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यह कैसा नियम

मध्य प्रदेश की रत्नश्री पांडे का 14 साल की छोटी उम्र में बाल विवाह हुआ था। 13 साल तक अपमान, शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना झेलने के बाद आखिर उनको तलाक मिल गया। अपने दो बच्चों का पालन-पोषण भी उन्हीं के जिम्मे है। रत्नश्री का जज्बा देखिए कि जिम्मेदारियों को निभाते हुए उन्होंने मध्य प्रदेश की सिविल सेवा परीक्षा पास की। लेकिन राज्य के बाल विवाह विरोधी नियम के तहत अब उन्हें नियुक्ति देने से इनकार कर दिया गया है। रत्नश्री दो बार सिविल सेवा परीक्षा पास कर चुकी हैं, पर दोनों बार उन्हें नियुक्ति नहीं दी गई। ऐसे में, उन्होंने सरकार के इस फैसले के खिलाफ अदालत में गुहार लगाई। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने म़ प्ऱ सिविल सेवा नियम 6(5) का हवाला देते हुए नियुक्ति न करने को सही ठहराया और कहा कि नियम साफ है कि तय उम्र के पहले विवाह करने वालों को सरकारी सेवा में नहीं लिया जाएगा। सोचकर देखें, रत्नश्री पहले ही बाल विवाह से पीड़ित थीं, जिस पर उनका कोई जोर नहीं था। उस घुटन और यातना से निकलकर जब वह अपनी मेहनत और काबिलियत से इस ऊंचाई तक पहुंची हैं, तो कानून ही उनके सशक्तीकरण के रास्ते में रुकावट बन रहा है। उन्हें समर्थ बनाने की बजाय कमजोर करने पर उतारू है। क्या यह उनके साथ दोहरा अन्याय नहीं है? अच्छी खबर यह है कि इस मामले में रत्नश्री ने उच्चतम न्यायालय में अपील दायर की है और राज्य सरकार के इस नियम को चुनौती दी है। कामना कीजिए कि उन्हें शीर्ष अदालत से न्याय मिले।
चोखेर बाली में आर अनुराधा

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