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मतभेद के बावजूद मनभेद नहीं रखते थे बापू

मतभेद के बावजूद मनभेद नहीं रखते थे बापू

आजादी की लड़ाई में साधन और उपायों को लेकर अनेक नेता महात्मा गांधी के विचारों से सहमत नहीं थे, लेकिन बापू ने कभी भी इन मतभेदों को मनभेद में नहीं बदला। जवाहरलाल नेहरू, नेताजी सुभाष चन्द बोस, बी आर अंबेडकर, और मोहम्मद अली जिन्ना से मतभेदों के बावजूद गांधी उनके योगदान और समर्पण की सराहना करते थे।
     
गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति की ओर से आयोजित गांधी कथा में बापू के प्रिय सचिव महादेवभाई देसाई के पुत्र नारायणभाई देसाई ने कहा कि देश निर्माण में सबसे अंतिम जन से समाज कल्याण की बात पर अडिग रहने के कारण अनेक कांग्रेसी नेताओं के महात्मा गांधी से मतभेद हो जाते थे। लेकिन बापू उनके मतभेद को स्वीकर करते हुये भी मनभेद नहीं पैदा होने देते थे। 
      
गांधी कथा प्रसंग में उन्होंने बताया कि एक बार अपेन्डिक्स के कारण बापू गंभीर रूप से बीमार हो गये। पुणे के चिकित्सकों ने उन्हें तुरंत ऑपरेशन कराने की सलाह दी। उन दिनों यह एक भयंकर बीमारी मानी जाती थी। चिकित्सकों ने बापू से ऑपेरेशन के समय अपने संबंधियों को बुलाने की बात कही, ताकि इलाज के दौरान उनकी देखभाल की जा सके।
     
ऑपरेशन तुरंत किया जाना था और साबरमती से किसी को बुलाने का समय नहीं था। जब गांधी से उनके प्रिय संबंधियों के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने अपने विचारों से असहमत रहने वाले और राजनीतिक रूप से विरोध करने वाले एन सी केलकर, श्रीनिवास शास्त्री और खादी भंडार में चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी हरि का नाम सुक्षाया। उस समय सभी पुणे में रहते थे, और ऑपरेशन के समय जल्द से जल्द अस्पताल पहुंच सकते थे।
      
नारायणभाई देसाई ने कहा कि एन सी केलकर उस समय लोकमान्य बालगंगाधर तिलक के अनुयायी थे और राजनीतिक रूप से गांधी के विरोधी माने जाते थे। इसके अलावा विद्धान पंडित श्रीनिवास शास्त्री भी गांधी के दर्शन से सहमत नहीं थे। तीसरा नाम हरि का था, जिसकी महात्मा गांधी के प्रति अगाध श्रद्धा थी।
     
बहरहाल उन सभी के अस्पताल पहुंचने के बाद ऑपरेशन किया गया। हालांकि बिजली गुल हो जाने से ऑपरेशन के थोड़ा व्यवधान हुआ, लेकिन चिकित्सकों ने लालटेन के प्रकाश में इसे सफलता पूर्वक संपन्न किया।
      
जब ऑपरेशन के बाद बापू से पूछा गया, कि आपने अपने कठिन समय में भी अपने विरोधियों को ही क्यों बुलाया, तो गांधी ने कहा कि भले ही यह लोग मेरे विचारों से सहमत नहीं हों, लेकिन इन सभी का स्वराज प्राप्ति का ध्येय समान है।
      
देसाई के अनुसार बापू ने कहा कि बेहतर समाज के निर्माण के लिए वाद, विवाद, संवाद के बीच सहमत और असहमत होना एक बात है, लेकिन हम सभी एक ध्येय के लिए काम कर रहे हैं और हमारे बीच किसी प्रकार के मनभेद का स्थान नहीं होना चाहिए।

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