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नॉनसेंस हंसी

वह हंसी की तुलना एक सींग वाले गैंडे से करते हैं- दोनों लुप्त होने के कगार पर है। बात थोड़ी अतिश्योक्तिपूर्ण भले हो, लेकिन सच ही जान पड़ती है। ठठाकर हंसना खासकर महानगरों में एक विरल बात है। विडंबना यह है कि यह विरलता भी हमें रास नहीं आती। उस दिन मूवी थियेटर में तो गजब हो गया, जब आस-पास से बेपरवाह एक दर्शक जरा-जरा सी कॉमिक सीन पर हंसी की फुलझड़ियां बिखेरने लगा। सबको कोफ्त हो रही थी और बार-बार उधर देख रहे थे, जहां से हंसी उठ रही थी। एक जनाब ने तो उन्हें ‘नॉनसेंस’ तक कह दिया। लेकिन बात यह आंख खोलने वाली थी कि क्यों हमें यह गवारा नहीं कि कोई छोटी-सी बात पर हंसें? क्यों हमें हंसने के लिए कोई बड़ा मुद्दा ही चाहिए? बात-बात पर गुस्साने वाले हम आखिर बात-बात पर हंस क्यों नहीं पा रहे हैं? संरचनावाद के प्रणेता रहे लेवी स्ट्रॉस ने तो कहा था कि मानव उस दिन मानव नहीं रहेगा, जिस दिन उसे हंसने में कठिनाई महसूस होगी। तो क्या हम अमानव होने की दिशा में बढ़ रहे हैं?

एक ईरानी कहावत है- किसी हंसने वाले इंसान के आने से ऐसा लगता है जैसे एक और दीपक जल गया हो। चर्चिल ने भी कहा कि विनोदी को लोग फालतू की चीज समझते हैं, जबकि वह बहुत गंभीर होता है। पर हम क्यों हंसें? कैसे हंसें? लिंकन का कहना था कि ज्यादातर लोग उतना ही हंस सकते हैं, जितना वे हंसना चाहते हैं। यानी हंसने के लिए कारण से अधिक चाह की जरूरत है। विज्ञान के उस नजरिये का भी सम्मान करें, जो बताता है कि हंसने से पूरे शरीर में ऑक्सीजन का तीव्र प्रवाह होता है और जीवंतता आती है। हंसी का एक दर्शन भी है, जो दुनिया को और उसमें अपनी मौजूदगी को बस हंसने योग्य ही मानता है। उसके अनुसार, हर गतिविधि एक हास्य नाटक का हिस्सा भर है। ऐसे में क्या किसी हंसी को ‘नॉनसेंस’ समझना बेवकूफी नहीं?

 

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  • Web Title:नॉनसेंस हंसी