा प्लेस के पास एक जगह है ‘ओ कलकत्ता’, जहां जाकर बंगाली आइटम खाना काफी पसंद है। इंपीरियल होटल के स्पाइट रूट में केरल के व्यंजन खाना अच्छा लगता है।

आपकी पूरी दिनचर्या क्या होती है?
यह तो काम पर निर्भर करता है। किसी प्रोजेक्ट पर काम कर रहा होता हूं, तो अलग ही दिनचर्या होती है। बाकी दिनों में लिखना-पढ़ना और फिल्म देखना काफी अच्छा लगता है जिसमें ज्यादा समय बीतता है। आजकल एक नए प्रोजेक्ट को लेकर व्यस्तता रहती है। द सोल किचेन नामक यह नाटक अगस्त में होने वाला है। बिना संवाद के इस नाटक में हमारा शरीर पात्र बनता है।

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