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चौरी-चौरा कांड: एक लावारिस पन्ना

चौरी-चौरा कांड आजादी के आंदोलन का एक परित्यक्त अध्याय है। यह हमारे राष्ट्रीय इतिहास का एक लावारिस पन्ना है, जिसकी विरासत पर किसी का कोई दावा नहीं। यह कलंक भी चौरी-चौरा के ही माथे है कि बापू को असहयोग आंदोलन इसी कांड के चलते स्थगित करना पड़ा। यह कथित कलंक ही है, जिसके चलते चौरी-चौरा कांड का कभी कोई ठोस विश्लेषण नहीं हुआ। हमारी स्मृतियों में बस यह एक ऐसी वारदात की तरह दर्ज है, जिसमें एक थाना फूंक दिया गया, थाने में मौजूद 23 पुलिसवाले जल मरे। वह तारीख थी 4 फरवरी, 1922। उपेक्षा की हद देखिए कि बहुत-सी स्मृतियों में लंबे समये तक यह वारदात 5 फरवरी की तारीख पर भी दर्ज रही, वह भी तब, जबकि इसका मुकदमा गोरखपुर जिला जेल से लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट के आखिरी फैसले तक तकरीबन एक साल तक लगातार चला। ..दरअसल 1972 तक तो चौरी-चौरा की घटना को देखने का नजरिया ही नहीं विकसित हो सका था। 50 साल बाद उसे किसी तरह राष्ट्रीय आंदोलन में गोरखपुर के योगदान के नाम पर संलग्नक की तरह शामिल किया गया। ..इतिहास उपेक्षा की नहीं, खंगालने की चीज है। अगर आप उसकी उपेक्षा करते हैं, तो वह आपकी उपेक्षा कर देगा। अगर आप उसे नष्ट करेंगे, तो वह आपकी आने वाली नस्लों को नष्ट कर देगा। लिहाजा चौरी-चौरा आज चीख-चीखकर अपने निरपेक्ष विश्लेषण की मांग कर रहा है। यह विश्लेषण वह तमाम सच सामने लाएगा, जिन पर जान-बूझकर परदा डाल दिया गया।
 

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  • Web Title:An unclaimed panna