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विकास के साथ जुड़ा है प्राइवेट सिक्योरिटी का क्षेत्र

तेजी से हो रहे आर्थिक और शहरी विकास ने सेना और पुलिस के समानांतर निजी सुरक्षा के क्षेत्र में रोजगार की अपार संभावनाएं विकसित की हैं। खास बात यह है कि बड़े स्तर पर गैर संगठित क्षेत्र की तरह काम कर रही यह इंडस्ट्री करीबन 10 लाख नई नौकरियां हर वर्ष युवाओं को देने का दम रखती है। माना जा रहा है कि वर्ष 2015 तक यह उद्योग 30 हजार करोड़ तक पहुंच जाएगा। तेज विकास, कम पूंजीगत खर्च और अच्छा रिटर्न देने वाली इस इंडस्ट्री में सभी तरह की योग्यता वाले लोगों के लिए काम के अवसर हैं, बता रहे हैं शैलेंद्र नेगी

प्राइवेट सिक्योरिटी एक ऐसी इंडस्ट्री है, जहां आठवीं पास से लेकर इंजीनियर्स और एमबीए सभी लोगों के लिए काम करने के अवसर हैं। ‘आर्थिक विकास की तेज रफ्तार, बड़ी संख्या में छोटी-बड़ी कंपनियों का स्थापित होना, सड़क, एयरपोर्ट और मॉल्स के रूप में हो रहा ढांचागत विकास निजी सुरक्षा प्रोफेशनल्स की मांग को लगातार बढ़ाने का काम कर रहे हैं। अच्छी बात यह है कि दूर-दराज के गांवों से लेकर छोटे शहरों और कस्बों में रहने वाले युवा तक इस क्षेत्र में नौकरी पा रहे हैं।’ यह कहना है जी4एस में साउथ एशिया के रीजनल डायरेक्टर कैप्टन शैलेश तिवारी का।

शैलेश के अनुसार, ‘पहले यह क्षेत्र जहां पूरी तरह असंगठित था, वहीं इसकी बढ़ती भूमिका और उससे जुड़े रोजगार के अवसरों को देखते हुए इसे संगठित किए जाने की दिशा में प्रयास शुरू हो गए हैं। प्राइवेट सिक्योरिटी से जुड़े लोगों को अच्छा प्रशिक्षण दिए जाने के कोर्सेज चलाए जा रहे हैं। साथ ही गृह मंत्रालय द्वारा निजी सुरक्षा एजेंसियों को हथियारों से संबंधित कॉरपोरेट लाइसेंस दिए जाने की योजना पर भी विचार किया जा रहा है।’

प्राइवेट सिक्योरिटी का बाजार
घर ही नहीं, अपार्टमेंट्स, बड़े-बड़े मॉल्स से लेकर सरकारी संस्थान व बिजनेस घराने सुरक्षा के लिए निजी सुरक्षा एजेंसियों की सेवाएं ले रहे हैं। सामान्य भाषा में इन्हें गार्ड कहा जाता है, वहीं कुछ सुरक्षा एजेंसियों ने विदेशों की तरह इन्हें सिक्योरिटी असिस्टेंट का नाम दिया है। सेंट्रल असोसिएशन ऑफ प्राइवेट सिक्योरिटी इंडस्ट्री (कैप्सी) के चेयरमैन कुंवर विक्रम सिंह के अनुसार, ‘गार्ड शब्द की पारंपरिक छवि के कारण युवा इस काम के साथ जुड़ने में संकोच करते हैं, वहीं विदेशों में प्राइवेट सिक्योरिटी असिस्टेंट के पद को सम्मान से देखा जाता है। भारत सरकार का गृह मंत्रालय भी निजी सुरक्षा कर्मियों की भूमिका को स्वीकार कर चुका है। आतंकवाद व देश में सुरक्षा संबंधी गड़बड़ियों का सामना करने के लिए निजी सुरक्षा कर्मियों के वास्ते सरकार की ओर से प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित किए जाते हैं।’

विक्रम सिंह कहते हैं, ‘देश में प्राइवेट सुरक्षा से जुड़ा बाजार सालाना 25 फीसदी की दर से बढ़ रहा है। 70 लाख लोग इसमें रोजगार पा रहे हैं। महत्वपूर्ण व्यक्ति हों या फिर बड़ी-बड़ी कंपनियां सभी अपनी सुरक्षा के लिए प्राइवेट सुरक्षा एजेंसियों की मदद ले रहे हैं। गृह मंत्रालय के अधिकारी भी मानते हैं कि सुरक्षा कर्मियों की आवश्यकता की तुलना में पुलिस व सेना बल काफी कम है, ऐसे में निजी सुरक्षाकर्मी एक अच्छा विकल्प है।’    

हर स्तर पर है नौकरियों की दरकार
कैप्टन शैलेश तिवारी के अनुसार इस क्षेत्र में तीन स्तरों पर नियुक्ति की जाती है..
सुरक्षा कर्मी के स्तर पर: शारीरिक रूप से स्वस्थ दसवीं पास युवाओं का चुनाव आमतौर पर सुरक्षा कर्मी, मुख्य सुरक्षा कर्मी या सुपरवाइजर के पद के लिए किया जाता है। उनके लिए अंग्रेजी या हिंदी भाषा की जानकारी होना आवश्यक है।

तकनीक के स्तर पर: इस स्तर पर नियुक्त किए जाने वाले युवाओं से सॉफ्टवेयर डेवलेपमेंट, सीसीटीवी और अन्य तकनीकी उपकरणों की जानकारी और उनके इस्तेमाल में कुशल होने की अपेक्षा की जाती है। इसके लिए इंजीनियरिंग या सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर में डिग्री डिप्लोमा या अनुभव होना जरूरी है।

प्रबंधन के स्तर पर: तीसरा हिस्सा है मैनेजर का, एजेंसी के ही प्रशिक्षित व अनुभवी लोगों को भी पदोन्नति के जरिए प्रबंधकीय भूमिकाएं सौंपी जाती हैं। वहीं बीबीए या एमबीए डिग्री धारकों के लिए भी यहां पर्याप्त जगह है। इस स्तर पर लीडरशिप क्वालिटी की अपेक्षा की जाती है।

किस तरह की ट्रेनिंग 
कैप्टन शैलेश तिवारी कहते हैं कि आमतौर पर 20 दिन की ट्रेनिंग दी जाती है, लेकिन पूरी तरह एक सिक्योरिटी असिस्टेंट की भूमिका में आने में लगभग तीन महीने का समय लग जाता है। ट्रेनिंग के दौरान आपको शारीरिक और व्यावहारिक शिक्षा के साथ-साथ सुरक्षा क्षेत्र से जुड़ी आधारभूत बातें बताई जाती हैं। समय-समय पर रिफ्रेशर प्रोग्राम भी चलाए जाते हैं, जिससे सिक्योरिटी असिस्टेंट अपग्रेड रहे।

सेवानिवृत्त जवानों व महिलाओं के लिए अवसर
सेना के जवान अपने अनुशासन के लिए माने जाते हैं। ऐसे में निजी सुरक्षा में भारतीय सेना से सेवानिवृत्त जवानों और अधिकारियों के लिए भी अच्छे मौके हैं। शैलेश तिवारी के अनुसार, बार व क्लब के लिए रखे जाने वाले बाउंसरों की मांग ने भी पारंपरिक पहलवानों की मांग को बढ़ा दिया है।

सुरक्षा कर्मियों की ट्रेनिंग के लिए अच्छे अधिकारियों की मांग रहती है, जबकि सुपरवाइजिंग के लिए सेवानिवृत्त जवानों को महत्व दिया जाता है। मल्टीनेशनल कम्पनियों, हवाई अड्डों, रेलवे स्टेशनों पर महिला सुरक्षाकर्मियों की नियुक्तियां बड़े स्तर पर की जाती हैं।

भर्ती की प्रक्रिया
आमतौर पर भर्ती के नियम लगभग वही हैं, जो सेना या पुलिस के लिए होते हैं। शारीरिक तौर पर स्वस्थ और फिट होना जरूरी है। सामान्य लिखित परीक्षा भी भर्ती का एक हिस्सा है, जिसमें पांचवीं कक्षा तक गणित, अंग्रेजी और हिंदी से संबंधित सवाल पूछे जाते हैं। एनसीसी सर्टिफिकेटधारियों की मांग अधिक है।

वेतन की संभावनाएं
सामान्य सुरक्षा कर्मी के तौर पर 8 से 10 हजार रुपये के बीच में मिलते हैं। तकनीक के जानकार को शुरुआत में 15 हजार रुपये तक मिल सकते हैं। पद बढ़ने के साथ सेलरी में भी वृद्धि होती रहती है।

सरकार खोल रही है विश्वविद्यालय
निजी सुरक्षा की ट्रेनिंग के लिए गुजरात के अहमदाबाद में रक्षा शक्ति यूनिवर्सिटी खोली गई है। पंजाब सरकार द्वारा पंजाब पुलिस सिक्योरिटी कॉरपोरेशन बनाई गई है, जिसके जरिए पंजाब के युवाओं को निजी सुरक्षा कर्मी की ट्रेनिंग दी जा रही है। पंजाब सरकार अपने यहां से पढ़े-लिखे ट्रेंड युवा निजी सुरक्षा कर्मियों को विदेश भेजने की योजना भी बना रही है। प्राइवेट सिक्योरिटी के क्षेत्र में रोजगार देने की व्यापक संभावनाओं को देखते हुए झारखंड व पश्चिम बंगाल की सरकारें भी अपने यहां निजी सुरक्षा एजेंसियों के सहयोग से ट्रेनिंग सेंटर खोलने की दिशा में काम कर रही हैं।


कहां और कैसी है नौकरियां
प्राइवेट सिक्योरिटी ऑफिसर के तौर पर आपको घरों, आरडब्ल्यूए, मॉल्स और सरकारी प्रतिष्ठानों के साथ बड़ी-बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियों में काम करना पड़ता है। कैप्सी के चेयरमैन कुंवर विक्रम सिंह कहते हैं, ‘जैसी आपकी क्वालिफिकेशन है, वैसी ही नौकरी इस क्षेत्र में आपके लिए उपलब्ध है। योग्यता के हिसाब से यहां अनेक स्तरों पर काम करने के मौके हैं। 

सिक्योरिटी असिस्टेंट: निजी सुरक्षा के क्षेत्र में यह पहला पद होता है, जिसमें आपको किसी संस्थान की सुरक्षा के लिए लगाया जाता है। सामान्य भाषा में इन्हें गार्ड या सिपाही कहा जाता है।

सिक्योरिटी एग्जीक्यूटिव: सिक्योरिटी असिस्टेंट के बाद सिक्योरिटी एग्जीक्यूटिव बनते हैं।
प्रबंधकीय स्तर: यहां मैनेजर सिक्योरिटी और सीनियर मैनेजर सिक्योरिटी दो पदों पर लोग काम करते हैं। इन दोनों का काम सिक्योरिटी में तैनात अधिकारियों की निगरानी करना होता है।

वाइस प्रेसिडेंट और प्रेसिडेंट: कंपनी के कार्यों को गतिशीलता व सुचारू रूप से संचालित किए जाने की जिम्मेदारी इन पर होती है। कंपनी से जुड़े सभी बड़े फैसले ये अधिकारी लेते हैं। 

एग्जीक्युटिव प्रोटेक्शन: एग्जीक्युटिव प्रोटेक्शन के तहत अति विशिष्ट लोगों की सुरक्षा प्रदान करने का कार्य किया जाता है। इनसे जुड़े सभी कार्यों को कंपनी के स्किल्ड और क्वालिफाइड लोगों को सौंपा जाता है। इनका वेतन अन्य की तुलना में अच्छा होता है, साथ ही इन्हें छोटी बंदूक चलाने का प्रशिक्षण भी दिया जाता है।
रिस्क मैनेजर्स: किसी भी जगह की सुरक्षा से पहले वहां मुआयना करने का काम इनके जिम्मे होता है।
रिस्क एनालिस्ट: किसी भी जगह को सुरक्षा प्रदान करने के बाद वहां किस तरह का जोखिम हो सकता है, इसका विश्लेषण कर टीम सदस्यों को इसकी जानकारी देना इनका काम होता है। 
रिस्क मिटिगेशन: जोखिम की आशंका और उसके कारण होने वाले नुकसान को कम से कम करने के उपायों का विश्लेषण करने का काम इस विभाग के लोग करते हैं।
साइबर सिक्योरिटी प्रोफेशनल्स: साइबर गतिविधियों, डाटा सुरक्षा और साइबर गड़बड़ियों को रोकने आदि के कार्य इनके जिम्मे आते हैं।
कॉरपोरेट इंटेलिजेंस: कुंवर विक्रम सिंह के अनुसार, कॉरपोरेट गलियारों में प्राइवेट जासूसों की मांग बढ़ती जा रही है। डिटेक्टिव एजेंसियों की मार्फत कंपनियां अपनी प्रतिद्वंद्वी कंपनियों के प्रोडक्ट और सर्विसेज पर नजर रखती हैं। दूसरी कंपनियों के कर्मचारियों और उनकी संभावित बिजनेस डील पर भी नजर रखने के लिए लोगों को हायर किया जाता है। एजेंसियों ने इसे कॉरपोरेट इंटेलिजेंस का नाम दिया है।

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