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क्षमादान के अनुरोधों पर कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा

सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा को उम्र कैद में तब्दील करने का आग्रह कर रही क्षमादान याचिकाओं के समूह पर गुरुवार को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। यह याचिकाएं उन दोषियों ने दाखिल की हैं जिनके क्षमादान संबंधी आग्रह पर राष्ट्रपति की ओर से काफी समय से फैसला नहीं किया गया है।

न्यायमूर्ति जीएस सिंघवी और न्यायमूर्ति एसजे मुखोपाध्याय की पीठ ने फैसला सुरक्षित रखा और अतिरिक्त सॉलिसीटर जनरल हरिन रावल को उसके इस सुझाव पर विचार करने के लिए कहा कि क्षमादान याचिकाओं के निपटारे के लिए समय सीमा तय की जानी चाहिए। रावल ने सुझाव पर जवाब देने के लिए तीन माह का समय मांगा।

इससे पहले न्यायालय ने प्रख्यात अधिवक्ता राम जेठमलानी से लिखित में यह बताने के लिए कहा था कि क्या राष्ट्रपति को क्षमादान याचिकाओं पर फैसला करते समय वस्तुपरक तरीके से निर्णय करना चाहिए। न्यायालय को लगा कि प्रशासन की भूमिका शायद सलाहकारी है और अंतिम निर्णय राष्ट्रपति का होता है।
   
खालिस्तान लिबरेशन फोर्स (केएलएफ) के आतंकवादी देविंदरपाल सिंह भुल्लर के परिवार ने भी उसकी ओर से याचिका दाखिल कर, उसे सुनाई गई मौत की सजा को उम्र कैद की सजा में तब्दील करने की मांग की है। उनका तर्क है कि भुल्लर की क्षमादान याचिका पर फैसला करने में विलंब हो रहा है और भुल्लर की मानसिक हालत भी ठीक नहीं है।

भुल्लर को सितंबर 1993 में यहां एक कार्यालय में बम विस्फोट करने के लिए मौत की सजा सुनाई गई है। इस विस्फोट में नौ व्यक्तियों की मौत हुई थी।

 

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