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सर्वशिक्षा की राह में खड़ी बाधाएं

सामाजिक बदलाव सिर्फ कानून से नहीं आ जाता। उसके लिए संसाधनों के अलावा बदलाव की मानसिकता और सामाजिक स्वीकृति की भी जरूरत होती है। यह बात शिक्षा का अधिकार कानून पर सबसे ज्यादा लागू होती है। 14 बरस तक के सभी बच्चों को शिक्षा पाने का अधिकार भले ही हमारे संविधान का अनुच्छेद 45 देता हो, लेकिन यह 1993 तक हकीकत नहीं बन सका था, जब तक कि सुप्रीम कोर्ट ने यह नहीं कहा कि शिक्षा हासिल करना देश के हर नागरिक का मौलिक अधिकार है।

इसके लागू होने की दिशा में तो खैर हम तब तक नहीं बढ़ सके, जब तक कि साल 2009 में संसद ने शिक्षा का अधिकार विधेयक पारित नहीं कर दिया। इसके लिए जो कानून बना, उसमें कई पेच थे, जिन्हें अभी कुछ ही दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने सुलझाया है। उसके इस आदेश का भी मूल तत्व यही है कि शिक्षा पाना हर बच्चे का मौलिक अधिकार है।

इस फैसले के बाद से अब निजी शिक्षा संस्थाओं को अपनी 25 फीसदी सीटें ऐसे बच्चों के लिए आरक्षित करनी होंगी, जो आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के हैं। इसके खर्च की भरपाई सरकार करेगी, लेकिन यह उससे कम होगी, जितना कि खुद सरकार एक बच्चे को शिक्षा देने में खर्च करती है। यह 1,900 रुपये से तीन हजार रुपये तक होगी। इस कानून में दूसरी खास बात यह है कि कक्षा में अध्यापक और बच्चों का अनुपात एक और तीस का होना चाहिए। इसके अलावा स्कूल में एक निश्चित इंफ्रास्ट्रक्चर होना चाहिए, जिसमें लड़कियों के लिए अलग शौचालय भी शामिल हैं। इसमें अध्यापकों के शैक्षणिक स्तर के लिए भी स्पष्ट दिशा-निर्देश हैं।

यह दूरगामी असर डालने वाला कानून है, जो शत-प्रतिशत साक्षरता हासिल करने में हमारी मदद करेगा। इसके अलावा यह सामाजिक एकता व सामंजस्य को भी बढ़ाएगा। लेकिन इसे लागू करने की जटिलताएं और चुनौतियां भी बहुत बड़ी हैं।

पहली चुनौती संसाधनों से जुड़ी है। सर्वशिक्षा अभियान के लिए पिछले वित्त वर्ष में प्रावधान 21,000 करोड़ रुपये का था, जो इस बार बढ़ाकर 25,500 करोड़ रुपये कर दिया गया। लेकिन अलग-अलग रिपोर्टो में खर्च का जो अनुमान लगाया गया था, यह उससे काफी कम है। अनिल बोर्डे कमेटी का अनुमान 47,500 करोड़ रुपये सालाना का था, जबकि नेशनल यूनिवर्सिटी ऑन एजूकेशन ऐंड प्लानिंग का अनुमान 34,300 करोड़ रुपये का था। यानी जितनी जरूरत थी, उसका 60 फीसदी धन ही सरकार खर्च कर रही है। हालांकि यह कानून तीन साल में पूरी तरह से लागू करना है, पर यह उम्मीद कम ही है कि सरकार संसाधनों के इस अंतर को पूरी तरह पाट पाएगी। दरअसल, इस कानून को पूरी तरह से लागू करने के लिए कुछ ज्यादा लंबे समय की जरूरत थी।

दूसरा मुद्दा खर्च के वितरण का है। पहले यह सोचा गया था कि 90 फीसदी खर्च केंद्र सरकार वहन करेगी और बाकी दस फीसदी राज्य सरकारें। फिर यह अनुपात बदलकर 75 और 25 का कर दिया गया। अब इसे 65 और 35 के अनुपात में लागू करने का प्रस्ताव है। राज्य सरकारों के पास संसाधन पहले से ही काफी कम हैं। उनकी हमेशा से शिकायत रही है कि कम संसाधनों के बावजूद उन पर खर्च की बाध्यता तो थोप दी जाती है और इसकी भरपाई भी नहीं की जाती। 2008-09 से 2010-11 तक प्राथमिक शिक्षा में राज्यों का खर्च लगातार बढ़ा है, जबकि सर्वशिक्षा अभियान में केंद्र सरकार की हिस्सेदारी कम हो रही है।

तीसरी चुनौती आबंटित राशि खर्च करने की है। 2010-11 में सर्वशिक्षा अभियान व शिक्षा के अधिकार के तहत धन का प्रावधान काफी कम था, फिर भी सरकार उसका महज 70 फीसदी ही खर्च कर सकी। यह एक साल पहले के प्रतिशत से भी कम था। ‘एकाउंटीबिलिटी इनिशिएटिव’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, धन का प्रवाह धीमा हुआ है और अनुदान आने का समय गड़बड़ होता जा रहा है। ज्यादातर अनुदान वित्त वर्ष के अंत में आता है। इस अनुदान का खर्च भी जो 2008-09 में 79 फीसदी था, 2010-11 में घटकर 70 फीसदी हो गया।

चौथी चुनौती है, देश में अध्यापकों की भारी कमी। 12वीं योजना के अनुसार, देश में अध्यापकों के पांच लाख पद खाली पड़े हैं और कक्षाओं में बच्चों और अध्यापकों के अनुपात को ठीक करने के लिए पांच लाख और अध्यापकों की जरूरत होगी। इसके अलावा निजी स्कूलों में तकरीबन छह लाख अध्यापक ऐसे हैं, जो अप्रशिक्षित हैं। योजना आयोग ने 11वीं योजना में अध्यापकों को प्रशिक्षित करने के लिए 4,000 करोड़ रुपये खर्च करने का सुझाव दिया था, लेकिन 1,645 करोड़ रुपये ही उपलब्ध कराए गए। इस साल के बजट में इस मद में सिर्फ 450 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, जो हद से ज्यादा कम है।

पांचवीं समस्या शिक्षा की गुणवत्ता की है। एनुअल स्टेटस ऑफ एजूकेशन रिपोर्ट, 2011 के अनुसार, शिक्षा की गुणवत्ता गिर रही है। छह से 14 वर्ष के ऐसे बच्चों की संख्या निस्संदेह घटी है, जो पढ़ने नहीं जाते। लेकिन स्थिति यह है कि कक्षा पांच के बच्चे कक्षा दो की किताबें नहीं पढ़ पाते, वे न छोटा-मोटा हिसाब कर पाते हैं और न ही साधारण पाठ कर सकते हैं। जिस तरह से सारा ध्यान शिक्षा उपलब्ध कराने, बच्चों को स्कूलों में दाखिला देने और पढ़ाई के बीच में स्कूल छोड़ने से रोकने पर दिया गया, उसके चलते शिक्षा और अध्यापन की गुणवत्ता के जटिल मसलों को नजरअंदाज कर दिया गया। सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर खराब होने की रिपोर्ट के चलते ज्यादातर लोग निजी स्कूलों की ओर भागते हैं। निजी स्कूलों में छह से 14 साल के बच्चों के प्रवेश की दर 18 फीसदी से नाटकीय रूप से बढ़कर 2011 में 25.6 फीसदी हो गई।

छठी चुनौती। स्कूलों में जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर का अभाव है। सिर्फ 37 फीसदी सरकारी स्कूल ऐसे हैं, जिनमें कामचलाऊ शौचालय हैं, उनमें भी 25 फीसदी में लड़कियों के लिए अलग से शौचालय नहीं है। दो-तिहाई स्कूलों में बिजली नहीं है, अध्यापकों का 12 फीसदी काम गैर शिक्षण गतिविधियों में खर्च होता है, क्योंकि स्कूलों में लिपिक वर्ग के कर्मचारी नहीं हैं। 47 फीसदी स्कूल ऐसे हैं, जिनमें पर्याप्त कक्षाएं नहीं हैं।

और अंत में सुप्रीम कोर्ट का फैसला, जिसके तहत निजी स्कूलों को आर्थिक रूप से कमजोर तबकों के बच्चों के लिए 25 फीसदी सीटें आरक्षित करनी होंगी। यह एक प्रगतिशील फैसला है, लेकिन इसे लागू होने में समय लगेगा। सरकार इसके खर्च की जो भरपाई करेगी, वह काफी कम है, इसलिए स्कूल इसका भार बाकी 75 फीसदी बच्चों के अभिभावकों पर डाल देंगे। जरूरी नहीं है कि इन सभी के अभिभावक समृद्ध तबके के ही हों। ऐसी क्रॉस सब्सिडी हमेशा ही कई मसले खड़े करती है।

शिक्षा के अधिकार कानून के कई मसले अभी सुलझे नहीं हैं, इतने बड़े लक्ष्य को हासिल करने के लिए हमें कानून से आगे बढ़कर बड़ी प्रतिबद्धता की जरूरत होगी।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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