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सोशल साइट्स पर सख्ती संभव नहीं

फेसबुक और ट्विटर जैसी सोशल नेटवर्किग साइट्स के जरिये निजता पर हमला होने के आरोप गाहे-बगाहे लगते रहते हैं। जब भी ऐसा कुछ होता है, सोशल साइट्स पर लगाम कसने की मांग उठती है। लेकिन यह मुमकिन नहीं है।

इसके दो कारण है, पहला तो ये कि ये साइट्स दुनियाभर में युवाओं के लिए अपनी आवाज उठाने का सशक्त माध्यम बन चुकी हैं। दूसरा, तकनीकी रूप से इंटरनेट पर नियंत्रण संभव नहीं है।

फेसबुक और ट्विटर जैसी सोशल साइट्स से करोड़ों लोग जुड़े हैं। इन पर संदेश बहुत तेजी से प्रसारित होते हैं। दुनिया भर के युवा इसे अपनी आवाज उठाने का सशक्त माध्यम मानते हैं और ये भी सच भी है। मौजूदा समय में ये साइट्स लोगों के लिए अपनी ब्रांडिंग करने में मददगार बन रही हैं। ये साइट्स अभिव्यक्ति का एक विश्वव्यापी मंच हैं और संविधान ने सभी नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार दिया है। लेकिन अभिव्यक्ति का यही अधिकार कई बार किसी दूसरे की निजता पर हमला बन जाता है। इन साइट्स में आईटी सिक्योरिटी काफी कमजोर होना भी चिंता का विषय है।

सोशल साइट्स के यूजर करोड़ों में है और कई देशों में लोग इसका प्रयोग करते हैं। ऐसे में इन सब पर नजर रखना कैसे संभव है। किसी विशेष कंटेट या शब्द को तो आप फिल्टर कर सकते हैं पर विश्व के इतने देशों के लिए एक समान फिल्टर का मैकेनिज्म लाना मुश्किल है।

आजकल यूट्यूब पर अपलोड एक नेता का कथित निजी वीडियो चर्चा का विषय बना हुआ है। मामले को तूल पकड़ता देख कोर्ट ने इस वीडियो पर तुरंत प्रतिबंध लगाने के निर्देश दिए लेकिन वे प्रभावी नजर नहीं आए। हालांकि यू-ट्यूब के साथ कई अन्य वेबसाइट्स ने तो इस वीडियो को हटा लिया लेकिन सोशल नेटवर्किग साइट्स पर इसे नियंत्रित नहीं किया जा सका।

वैसे ये साइट्स कई बार काफी मददगार भी साबित होती हैं। कुछ महीने पहले एक मामले में पुलिस ने अपराधी के फेसबुक अकाउंट से उसकी लोकेशन जांची थी। अपराधी जब भी फेसबुक लॉगइन करता था उसके आईपी एड्रेस से लोकेशन की जानकारी मिल जाती थी। एक बड़ा सच है कि इंटरनेट व्यक्ति की जिंदगी का सबसे अहम हिस्सा हो गया है। अब ये आम आदमी पर भी निर्भर है कि इसे कैसे नियंत्रित करें।
(आशीष मिश्र से बातचीत पर आधारित)

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