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सुधारों की मुश्किल राह

केंद्र सरकार के आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु ने वाशिंगटन के एक कार्यक्रम में जो विचार व्यक्त किए हैं, उन पर प्रतिक्रियाएं अपेक्षित ढंग से ही आई हैं। योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया ने कौशिक बसु की बात से असहमति जाहिर की है, वहीं कांग्रेस और सरकार का रुख उनकी बात को अपने पक्ष में साबित करने का है। विपक्ष ने कौशिक बसु के भाषण को सरकार की निष्क्रियता का प्रमाण बताया है। बसु का यह कहना है कि अगले लोकसभा चुनावों यानी 2014 तक बड़े आर्थिक सुधारों की कोई उम्मीद नहीं है, क्योंकि गठबंधन की मजबूरियों और घोटालों के विवादों के चलते सरकार बड़े फैसले नहीं कर पाएगी।

उनका कहना है कि 2014 के बाद ही बड़े सुधारों का दौर शुरू हो सकता है और भारत तब तेजी से आर्थिक तरक्की करेगा। कौशिक बसु जाने-माने अर्थशास्त्री हैं और बतौर आर्थिक सलाहकार उनके लिए यह जरूरी नहीं है कि वह सरकार का पक्ष ही सार्वजनिक तौर पर व्यक्त करें। यूं भी आर्थिक सलाहकार जैसे पद इसीलिए होते हैं कि वे अपनी निष्पक्ष राय दे सकें। मुमकिन है कि प्रधानमंत्री उनसे पूरी तरह सहमत न हों, लेकिन प्रधानमंत्री भी अर्थशास्त्र के विद्वान हैं और वह ऐसे मुद्दों पर बयानों का महत्व समझते ही होंगे।

एक मायने में यह बयान सरकार के उच्च स्तर पर आर्थिक फैसले करने वाले लोगों की सुधार न कर पाने की नाउम्मीदी को दिखाता है। संप्रग-दो में कांग्रेस के पास संप्रग-एक से बेहतर बहुमत है, इसलिए यह उम्मीद बनी थी कि इस कार्यकाल में बड़े आर्थिक सुधार मुमकिन होंगे। इस कार्यकाल में बड़ी घोषणाएं हुईं जरूर, लेकिन उन्हें लागू नहीं किया जा सका। इसमें सभी की कुछ न कुछ गलती है। विपक्ष सरकार पर निष्क्रियता का आरोप लगा रहा है, लेकिन उसने सरकार से पूरी तरह असहयोग की ऐसी नीति अपनाई कि न सिर्फ फैसले करना, बल्कि संसद का कामकाज भी एक के बाद दूसरे सत्र में ठप्प पड़ा रहा।

सरकार की कमजोरी यह रही कि उसने विपक्ष को जरूरी मसलों पर साथ लेने के लिए राजनीतिक परिपक्वता और चतुराई नहीं दिखाई। सरकार और विपक्ष में छत्तीस का आंकड़ा तो लोकतंत्र की बुनियाद में ही लिखा होता है, लेकिन जरूरी मुद्दों पर उनमें सहयोग और सुलह भी होती है। यह सहयोग और संवाद का तत्व न सिर्फ सरकार और विपक्ष के बीच गायब रहा, बल्कि सरकार अपने ही अंदर के मतभेदों से घिरी रही। सिर्फ ममता बनर्जी ने ही कितने महत्वपूर्ण फैसले रुकवा दिए, जिनमें से एक बांग्लादेश के साथ नदी जल समझौता था, जबकि भारतीय राजनीति में विदेश नीति में आम सहमति और सहयोग की परंपरा है।

यह मुमकिन है कि प्रधानमंत्री और सरकार के शीर्ष पर मौजूद लोग यह संदेश सब तक पहुंचाना चाहते हों कि अगर सहयोग की भावना न आई, तो साल 2014 तक नीतिगत फैसले नहीं हो पाएंगे। यह कोई छिपी हुई बात नहीं है कि अर्थव्यवस्था इस वक्त अपेक्षाकृत कठिन दौर से गुजर रही है और इस वक्त बड़े फैसले करना जरूरी हो सकता है। बड़ी संभावना इस बात की भी है कि अगले चुनावों के बाद गठबंधन सरकार ही केंद्र में आए, तो क्या इसका मतलब यह है कि उसके बाद भी बड़े फैसले नहीं हो पाएंगे? अगर ऐसा हुआ, तो भारत की विकास कथा का क्या होगा? शायद कौशिक बसु के भाषण का तल्ख संदेश यही है कि हमें गठबंधन की सरकारों के दौर में ही रहना है, इसलिए सहयोग और समन्वय के बिना कोई चारा नहीं है। विपक्ष से ज्यादा यह संदेश सरकार के अपने घटकों के लिए मौजूं है। अब भी इस सरकार के दो वर्ष बचे हैं और दो साल राजनीति में बहुत होते हैं, बशर्ते कोई समझना और सीखना चाहे।

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