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हर रिश्ता हो जाएगा खुशियों भरा

हर रिश्ता हो जाएगा खुशियों भरा

मन-मुटाव, नोंक-झोंक किस रिश्ते में नहीं होते! हम रिश्ते को प्यार और आपसी विश्वास भरा बनाने की कोशिश जरूर कर सकते हैं। पर कैसे अपने रिश्ते के दुश्मनों को पहचानें और उन पर पार पाएं, ऐसे तमाम सवाल लेकर फैमिली रिलेशनशिप काउंसलर डॉ. गीतांजलि शर्मा से मिलीं सुषमा कुमारी

प्रेम की पींगें बढ़ाते प्रेमी युगल हों या फिर नवविवाहित दंपति, दोस्त हों या सहकर्मी, भाई-बहन हों या हमउम्र ननद-भाभी, या फिर सदियों से चलता आ रहा नोंक-झोंक भरा सास-बहू का रिश्ता, हर रिश्ते में आज परेशानियां, मनमुटाव, अविश्वास, ईर्ष्या, द्वेष, अहंकार जैसी भावनाएं हावी होती दिखती हैं। नतीजतन, रिश्ते टूट रहे हैं। चाहे कोई भी रिश्ता हो, उसकी उम्र छोटी ही होती जा रही है। लंबे समय तक लोग एक-दूसरे का साथ बनाकर रख ही नहीं पा रहे हैं। रिलेशनशिप के कुछ ऐसे ही दुश्मनों के बारे में बता रही हैं पिछले 15 वर्षों से रिश्तों की इन अनसुलझी पहेलियों को सुलझाने की कोशिश कर रहीं फैमिली रिलेशनशिप काउंसलर डॉ. गीतांजलि शर्मा। आइए, डालते हैं एक नजर..

भाई-बहन के दुश्मन
तुलना: सबसे बड़ा फैक्टर तुलना का है। बच्चों को जब लगता है कि मम्मी-पापा एक को ही ज्यादा प्यार कर रहे हैं तो दोनों के बीच लड़ाई का भाव आ जाता है। ऐसे में दोनों को समझना होगा कि भाई-बहन में किसी एक की गलती से दूसरे को डांट पड़ी है तो इस कारण आपस में बात बंद कर देना समस्या का हल नहीं है। एक-दूसरे से बदला लेने की भावना नहीं आनी चाहिए।

दुश्मनी: भाई-बहन के बीच दोस्ती का रिश्ता होना चाहिए, न कि दुश्मनी का। माता-पिता को भी अपने बच्चों के बीच दोस्ती को बढ़ावा देना चाहिए। उन्हें समझाना चाहिए कि वे पूरी जिंदगी भर के लिए एक-दूसरे के न सिर्फ भाई-बहन हो सकते हैं, बल्कि दोस्त भी।

एक-दूसरे को सहयोग करने का भाव न होना: भाई-बहन के बीच भी एक-दूसरे के प्रति सम्मान और जरूरत पड़ने पर मदद करने का भाव होना चाहिए। यह एक ऐसा संबंध  है, जो जीवन भर चलता है। भाई-बहन को हमेशा लगता है कि जरूरत पड़ने पर दोनों एक-दूसरे पर निर्भर हो सकते हैं, इसलिए जरूरत पड़ने पर दोनों को एक-दूसरे का साथ देना चाहिए और उन्हें एक-दूसरे को सहयोग भी करना चाहिए।
बदतमीजी: आपका  व्यवहार एक-दूसरे के प्रति प्यार भरा होना चाहिए न कि एक-दूसरे के साथ आपको बदतमीजी से पेश आना चाहिए। इस रिश्ते में भी एक प्यार होता है, जिसे हमेशा बनाए रखना चाहिए।

दोस्तों के दुश्मन
चलता है एटीटय़ूड:
दोस्त एक-दूसरे को गंभीरता से नहीं लेते। वे सोचते हैं कि कुछ भी हो, दोस्त हमेशा मेरे साथ रहेगा ही। आज के परिप्रेक्ष्य में यह समझना जरूरी है कि चाहे वह आपका सबसे प्यारा दोस्त हो, लेकिन उसके साथ आपका खून का रिश्ता नहीं है। दोस्ती एक ऐसा रिश्ता है, जिसमें अपेक्षाएं धीरे-धीरे ज्यादा हो जाती हैं। ऐसे में सभी सोचने लगते हैं कि मैं सही हूं या गलत, मैं जो भी करूं, दोस्त हमेशा मेरे साथ रहेंगे ही। आपकी यह सोच आपकी दोस्ती को खत्म कर देती है। यह समझना जरूरी है कि किसी मुद्दे पर आपका और आपके दोस्त का सोचने का नजरिया अलग-अलग हो सकता है। इस बात को ध्यान में रखकर ही कोई काम करना चाहिए। दोस्तों में लड़ाई-झगड़े भी हो जाते हैं। तब दोनों को लगता है कि हमारी गलती नहीं है, ऐसे में बातचीत की शुरुआत पहले कौन करे, सबसे बड़ी समस्या यही आती है।

बदलता इक्वेशन: अमूमन दोस्ती की शुरुआत कम उम्र में होती है और उस दौरान हमसे गलतियां भी ज्यादा होती है। समय के साथ दोस्ती का इक्वेशन बदलता रहता है। धीरे-धीरे व्यस्तता बढ़ती जाती है और दोस्तों के पास एक-दूसरे के लिए वक्त कम होता जाता है। इसलिए इस रिश्ते में एडजस्टमेंट की बहुत ज्यादा जरूरत होती है। साथ ही, एक-दूसरे को समझना भी उतना ही जरूरी होता है।

सहानुभूति का न होना: इस रिश्ते में एक-दूसरे को समझना और एक-दूसरे की गलतियों को माफ करना सीखना सबसे जरूरी होता है। यदि किसी से गलती हो गई है तो यह समझना होगा कि गलती क्यों हो गई? चूंकि उनके रिश्ते के इक्वेशन में बदलाव आता रहता है, इसलिए एक-दूसरे की परिस्थिति को समझना भी जरूरी है। यह समझना जरूरी है कि अब दोस्त किस स्थिति में है। यह न सोचें कि मेरी गलती नहीं है तो मैं क्यों माफी मांगूं।

रिश्ते की अहमियत: दोस्ती की अहमियत को समझना बहुत जरूरी है। ऐसा न हो कि दोस्त समय न दे पा रहा हो तो आप यह समझें कि वह आपको हल्के में ले रहा है या आपकी दोस्ती उसके लिए मायने नहीं रखती। अगर आपको लगता है कि आपका दोस्त आपसे कुछ शेयर नहीं कर पा रहा है या नहीं कह पा रहा है तो आपको इसका कारण समझना होगा। शादी के बाद अगर आपका दोस्त आपसे कम बातें शेयर करने लगा है तो इस बात को समझों कि पति-पत्नी का रिश्ता अन्य रिश्ते से ऊपर है। अपने सोचने का तरीका बदलें।

ननद-भाभी की तू-तू, मैं-मैं
तुलना:
ननद और भाभी को यह समझना होगा कि किसी भी व्यक्ति के लिए पत्नी और बहन दोनों जरूरी हैं। इसलिए उन्हें दोनों में से किसी एक का चुनाव करने के लिए बल न डालें। हर बात पर तुलना न करें। भाई या पति के व्यवहार पर सवाल खड़े न करें। शादीशुदा ननद है तो वो अक्सर भाभी से तुलना करती हैं कि वो कितनी बार मायके आती है फिर मैं क्यों न जाऊं? उसे हर बात के लिए इतनी छूट मिलती है तो मुझे क्यों नहीं? रिश्ते के बीच तुलना रिश्ते को सिर्फ बिगाड़ती है, इसलिए ऐसा न करें।

आलोचना: यदि आप एक-दूसरे की बुराई करती नहीं थकतीं, तो ऐसा न करें। सास, पति, भाई या मां के सामने एक-दूसरे की बुराई न करें कि उसने ये कर दिया या वो कह दिया।

प्रभुत्व: यह सच है कि नए घर में भाभी चाहती है कि मेरा प्रभुत्व रहे, जबकि ननद को लगता है कि अब तक मेरी ही बातें मानी जाती थीं तो आज भी वैसा ही हो। इस घर में हमेशा मेरी ही बात सुनी जाती थी तो आज भी मेरी ही बात सुनी जाए। लेकिन दोनों को समझना होगा कि वक्त के साथ समय व परिस्थिति में भी बदलाव आता है। ननद को यह समझना भी जरूरी है कि वह नई बहू को यह महसूस न करवाए वह इस घर में नई है।

हमउम्र होना: भाभी और ननद दोनों की उम्र अक्सर समान होती है। दोनों को समझना होगा कि उनकी वजह से उनके भाई या पति को परेशानी न हो। एक उम्र होने के कारण  दोनों के बीच अक्सर लड़ाई होती रहती है। ननद-भाभी के रिश्ते को दोस्ती में तब्दील करने की कोशिश करें।

सास-बहू की किच-किच
आदर न करना
: सास-बहू दोनों को एक-दूसरे का सम्मान करना चाहिए। सास को मां की तरह प्यार और आदर देना चाहिए। वहीं, सास को भी बहू के अस्तित्व का आदर करना चाहिए।

जैसे को तैसा: जैसे को तैसा वाली भावना मन में न रखें। इसे दूर कर दें। उन्होंने मेरे साथ ऐसा किया, इसलिए मैं भी उनके साथ ऐसा करूंगी, जैसी भावनाएं मन में आना सही नहीं है। यह रिश्ते को बनने नहीं देता, बल्कि बिगाड़ देता है।

असुरक्षा: शादी के बाद बेटे को लेकर मां को यह चिंता सताने लगती है कि बहू कहीं बेटे को उससे दूर न कर दे! कहीं न कहीं ऐसा वह अपने भविष्य की सुरक्षा को लेकर सशंकित हो जाती है। बहू अपने व्यवहार से सास का यह डर दूर कर सकती है। दूसरी ओर सास को भी यह समझना चाहिए कि बेटे और बहू की नई जिंदगी की शुरुआत है, ऐसे में असुरक्षित महसूस नहीं करना चाहिए। उन दोनों का एक-साथ वक्त बिताना भी तो जरूरी है ताकि वे आगे की जिंदगी आसानी से जी सकें। बेटे-बहू को साथ वक्त बिताने का पूरा मौका दें।

अपेक्षाएं: सास और बहू दोनों ही को एक-दूसरे को वैसे ही स्वीकारना चाहिए जैसी कि वे हैं। दोनों को समझना चाहिए कि वे इतने सालों से एक लाइफस्टाइल से जी रही हैं तो अचानक से खुद को बदलना उनके लिए आसान नहीं होगा। खासकर इस उम्र में सास को बदलना और भी मुश्किल होगा। इसलिए आपस में मनमुटाव न रखें। सास की उम्र का लिहाज रखें, उन्हें सम्मान दें। सास भी बहू की अलग पहचान का आदर करें।

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