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दरकती हवेलियों-सी राष्ट्रीय पार्टियां

मत कहो आकाश में कोहरा घना है/ यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है। दुष्यंत की ये पंक्तियां केंद्र सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु पर फिलवक्त पूरी तरह खरी उतरती हैं। कैसे? बताता हूं।
 
कौशिक बसु ने वाशिंगटन में एक समारोह में पिछले दिनों खेद प्रकट किया कि गठबंधन की सरकारों की वजह से आर्थिक सुधारों के एजेंडे को अमलीजामा पहनाने में परेशानी हो रही है। उन्होंने उम्मीद जताई कि 2014 के आम चुनाव एक बहुमत संपन्न सरकार को नई दिल्ली की सत्ता सौंपेंगे और अपना भारत आर्थिक महाशक्ति बनने की दिशा में लंबी छलांग लगा सकेगा। वह एक अर्थशास्त्री हैं और अपने काम को जिम्मेदारी से निभाने के लिए जाने जाते हैं। उनका बयान गठबंधन की राजनीति की जानलेवा त्रासदी को व्यक्त करता है।

उम्मीद के अनुरूप विपक्ष ने उनकी इस पीड़ा को समझने, सराहने और उसे दूर करने में सहयोग देने की जगह उसे सियासत के दलदल में घसीट लिया। अब सरकार पर अक्षमता और निर्णयविहीनता के आरोप लगाए जा रहे हैं। पता नहीं क्यों, हमारे नेता हर बार यह भूल जाते हैं कि हिन्दुस्तान के लोग इस तरह की सियासी नौटंकियों से ऊब चुके हैं और वे ‘इनकी’ और ‘उनकी’ सरकारों के करतब देख चुके हैं। वे थोथे भाषण नहीं, बल्कि काम चाहते हैं। आम आदमी की यह आकांक्षा पिछले महीने हुए पांच राज्यों के चुनावों में जगजाहिर हो गई थी। साथ ही यह सवाल खड़ा हो गया था कि क्या केंद्र में भी गठबंधन की सरकारों से मुक्ति मिल सकती है? आइए, इस प्रश्न पर विस्तार से चर्चा करें।
 
देश को सालों हो गए गठबंधन की राजनीति को समझते-बूझते और ङोलते। राष्ट्रीय पार्टियों की कमजोरी ने जब क्षेत्रीय हस्तियों और ताकतों को सामने आने का मौका सुलभ कराया, तो हमें जनता के साथ विश्वासघात के भी तरह-तरह के नमूने देखने को मिले। पिछले चुनाव इसके गवाह हैं कि जो लोग सत्तानशीं दलों के विरोध के नाम पर जिताऊ मत हासिल करते थे, वे ही बाद में मंत्री पद के लिए उन पार्टियों से हाथ मिला लेते थे। रामविलास पासवान, अजित सिंह, करुणानिधि, ममता बनर्जी के अलावा ऐसे तमाम नामचीन लोग हैं, जिन्होंने मौका पड़ने पर अपनी ही चुनावी घोषणाओं और वायदों को पलीता लगा दिया। मैं समझता हूं कि इसी पद लोलुपता और अपने मतदाता के साथ छल की नीयत ने हमारे लोकतंत्र को नए दुर्दिन देखने पर बाध्य कर दिया। आपके मन को यह प्रश्न मथता होगा कि जो लोग एक चुनावी क्षेत्र को दिया गया वचन नहीं निभा सकते, वे भला देश क्या चलाएंगे?
 
एक समय था, जब इन पार्टियों के पास क्षत्रप हुआ करते थे। वे लोग अपने-अपने इलाकों में पार्टी को सिद्धांतों के आधार पर सहेजते थे। बहुत दूर क्यों जाएं? भाजपा के पास उत्तर प्रदेश में कभी कल्याण सिंह थे और आंध्र प्रदेश में वाई एस राजशेखर रेड्डी कांग्रेस का परचम लहराया करते थे। ज्योति बसु बंगाल में वामपंथ के किले के बरसों तक रखवाले हुआ करते थे। हालात कैसे बदल गए? कल्याण सिंह भाजपा के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं। राजशेखर रेड्डी का बेटा जगन रेड्डी अपने पिता की पार्टी की जड़ों में मट्ठा डाल रहा है और मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी दूसरा ज्योति बसु बनाने और बढ़ाने में नाकामयाब रही है। समय आ गया है, राष्ट्रीय पार्टियों के कर्णधारों को समझ लेना चाहिए कि कोई बरगद तभी तक अपनी शाखें फैला पाता है, जब तक उसकी जड़ें जमीन में गहरे तक धंसी रहती हैं। राष्ट्रीय पार्टियों की हालत खोखली जड़ों वाले पेड़ या दरकती नींव वाली हवेलियों की तरह हो गई है।
 
कौशिक बसु के बयान को मैं इसीलिए सियासत से प्रेरित नहीं मानता। यह एक विचारशील विद्वान का हकीकतनामा है। वह भी यह जानते होंगे कि दोनों प्रमुख राष्ट्रीय पार्टियों में से एक भी अगले चुनाव में सिर्फ अपने बूते सरकार बनाने में सक्षम नहीं होने जा रही। राष्ट्रीय पार्टियां कुछ भी कहें, पर यह सच है कि अब उन्हें तमाम राज्यों में जूनियर अथवा विवश पार्टनर की तरह काम करने पर मजबूर होना पड़ रहा है। बिहार, पंजाब में भारतीय जनता पार्टी और बंगाल में कांग्रेस क्या यह दावा कर सकती है कि वे जब चाहें तब मुख्यमंत्री का फैसला पलटने में कामयाब हो सकती हैं? इसके उलट ममता बनर्जी जब चाहती हैं, तब केंद्र सरकार की राह में रोड़ा अटका देती हैं। चाहे रेल किराये में बढ़ोतरी का मामला रहा हो या फिर खुदरा बाजार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का मसला, हर बार दीदी के दबाव में हुकूमत को मन मसोसना पड़ा।

रेल किराये में बढ़ोतरी न करने का फैसला कितना आत्मघाती है, इसकी मिसाल पिछले हफ्ते मुंबई में देखने को मिली। वहां एक सिगनल आग लगने से खराब हो गया और लोकल ट्रेन सेवा अस्त-व्यस्त हो गई। इससे मची अफरा-तफरी में तीन लोगों को जान गंवानी पड़ी। मतलब साफ है। रेलवे को रख-रखाव के लिए धन चाहिए, जो सिर्फ किराये में संतुलित बढ़ोतरी से मिल सकता है। ऐसा करने के बजाय अंधी लोकप्रियता के अभ्यस्त राजनेता लोगों को भुलावे में रखकर मौत के मुंह में धकेल रहे हैं। अब तक सिनेमा में ‘भाई’ दिखा करते थे। अब राजनीति में भी ‘भाई’ और ‘दीदी’ होने लगे। उनकी राजनीतिक दादागिरी पर अंकुश लगना चाहिए।
अफसोस तो इस बात का है कि राष्ट्रीय पार्टियों की जजर्रता की वजह से हमें आगे भी इस कुरीति से निजात नहीं मिलने जा रही। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर आज चुनाव हो जाएं, तो क्षेत्रीय दलों की ताकत में हर हाल में 50 से 75 सीटों का इजाफा हो जाएगा। इसका दूसरा अर्थ यह है कि राष्ट्रीय दलों के लिए नया दलदल इंतजार कर रहा है। जान लीजिए, कोई तीसरा मोर्चा बने या न बने, पर हमें आगे भी बेवफा नेताओं से बने गठबंधनों और कमजोर सरकारों के लिए तैयार रहना होगा।

यह दुर्भाग्य तब और दुख देता है, जब हमें हर मोरचे पर चीन पटखनी देता दिखाई पड़ता है। चीन में लोकतंत्र नहीं है। वहां की हुकूमत जब चाहे जैसा निर्णय कर उसे आनन-फानन में लागू कर देती है। शुतुरमुर्ग की तरह सोचने वाले लोग भरमाने वाली भाषा में उवाचते हैं कि हमारे यहां लोकतंत्र है, इसलिए फैसलों में देरी काबिले बर्दाश्त है। मेरी समझ में नहीं आता कि जम्हूरियत तरक्की की राह में रोड़ा कैसे बन सकती है? चीन से प्रतिस्पर्धा रखने वाले कई देश फलते-फूलते लोकतंत्र हैं।

यही वजह है कि अक्सर कुछ लोग अमेरिकी शैली के दो दलीय लोकतंत्र की वकालत करते हैं, पर इन खयाली पुलावों को अमल में लाने के लिए संविधान में संशोधन करना पड़ेगा, जो अगले कई वर्षो तक होता नहीं दिखता। अमेरिका के बजाय हमें जापान जैसे परिपक्व लोकतंत्र से सबक सीखना चाहिए। वहां भी गठबंधन की सरकारें आती हैं और अक्सर चरित्रहीनता अथवा भ्रष्टाचार के आरोप में अकाल मौत की शिकार हो जाती हैं। इसके बावजूद राष्ट्रीय हितों से कोई नेता या दल समझौता नहीं करता। अब हमारे यहां भी पढ़े-लिखे और दुनिया देख चुके अपेक्षाकृत नौजवान नेताओं के हाथ में बागडोर है। वे गरीब जनता के खर्च पर जापान घूमने तो जाते हैं, पर वहां के राजनीतिक हमजोलियों से कुछ भी सीख हासिल करने से परहेज करते हैं। क्यों?

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