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जाको राखै साइयां मार सके ना कोय

कुदरत का खेल ही तो है जो चार मंजिला इमारत के मलबे में पिछले 90 घंटे से दबा और जीने की आस छोड़ चुके एक बालक को सुरक्षित निकाल लिया गया। उसे एक खरोच तक नहीं आई और कंबलों के बीच सुरक्षित बच गया।

सेना के जांबाज जवानों ने जैसे ही ग्रिल काटी तो उसमें से एक जिंदगी रेंगते हुए झांक कर मदद की गुहार करने लगी। राहत एवं बचाव कार्य में जुटे बहादुर जवानों ने उसे कड़ी मशक्कत के बाद मलबा हटाकर बाहर निकाल लिया और उसने जान बख्शनें के लिए भगवान का शुक्रिया अदा किया।

भूख-प्यास के बीच और जिंदगी की आस छोड़ बैठे अट्ठारह वर्षीय नीतीश को यकीन नहीं हो रहा है कि वह अभी तक जीवित है। उसने तो अपनी तनख्वाह तथा अपने साथियों के गांठ में रखे करीब दस हजार रुपए की गड्डी को नोंच फाड़ दिया था।

उसे देर रात बाहर निकाला और सिविल अस्पताल में भर्ती कराया है। उसके साथ ही कल बचाया गया संजीव भी भर्ती है। उसे आईसीयू के ट्रामा वार्ड में भर्ती कराया है। नीतीश फैक्टरी की पहली मंजिल पर कंबलों के रफू कर रहा था। उसके चारों ओर कंबलों के ढेर लगे थे।

इमारत गिरते समय कंबलों के ढेरों ने उसे सहारा देने का काम किया। इसीलिए उसे एक कील तक नहीं चुभी। वह ऐसी जगह दबा हुआ था जहां उसकी चीख पुकार तक सुनाई नहीं पड़ रही थी।

उधर फैक्टरी के मलबे को अभी तक हटाया नहीं जा सका है और करीब 60-70 मजदूर अभी तक मलबे में दबे हैं। अभी तक घटनास्थल से 19 शवों को ही निकाला गया है। इनमें पांच अज्ञात और शेष की पहचान कर ली गई है। सोलह लोग आईसीयू में भर्ती हैं।

अजीत कुमर, रामलाल, जयप्रकाश के शव रात को निकाले गए हैं। लाख कोशिशों के बावजूद मलबा हटाने में विकट मुश्किलें आड़े आ रही हैं। उधर हादसे के पहले दिन देवी तालाब मंदिर अस्पताल में भर्ती करीब चालीस मजदूरों को प्राथमिक चिकित्सा और कुछ पैसे देकर खानापूर्ति करने के बाद आनन फानन में भगाए गए मजदूरों को अभी तक कोई पता नहीं चल सका है। आज उनमें से ही घायल पंद्रह मजदूर कराहते हुए सिविल अस्पताल पहुंचे।

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