DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

साहित्य के संकठ की टांग

‘संकट’ साहित्य का सबसे लोकप्रिय शब्द है। यत्र-तत्र-सर्वत्र उसका उल्लेख होता रहता है। संकट की परिभाषा नही मिलती, लेकिन शब्द खूब मिलता है।

यहां संकट ही नायक है। वही खलनायक है। वही कहानी है। वही कविता है। वही आलोचना है और वही पत्रिका है। संकट सर्वप्रिय है। इसे सुनते ही आदमी के कान खड़े हो जाते हैं कि जरूर कोई विपदा आने वाली है। डरकर वह श्रोता बन जाता है। इतिहास की पड़ताल करें, तो मालूम होता है कि पिछले 50-60 साल का साहित्य संकट का साहित्य रहा है। तब संकट आत्मसंघर्ष था। लेकिन पिछले बीस साल में आत्मसंघर्ष ही संकट बन गया!
कविता, कहानी, आलोचना को पढ़िए। उनमें साहित्य की जगह संकट ही संकट फैला मिलेगा। अंतरराष्ट्रीय से लेकर मोहल्ला कॉलोनी गोष्ठियों में जाइए, वहां संकट चर्चा मिलेगी। किसी पत्रिका को पढ़िए, तो सब किसी संकट से शुरू होकर किसी संकट पर खत्म करते मिलेंगे। सबसे बड़ा सेलिब्रिटी है संकट!

गोष्ठी में विषय निर्धारण से लेकर उद्घाटन तक में संकट होता है। यहां तक कि समापन में संकट होता है। संकट बड़ा छलिया है। आखिर में तक्षक की तरह अचानक प्रकट हो जाता है। संयोजक के स्वागत करने से धन्यवाद देने तक संकट महसूस करता है। थका हुआ आखिर में कहता है- धन्यवाद में क्या बोलूं? समय का संकट है। धन्यवाद। कहीं कहीं गोष्ठी के आखिरी पलों में संकट नाटकीय रूप में प्रकट हो जाता है। यही शहर की साहित्यिक महफिलों की चर्चा का विषय बन जाता है। यही अफवाह बनता है। यही राजनीति बनता है और साहित्य में नया संकट पैदा कर जाता है। साहित्य संकट से संकट तक की यात्रा करता रहता है। संकट तब प्रकट नहीं होता, जब उसको बोला या सुना जाता है या पढ़ा जाता है। वह तब प्रकट होता है, जब संकट चर्चा समापन की ओर होती है।

एक ‘फंडित’ गोष्ठी में बड़े-बड़े पंडित आए। सबने पूरे तीन घंटे तक संकट चर्चा की। अंत के समय अध्यक्षजी और आयोजकजी के बीच मंच पर ही कुछ-कुछ हो गया। जाते हुए श्रोताओं में से अग्रपंक्ति में बैठे एक सत्संगी ने देखा कि एक लिफाफा उसकी चरणों में गिरा है। मंच पर ध्यान दिए बिना उसने उस पतंग बने लिफाफे को उठाया और मंच की संपत्ति समझकर अध्यक्ष को देने उठा, तो अध्यक्ष ने संयोजक से चीखकर कहा- अबे क्या समझता है? दो हजार की बात हुई और पांच सौ टिका रहा है? नहीं लूंगा-तेरी औकात क्या है? देख लूंगा-अबे चल बे! गोष्ठी खत्म!

तभी नया संकट पैदा हुआ। अध्यक्षजी गुस्से में नीचे उतरे कि उनकी धोती उनके दाएं चरण के अंगूठे के बढ़े नाखून में उलझ गई और वह गिर गए। संयोजक ने उनके साहित्यिक शरीर का भार किसी तरह संभाला, लेकिन अध्यक्षीय साहित्य अपने पैरों पर तुरंत खड़ा न हो सका। साहित्य की हलकी-सी चीख सबने सुनी, जो कुछ सुभाषितों के साथ उनके मुख से निकली। यह साहित्य की टांग थी, जो संकटापन्न हुई। इसके बाद साहित्य सीधा अस्पताल गया-सात दिन का पलस्तर चढ़ा। दो इंजेक्शन ठुके। चलना-फिरना बंद।

अगले दिन आईआईसी- हेबिटेट, कैंटीनों, नुक्कड़ की चाय, पान की दुकान तक पर उस शाम के संकट की चर्चा चलती रही। सब एक- दूसरे से पूछते रहते-साहित्य की टांग कैसी है? न पांच सौ का लिफाफा होता, न साहित्य की टांग टूटती- साहित्य की जगह उसकी टांग का संकट भारी पड़ा! साहित्य के संकट से बड़ी निकली साहित्य की टांग!

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:साहित्य के संकठ की टांग