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कविता का सच राजनीति का झूठ

नोबेल पुरस्कार विजेता जर्मन लेखक गुंटर ग्रास की एक कविता ने साहित्य ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भी तूफान खड़ा कर दिया है। इजराइल ने तो ग्रास के अपने यहां आने पर पाबंदी लगा दी है। ग्रास ने इस कविता में ईरान और इजराइल के बीच द्वंद्व में पश्चिमी समाज और सरकारों के पूर्वाग्रहों पर सवाल खड़े किए हैं। यहां प्रस्तुत है इस विवाद पर प्रभात रंजन की टिप्पणी और विवादित कविता के कुछ अंश

सलमान रुश्दी ने जर्मन लेखक गुंटर ग्रास के बारे में लिखा है कि ग्रास जब साहित्य के बारे में लिखते हैं तो उसमें राजनीति के सवाल महत्वपूर्ण हो जाते हैं, जब वे राजनीति के बारे में लिखते हैं तो उसमें साहित्यिकता के सवाल मुखर होने लगते हैं। अभी हाल में गुंटर ग्रास ने  एक कविता लिखी और दुनिया भर में बवाल मच गया। केवल बौद्धिक हलकों में नहीं, राजनीतिक इदारों में भी। ग्रास मूलत: राजनीतिक लेखक माने जाते हैं। एक ऐसे राजनीतिक लेखक, जिनके लेखन में द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जर्मनों द्वारा किए गए नाजी नरसंहार का पश्चाताप दिखाई देता है, जिसने यूरोपीय श्रेष्ठता के दंभ का मखौल उड़ाया और और राजनीतिक रूप से ‘करेक्ट’ होने की कोशिश की। ‘महावृत्तांतों’ पर सदा संदेह किया और झूठ के मलबे से सच के निर्माण करने का प्रयास किया।

लेकिन यह हर राजनीतिक लेखक की मुश्किल होती है कि कभी-कभी उसकी राजनीति गलत भी हो जाती है या गलत समझ ली जाती है। यही हाल ग्रास की कविता ‘व्हाट मस्ट बी सेड’ के प्रकाशन के बाद हुआ है। कविता में उन्होंने लिखा है, आणविक शक्ति से संपन्न इजरायल से इस नाजुक दुनिया के अमन-चौन को खतरा है? एक जर्मन लेखक का इजरायल के बारे में ऐसा लिखना, उस इजरायल के बारे में, राष्ट्र के रूप में जिसका निर्माण ही जर्मन नाजियों के सताए हुए यहूदियों द्वारा किया गया, अपने आप में बहसतलब बन गया है। हालांकि गुंटर ग्रास ने साफ किया है कि उनकी यह कविता इजरायल के खिलाफ नहीं है, बल्कि उसकी वर्तमान नेतन्याहू सरकार के खिलाफ है, उसकी नीतियों के खिलाफ है, जिसकी वजह से मध्य-पूर्व में एक बड़े युद्ध का अंदेशा बढ़ता जा रहा है, जिसकी वजह से दुनिया में धर्म के आधार पर ध्रुवीकरण बढ़ता जा रहा है। ‘सभ्यताओं के संघर्ष’ की जो बात अमेरिकी विद्वान सैमुएल हंटिंगटन ने लिखी थी, उसका अंदेशा बढ़ता जा रहा है।

जाहिर है, कविता का तात्कालिक संदर्भ ईरान पर इजरायल का संभावित हमला हो सकता है। इसकी तात्कालिक प्रतिक्रिया स्वरूप इजरायल ने गुंटर ग्रास को अपने यहां प्रतिबंधित कर दिया है। अनेक बौद्धिक उनकी कविता, उसमें व्यक्त विचारों को गुंटर ग्रास के उस अतीत से जोड़कर देख रहे हैं, जिसका खुलासा उन्होंने स्वयं 2006 में किया था। तब उन्होंने कहा था कि 18 साल की उम्र में वे नाजी सेना के सदस्य बने थे, कि उनका नाजी अतीत रहा है। 84 साल की उम्र में उनका वह अतीत फिर से मुखर हो गया है, कि असल में वे यहूदी विरोधी हैं, इसलिए उन्होंने एक ऐसी कविता लिखी जो कविता कम राजनीतिक बयान अधिक लगता है।

हालांकि कविता में गुंटर ग्रास अपनी जन्मभूमि के कुछ पुराने दागों की चर्चा कर उस जर्मन अतीत की याद दिलाते हैं, जो यहूदियों पर किए गए अत्याचारों का गवाह रहा। पश्चिम का बौद्धिक समाज उनसे यह सवाल फिर भी पूछ रहा है कि क्या इजरायल को मानवता के लिए खतरा बताना अपने आप में यहूदी विरोधी वक्तव्य नहीं है? गुंटर ग्रास का कहना है कि उनकी कविता का संबंध किसी नस्ल विशेष से नहीं, बल्कि राष्ट्र विशेष से है, लेकिन यह सच्चाई तो है ही कि इजरायल नामक राष्ट्र का जन्म ही धर्म के आधार पर हुआ। ऐसे में उनके वक्तव्य को नस्ल के विरोध में क्यों नहीं माना जाना चाहिए?

1983 में दिए गए एक भाषण में गुंटर ग्रास ने जर्मनी के भविष्य के लिए हिंसा और अत्याचार के उस अतीत से मुक्ति की बात कही थी, जिसने जर्मन इतिहास को जैसे जकड़ रखा है, लेकिन लगता है गुंटर ग्रास का अतीत उनका पीछा नहीं छोड़ रहा है। इजरायल की मौजूदगी का संबंध जर्मनी के उस अतीत से गहरे जुड़ा है।

बहरहाल, भारत सहित दुनिया के अनेक देशों के बौद्धिक समाज में गुंटर ग्रास की इस कविता का स्वागत किया जा रहा है। इसका एक कारण तो यह माना जा रहा है कि वास्तव में इजरायल मध्य-पूर्व में अमेरिकी चौधराहट का प्रतीक है। आणविक क्षमता से संपन्न इजराइल के माध्यम से अमेरिका उस ईरान को काबू में करना चाहता है, जिसके बारे में यह कहा जा रहा है वह चोरी-छिपे एटम बम बना रहा है। इसलिए गुंटर ग्रास की कविता को साम्राज्यवादी शक्तियों के खिलाफ माना जा रहा है। उन साम्राज्यवादी शक्तियों के विरुद्ध जो इस्लाम को दुनिया में बढ़ते आतंकवाद की जड़ मानते हैं और इसीलिए उसे मानवता के लिए सबसे बड़ा खतरा। ईरान को उस विचार का केंद्र माना जाता है, इसलिए ईरान को इजरायल के माध्यम से नाथने की तैयारी चल रही है।

गुंटर ग्रास ने एक कविता के माध्यम से पश्चिम समाज की इस राजनीति को उघाड़कर रख दिया है। यह तो दिखा ही दिया है कि उदारवादी प्रजातंत्र के हामी अधिकतर पश्चिमी देश असल में कितने कट्टर हैं, कितने असहिष्णु हैं? कविता अपने आपमें युद्ध की बात नहीं करती, शांति की बात करती है, जो इस समय मंदी और बेरोजगारी से जूझ रहे पश्चिमी समाज के लिए बहुत आवश्यक है, जिससे वहां सतत विकास संभव हो सके। इस कविता का इजरायल एक ऐसा प्रतीक है, जिसके युद्ध की आकांक्षा दुनिया को आगे ले जाए या न ले जाए,पीछे अवश्य ले जायेगी। ऐसा मानने वालों की कमी नहीं है।

ऐसे समय में जब साहित्य अपने आप में ‘कमॉडिटी’ में बदलता जा रहा है, वह मुनाफे के बाजार का कारोबार बनता जा रहा है - क्या लेखक की ‘पॉलिटिक्स’ के कुछ मायने हो सकते हैं? क्या लेखक को इस तरह सीधे-सीधे राजनीति में पड़ना चाहिए? गुंटर ग्रास ने लिखा है कि एक लेखक को अपने समय के यथार्थ का सामना करना चाहिए। राजनीतिक यथार्थ इस यथार्थ से अलग नहीं होता और इस यथार्थ से मुठभेड़ उससे दूरी बनाकर नहीं किया जा सकता, लेकिन उन्होंने लेखकों को इससे भी आगाह किया था कि लेखकों को राजनीतिक बयानबाजी से बचना चाहिए। उसके पास साहित्य के विविध रूप होते हैं, जिनके माध्यम से वह अधिक विश्वसनीय तरीके से व्यापक समाज तक अपनी बात पहुंचा सकता है। अकारण नहीं है कि अपनी बात कहने के लिए गुंटर ग्रास ने कविता का माध्यम चुना और एकध्रुवीय होती जा रही विश्व राजनीति के ध्रुवांतों को स्पष्ट कर दिया। साहित्य के एक ‘सच’ ने राजनीति के बड़े ‘झूठ’ को उजागर कर दिया।

मैं चुप क्यों रहा, क्यों छुपाता रहा इतने लंबे समय तक
वह खुला राज़
जिसे बरता गया बार-बार जंगी मैदानों में, और
जिसके अंत में जो बचे हम
तो हाशिए से ज्यादा कुछ भी नहीं थी हैसियत हमारी

जोर-जोर से चीख कर
उन्होंने खड़ा कर दिया एक उत्सव सा कुछ
जिसमें दब गई ये बात, कि
यह पहले हमला करने का कथित अधिकार ही है
जो मिटा सकता है ईरानी जनता को-
क्योंकि उनकी सत्ता का दायरा फैला है
एक न्यूक्लियर बम बनने की आशंकाओं के बीच
वे मानते हैं कि ऐसा जरूर कुछ हो रहा है
..

अब, चूंकि मेरा देश
जो एक नहीं, कई बार साक्षी रहा अपने अपराधों का-
(और इसमें इसका कोई जोड़ नहीं)
बदले में यदि विशुद्ध व्यावसायिक नजरिए से ही
विनम्र होठों से इसे करार देकर प्रायश्चित
इजराइल को न्यूक्लियर पनडुब्बी भेजने का करता हो ऐलान
जिसकी खूबी महज इतनी है
कि वह दाग सकती है तमाम विनाशक मिसाइलें वहां
जहां एक भी एटम बम का वजूद अब तक नहीं हुआ साबित
लेकिन डर, ऐसा ही मानने पर करता है मजबूर बासबूत
तो यह कह डालूंगा मैं वो बात
जो अब कही जानी चाहिए।

लेकिन अब तक मैं खामोश क्यों रहा ?
इसलिए, क्योंकि मेरी पैदाइश की धरती
जिस पर जमे हैं कभी न मिटने वाले कुछ दाग
रोकती थी मुङो कहने से वो सच
इजराइल नाम के उस राष्ट्र से, जिससे बिधा था मैं
और अब भी चाहता ही हूं बिधे रहना।
..

लिहाजा, तोड़ दी है अपनी चुप्पी मैंने
क्योंकि थक गया हूं मैं पश्चिम के दोगलेपन से;
इसके अलावा, एक उम्मीद तो है ही
कि मेरी आवाज तोड़ सकेगी चुप्पी की तमाम जंजीरों को
और आसन्न खतरा बरपाने वालों के लिए होगी एक अपील भी
कि वे हिंसा छोड़, जोर दें इस बात पर
कि इजराइल की न्यूक्लियर सामथ्र्य और ईरान के ठिकानों पर
दोनों देशों की सरकारों को मान्य एक अंतरराष्ट्रीय एजेंसी
की रहे निगरानी स्थायी और अबाधित।

एक यही तरीका है
कि सभी इजराइली और फलस्तीनी
यहां तक कि, दुनिया के इस हिस्से में फैली सनक के बंदी
तमाम लोग
रह सकें साथ मिल-जुल कर
दुश्मनों के बीच
और जाहिर है, हम भी
जिन्होंने अब खोल दी है अपनी ज़बान।
(कविता के संपादित अंश, अनुवाद : अभिषेक श्रीवास्तव)

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