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नेता या अभिनेता

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मुंबई में बिहार दिवस मनाकर यह साफ कर दिया कि वह किसी के कहने से अपने इरादे नहीं बदलने वाले हैं। एक पढ़े-लिखे, प्रतिबद्ध इंसान से इस प्रकार की अपेक्षा की जा सकती है। भारत जैसे स्वतंत्र देश में किसी भी इंसान को कहीं भी आने-जाने का सांविधानिक अधिकार है, फिर न जाने राज ठाकरे ने क्या समझकर उन्हें मुंबई आने से मना किया था। बाद में ठाकरे अपने रुख से पलट भी गए थे। उनके इस नाटकीय अंदाज से तो यही लगता है कि वह एक राजनेता नहीं, बल्कि अभिनेता हैं। बहरहाल, राज ठाकरे ने बिहार विरोधी नीति छोड़कर एक भारतीय होने की भावना का परिचय दिया है, यह प्रशंसनीय है।
मनीष कुमार, नेहरू प्लेस, दिल्ली

लोकतंत्र का पर्व
दिल्ली के तीन नगर निगमों के लिए हुए चुनाव के अब परिणाम भी आ चुके हैं, लेकिन इस चुनाव में हुआ रिकॉर्ड मतदान निश्चित ही मतदाताओं की बढ़ती जागरूकता का संकेत है। राजधानी दिल्ली में बड़ी संख्या में मतदाताओं ने मतदान केंद्रों तक पहुंचकर यह साबित कर दिया है कि वे अब लोकतंत्र के इस पर्व पर उदासीन रहने को तैयार नहीं हैं। दिल्ली की जनता ने अपना फैसला सुना दिया है, अब उसे समस्याओं से मुक्ति पाती दिल्ली चाहिए।
ओमप्रकाश प्रजापति, नंदनगरी, दिल्ली-93

मुजरिम या मेहमान
साल 2008 में मुंबई पर 26/11 को आतंकी हमला हुआ था, जिससे मुंबई ही नहीं, पूरा देश सिहर गया था। उस हमले में जिंदा पकड़ा गया आतंकवादी कसाब आज भी सरकारी मेहमान बन बड़े आराम से सजा काट रहा है। 2008 से लेकर अब तक उसकी सुरक्षा और देख-रेख पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा चुके हैं। यह ठीक नहीं कि एक आतंकी की सुरक्षा के नाम पर खूब खर्च हो। जो जवान देश की सीमा पर तैनात किए जाते हैं, वे उसकी सुरक्षा में लगाए गए हैं। 2008 से अब तक उसकी सुरक्षा में तैनात जवानों की तनख्वाह पर 122,18,406 रुपये, कसाब की सेहत जांच पर 28,066 रुपये और खाने पर 34,975 रुपये खर्च किए गए हैं। सोचिए जरा, एक आतंकवादी की इतनी मेहमाननवाजी। दर्जनों बेगुनाह लोगों का खून बहाने वाले मुजरिम की इतनी देख-रेख? आखिर क्यों? जिस देश में करोड़ों लोग भूखे पेट सोते हैं, वहां एक आतंकी पर इतने रुपये लुटाने का अब क्या तुक है? पूरी दुनिया जान चुकी है कि 26/11 के हमले में पाकिस्तानी आतंकियों का हाथ था, फिर अब कसाब को क्यों बचाया जा रहा है? आतंकियों को सख्त सजा मिले, यह सभी कौम के लोग चाहते हैं। इसलिए बेहतर यही होगा कि इस मामले को जल्द से जल्द उसके अंजाम तक पहुंचाया जाए।
रवि श्रीवास्तव

कातिल पिता
बेबी फलक की तरह तीन माह की आफरीन भी इस निर्मम संसार को छोड़कर चली गई, जहां बच्चियों को अभिशाप समझकर मृत्यु के हाथों सौप दिया जाता है। आफरीन के पिता जैसे न जाने कितने हत्यारे हमारे तथाकथित सभ्य समाज में यहां-वहां घूम रहे हैं, जो एक नन्ही-सी जान को कूड़े के ढेर में मरने के लिए छोड़ देते हैं। कुछ तो दैत्य बनकर बच्चियों को मौत की सूली पर चढ़ा देते हैं। ऐसे निर्दयी और हत्यारे पिताओं को कठोर से कठोर दंड मिलना चाहिए, ताकि भविष्य में कोई और आफरीन इस तरह दुनिया से विदाई न ले। ऐसे बर्बर लोगों को किसी सूरत में नरम सजा नहीं मिलनी चाहिए।
नीति उमरवाल, आश्रम, नई दिल्ली

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