DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

खेलो तो सही यार

अरे मैं! नहीं, नहीं। उनके कुछ साथी खेल रहे थे। और उन्हें भी खेलने के लिए बुला रहे थे। उनके पास से निकलते हुए वह मुस्कुराने लगे। चेहरे पर यह भाव था कि मानो खेलना तो महज बच्चों का काम है।

‘खेलने का उम्र से कोई वास्ता नहीं है। अगर आप अपने काम को ज्यादा वक्त देते हैं, तो आपका खेलना बेहद जरूरी है। खेलने से काम का हर्जा नहीं होता, बल्कि उससे रफ्तार बढ़ जाती है।’ यह मानना है डॉ. सिंडी ऐरन का। वह वर्जीनिया यूनिवर्सिटी में इतिहास की प्रोफेसर हैं। 1999 में आई उनकी किताब वर्किग ऐट प्ले खासा चर्चित रही है।

एक दौर के बाद शायद हम उस तरह तो नहीं खेल सकते, जैसे बच्चे खेलते हैं। लेकिन खेल तो सकते हैं। अपने को सुकून देता कोई खेल। या जिसमें हमारी उम्र आड़े न आए। कुछ भी हो हमें खेलना चाहिए। कोई भी खेल हो, बस खेलना चाहिए। दरअसल, खेलने से दो सीधे-सीधे फायदे होते हैं। मन हल्का होता है और शरीर चुस्त बनता है। और इन दोनों को ही दुरुस्त रखने की हमें जरूरत होती है।

आखिर यह जिंदगी एक खेल है। और उसे जो खेल समझता है, उसका समूचा नजरिया ही अलग होता है। खेलना सबसे सहज गतिविधि है। उसे खेलकर हम सहज होते हैं। यह सहज होना बेहद जरूरी है। यह अलग बात है कि सहज होना साधना हो गया है। हम जब बच्चे होते हैं, तो सहज होते हैं। लेकिन जैसे-जैसे बड़े होते हैं, हम असहज की यात्रा पर निकल पड़ते हैं। तब बहुत कोशिश करके हमें सहज होना पड़ता है। हम अपने काम करने की जगह पर अक्सर सहज नहीं होते। हम उसी असहज अंदाज में जीते चले जाते हैं। और दबाव तथा तनाव में आ जाते हैं। इनसे बाहर निकलने में खेल एक खास भूमिका निभा सकता है। तो फिर आप भी खेलने की कोशिश करो न।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:खेलो तो सही यार