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25 अक्तूबर, 2020|7:15|IST

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अस्थमा है? इस मौसम में संभलकर रहें

बारिश का मौसम सामने है। यह मौसम अस्थमा के मरीजों को सबसे ज्यादा सताता है और उनकी तकलीफ 50 फीसदी तक बढ़ जाती है। इस मौसम के दुष्प्रभाव से कैसे करें अपना बचाव, बता रही हैं मृदुला भारद्वाज

आमतौर पर सांस की नली के ऊपरी हिस्से में तीव्र संक्रमण होने पर अस्थमा का दौरा पड़ता है। इसे गंभीरता से नहीं लिया जाता। लेकिन मामूली बीमारी समझकर इसकी अनदेखी करना उचित नहीं है। अस्थमा का दौरा कई कारणों से पड़ सकता है। घर या घर के बाहर किसी वजह से एलर्जी, धूल, मिट्टी, घास, कॉकरोच, कुत्ते, बिल्ली जैसे बालों वाले जानवरों से होने वाली एलर्जी आदि इस दौरे का कारण बन सकती है, वहीं मौसमी बदलाव भी इसके लिए काफी जिम्मेदार होता है। मानसून और अक्तूबर-नवम्बर में यह समस्या काफी बढ़ जाती है।

श्रीबालाजी एक्शन मेडिकल इंस्टीट्यूट के रेस्पिरेटरी विभाग के सीनियर कंसल्टेंट डॉं अनिमेष आर्य कहते हैं कि मौसम परिवर्तन के साथ फंगस और बैक्टीरिया भी अधिक तेजी से सक्रिय हो जाते हैं। ऐसे में अस्थमा के मरीजों के लिए खतरा और बढ़ जाता है। इस वक्त अस्थमा के छोटे ही नहीं, बड़े अटैक भी पड़ सकते हैं। ऐसे में खुद को बचाने के लिए प्रिवेंटर या कंट्रोलर इन्हेलर का इस्तेमाल करें। मौसम में बदलाव के एक या डेढ़ महीने पहले ही इसे लेना शुरू कर देना चाहिए।
 
क्या है अस्थमा
ऐसे लोगों में आमतौर पर घबराहट, तेज खांसी, सांस लेने में तकलीफ और घुटन जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। फेफड़ों तक हवा पहुंचाने वाली टय़ूब में रुकावट, सूजन, रूखापन आदि के कारण ऐसा होता है।
 
इसका कारण
अस्थमा के कारणों को जानकर इसे खुद नियंत्रित किया जा सकता है, मगर आमतौर पर जागरूकता के अभाव में लोग ऐसा नहीं कर पाते। यही वजह है कि अस्थमेटिक अटैक के मामले भी बढ़ते जा रहे हैं।  अब तो बच्चे भी इसकी गिरफ्त में आते जा रहे हैं। डॉं आर्य कहते हैं कि वातावरण का प्रदूषण इसके लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार है। यही वजह है कि चाहे गांव हो या शहर, सब जगह यह समस्या सामान्य रूप से देखी जा रही है। लेकिन बचाव के उपायों को ध्यान में रखकर खुद ही अस्थमा को नियंत्रित किया जा सकता है।

उपचार
अस्थमा के इलाज के लिए कुछ दवाओं व इन्हेलर का इस्तेमाल किया जाता है। इससे सांस की नली और फेफड़ों की जकड़न खुल जाती है और मरीज आराम से सांस ले सकता है। डॉ. आर्य कहते हैं कि कुछ लोगों में इस बात की गलतफहमी होती है कि इन्हेलर का इस्तेमाल आपको इसका आदि बना देता है। ऐसा न सोचें।

इन्हेलर की आदत नहीं पड़ती बल्कि ये भी एक दवा ही है। कई बीमारियों में मरीज को सारी जिंदगी कोई न कोई दवा खानी ही पड़ती है। इसी तरह अस्थमा के मरीजों के लिए भी इन्हेलर है जो उन्हें अस्थमा के अटैक के दौरान शीघ्र आराम पहुंचाता है।

इन बातों का रखें ख्याल
जिन चीजों से एलर्जी हो उनसे दूर रहें। जैसे कुछ लोगों को पालतू जानवरों, पुरानी किताबों की गंध, परफ्यूम, अगरबत्ती, धूपबत्ती आदि से भी एजर्ली होती है।
ठंडी हवा, धूल या नमी से बचकर अस्थमा अटैक को रोका जा सकता है।
अस्थमा का असर जब ज्यादा हो तब सीढ़ियां धीरे-धीरे चढें। समय-समय पर वजन की जांच करते रहें।
खूब पानी पिएं और कोल्ड व फ्लू से बचें।

समय पर खाएं
अदरक, तुलसी का पानी फायदेमंद है।
व्यायाम की जगह हल्के योग करें।
अस्थमा की एक वजह गलत खान-पान भी हो सकता है।
तला और बाहर बना या खुला खाना  खाने से बचें।
मैदा, सूजी, चिप्स और मछली खाने से बचें।

बचाव के उपाय
सभी तरह की सांस की समस्या अस्थमा नहीं होती, कार्डिएक अस्थमा भी हो सकता है।
ठंडी हवा, धूल या नमी से बचकर अस्थमेटिक अटैक को रोका जा सकता है।
सिगरेट न पिएं और सिगरेट पीने वाले व्यक्ति से दूर रहें।
अस्थमेटिक लोगों को व्यायाम करते वक्त बीच-बीच में आराम करना चाहिए।
20 प्रतिशत अस्थमा के मरीजों को एस्प्रिन जैसी दवाओं से तकलीफ होती है। ऐसे लोग एसीटैमिनोफेन का इस्तेमाल कर सकते हैं।

कई तरह का अस्थमा

एलर्जिक अस्थमा
एलर्जिक अस्थमा का कारण किसी चीज से एलर्जी होता है। धूल-मिट्टी के संपर्क में आने या मौसम परिवर्तन के साथ ही आप इसके शिकार हो जाते हैं।

नॉनएलर्जिक अस्थमा
इसका कारण किसी एक चीज की अति होता है। जैसे बहुत अधिक तनाव या तेज हंसी या अधिक खांसी-जुकाम।

एक्सरसाइज इनड्यूस
अधिक एक्सरसाइज से भी अस्थमा हो जाता है। क्षमता से अधिक काम भी अस्थमा को आमंत्रित कर सकता है।

कफ वेरिएंट अस्थमा
कफ के कारण भी अस्थमा हो सकता है। कफ की शिकायत बने रहने या खांसी के दौरान कफ आने पर अटैक हो सकता है।

ऑक्यूपेशनल अस्थमा
यह अटैक काम के दौरान पड़ता है। लगातार एक तरह का काम करते रहने के कारण भी अस्थमा का दौरा पड़ सकता है। कार्यस्थल का वातावरण अनुकूल न होने पर भी अटैक हो सकता है।

नाइटटाइम अस्थमा
ज्यादातर रात में अस्थमा का अटैक पड़ने लगे तो ये नाइटटाइम अस्थमा है।

मिमिक अस्थमा
यह निमोनिया, कार्डियक जैसी स्वास्थ्य संबंधी बीमारियों में होता है।

चाइल्ड ऑनसेट अस्थमा
यह अस्थमा बच्चों को ही होता है। अस्थमेटिक बच्चा जैसे-जैसे बड़ा होता जाता है, वह इससे मुक्त होता जाता है।

एडल्ट ऑनसेट अस्थमा
ये अस्थमा अक्सर 20 वर्ष की उम्र के बाद होता है। इसका कारण एलर्जिक होता है।

20% बच्चे आते हैं चपेट में
दिल्ली के ही एक मेडिकल इंस्टीट्यूट द्वारा किए गए अध्ययन के मुताबिक दिल्ली में रहने वाले 20 प्रतिशत से अधिक बच्चे अस्थमा की चपेट में हैं। क्लिनिकल रिसर्च से यह भी पता लगा है कि अस्थमेटिक अटैक के शिकार होने वाले लोगों में बच्चों की संख्या ज्यादा होती है। दिल्ली की कुल आबादी में से लगभग चार से छह प्रतिशत बच्चे और दो से चार प्रतिशत वयस्क अस्थमा के शिकार हैं। दिल्ली की कुल आबादी में से लगभग चार से छह प्रतिशत बच्चे और दो से चार प्रतिशत वयस्क अस्थमा की गिरफ्त में हैं। अस्थमेटिक अटैक के शिकार होने वाले लोगों में बच्चों की संख्या ज्यादा होती है।

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