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मामूली बीमारी है, फिर भी लाइलाज

उसे मामूली बीमारी कहा जाता है। लेकिन मेडिकल साइंस में तमाम रिसर्च होने के बावजूद उसका इलाज नहीं ढूंढ़ पाए हैं हम। मैं जुकाम की बात कर रहा हूं। उसे मामूली बीमारी कहते हैं, क्योंकि वह दुनिया भर में पाई जाती है। किसी को भी हो जाती है। उसका असर अलग ढंग का हो सकता है, लेकिन कभी न कभी हर कोई उसकी चपेट में आ ही जाता है।

मैंने जुकाम को अपने पिता से लिया। उन्हें साल में तीन-चार बार जुकाम हो ही जाता था। साल में जब भी पहली बार वह उससे परेशान होते थे, तो कैटराल का एक टीका ले लेते थे। उसकी वजह से साल भर उनका जुकाम काबू में रहता था। मुझे भी जुकाम साल में चार बार हो ही जाता है। एक बार जब होता है, तो पूरे हफ्ते जिंदगी बर्बाद रहती है।

अब तो मैं बता सकता हूं कि वह कब मुझे चपेट में लेने वाला है। अगर मुझे दो छींक एक साथ आती हैं, तो मैं जानता हूं कि परेशान होने की जरूरत नहीं है। पर काफी वक्त के बाद जब एक ही छींक रह जाती है, तो मैं समझ जाता हूं कि अब दिक्कत होने वाली है। तब किसी किस्म की दवाई काम नहीं आती। न ही कोई विटामिन सी और न ही कोई सिरप।

इस कॉलम को लिखते वक्त मैं उससे जूझ रहा हूं। कल ही मैं उसकी चपेट में आया था। आज तो बुरा हाल है। मैं विक्स वेपोरब लगा रहा हूं। उससे आराम तो आ जाता है, लेकिन पूरी तरह ठीक नहीं होता। जुकाम से एक और दिक्कत होती है। वह बड़ी तेजी से दूसरे को पकड़ता है। आप अगर किसी के पास बैठे हैं, तो पांच मिनट में ही वह इधर-उधर हो सकता है। मुझे तो लगता है कि नोबल पुरस्कार कमिटी को उसके लिए भी कोई अवॉर्ड रखना चाहिए। आखिर जो भी उसका इलाज ढूंढ़ दे, उसे नोबल पुरस्कार दे देना चाहिए।

खूबसूरत किताब
किताबों के प्रकाशन की बात होती है, तो विलियम कैक्स्टन की याद आती है। 1422 में जन्मे और 1491 तक जिए थे। वह किताब प्रकाशन के पितामह थे। उनकी पहली किताब द गेम ऐंड द प्लेयर ऑफ चेस  थी। बाद में सौ किताबें उन्होंने और निकालीं। उससे पहले लेखन कपड़े पर होता था। एक लकड़ी पर उसे लपेट दिया जाता था। बाद में इस खोज का असर तेजी से दुनिया भर में हुआ।

किताबों के मामले में दो तरह की सोच चलती है। एक सोच के मुताबिक, किताब सजी-धजी होनी चाहिए। दूसरे का मानना है कि वह पढ़ने के लिए है, देखने के लिए नहीं। तो एक तरफ लेफ्ट बुक क्लब हैं। उसमें मार्क्सवादी किताबें मिलती हैं। सस्ते में निकालना उनका मकसद है। पेंगुइन बुक्स प्रकाशन भी बहुत सजधज में भरोसा नहीं करता। अभी डेविड दवीदार और रवि सिंह ने ‘अलेफ’ शुरू किया है। उनकी पहली किताब द बुक ऑफ अलेफ : वॉल्यूम वन  आई है। इतनी खूबसूरत किताब मैंने तो नहीं देखी। मैं तो हाथ धोकर इस किताब को छूने की हिम्मत कर पाया।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) 

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