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श्रीलंका नीति में यह बदलाव होना ही था

घरेलू राजनीति के दबाव हमारी विदेशी नीति को किस तरह प्रभावित करते हैं, यह पिछले दिनों श्रीलंका के मसले पर जाहिर हो गया। तमिलनाडु की राजनीति और खासकर केंद्र सरकार के सहयोगी दल द्रमुक के दबाव में भारत को जेनेवा में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परषिद में अमेरिका द्वारा श्रीलंका सरकार के खिलाफ लाए गए प्रस्ताव का समर्थन करना पड़ा। इससे कई नई परेशानियों का खतरा खड़ा हो गया है। पिछले काफी समय से तमिल अतिवादियों के सफाये के मामले में भारत श्रीलंका सरकार के साथ ही खड़ा दिखाई दिया है। खासकर पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के बाद से। यह हत्या श्रीलंका के तमिल अतिवादी संगठन लिट्टे ने की थी। कुछ समय पहले जब श्रीलंकाई सेना ने इसके नेता प्रभाकरण को मार गिराया, तो भी भारत की प्रतिक्रिया सकारात्मक थी।
हालांकि भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने श्रीलंका के राष्ट्रपति महिंद्रा राजपक्षे को एक पत्र लिखकर समझाया कि भारत ने श्रीलंका के खिलाफ कदम नहीं उठाया है। उसने अमेरिकी प्रस्ताव को ‘संतुलित’ बनाने का प्रयास किया है। परंतु राजपक्षे भारत सरकार के स्पष्टीकरण से सहमत नहीं हुए। राष्ट्रपति राजपक्षे ने दो टूक कहा कि भारत ने ही एक खतरनाक परिपाटी शुरू कर दी है। अब कश्मीर के मामले में श्रीलंका अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत के दुश्मनों के साथ खड़ा हो जाए, तो इसमें भारत को आश्चर्य नहीं करना चाहिए।

इसका दूसरा नुकसान यह हुआ है कि विपक्षी दलों को एक और हथियार मिल गया है। अभी तक वे सरकार पर यह आरोप लगाते रहे हैं कि वह अपने सहयोगी दलों की हर मांग के आगे झुक जाती है। इस बार उनका आरोप है कि सरकार क्षेत्रीय दलों के दबाव में विदेश नीति तक में ढुलमुल रवैया अपना रही है। वे इसे इसलिए आपत्तिजनक कह रहे हैं, क्योंकि विदेश नीति के बारे में धारणा है कि वह देश की होती है, किसी दल या सरकार की नहीं। इसे दलगत राजनीति के चलते बदलना खतरनाक हो सकता है, पर ऐसा कहने वाले श्रीलंका में चीन की बढ़ती भूमिका को नजरंदाज कर देते हैं।

इस तथ्य को वे राजनीतिक विश्लेषक भी नजरंदाज कर रहे हैं, जिनका कहना है कि श्रीलंका के मामले में भारत ने अपनी गुटनिरपेक्ष नीति का त्याग कर दिया है। गुटनिरपेक्ष नीति के प्रवर्तक पंडित जवाहर लाल नेहरू ने कहा था कि इस नीति का मतलब यह नहीं है कि हम आंख मूंदकर अमेरिका और सोवियत रूस के खेमों का विरोध करें। हर वैदेशिक मसले पर भारत का अपना दृष्टिकोण होगा। श्रीलंका में भारत ने वही किया। साथ ही, जिस तरह श्रीलंका तेजी से चीन की गोद में जा रहा था, उसे अपरोक्ष रूप से यह संदेश देना आवश्यक था कि भारत प्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय सिद्धांत ‘मोनरो डॉक्ट्रिन’ का अब भी समर्थक है और हिंद महासागर में वह चीन की दादागिरी बर्दाश्त नहीं कर सकता।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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