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खुशहाली के लिए बड़ों का साथ

एकल परिवारों में उम्रदराज रिश्तेदारों की जगह दिन-ब-दिन कम होती जा रही है। किसी के पास इतना समय नहीं कि बड़े-बूढ़ों की बातें सुनें, उनको साथ लेकर चलें या उनकी देखरेख करें। परिवार की खुशहाली के लिए क्यों बना रहना चाहिए बड़े-बूढ़ों का साथ, बता रही हैं किरण

संजना को जैसे ही पता चला कि उसकी जेठानी ने सास-ससुर को पटना से दिल्ली रवाना कर दिया है, उसका चैन गायब हो गया। सास-ससुर के दिल्ली आने का मतलब है छह महीने की कैद। घर इतना बड़ा नहीं कि उन्हें अलग से एक कमरा दे सकें, आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं कि पूरे वक्त का नौकर रख सकें। संजना की बेटी को दादी का उसे हर वक्त टोकना पसंद नहीं, तो बेटा दादाजी के हर वक्त बोलने को लेकर घबराता है। संजना खुद भी उनके आने के पहले अपनी शिकायतों की पोटली खोल कर बैठ जाती है। घर में बड़े-बुजुर्ग के रहने से ऐसा नहीं है कि उसे मदद नहीं मिलती। दादा के घर पर रहने से बच्चे समय से उठते हैं, टय़ूशन पढ़ने जाते हैं। दादी घर में काम करने वाली पर नजर रखती है। खाना वक्त पर और अच्छा बनता है। संजना अपनी सास से घरेलू टिप्स लेती रहती है। संजना का बचपन संयुक्त परिवार में बीता है। वह अपनी दादी से बेहद अटैच्ड थी। उन्हीं के साथ सोती, खाती। लेकिन जब बात अपनी सास और बेटी के बीच संबंधों को लेकर आती है तो संजना गच्च खा जाती है। उसका मानना है, ‘हमें शुरू से आदत थी दादा-दादी के साथ रहने की। उनका टोकना बुरा नहीं लगता था। पर हमारे बच्चे ऐसे नहीं हैं। मेरी बेटी को लगता है कि उसकी दादी ओल्ड फैशन्ड है।’ पुरानी पीढ़ी और नई पीढ़ी के बीच द्वंद्व हमेशा रहा है। संजना की दादी को भी उसका बैल बॉटम पहनना अच्छा नहीं लगता था, उसी तरह जैसे संजना की सास को पोती का लो वेस्ट जीन्स पहनना। पर यह इतनी बड़ी बात नहीं, जो सुलझाई न जा सके।  मनोचिकित्सक डॉ. उमा पई के अनुसार, ‘बुजुर्गो को साथ रखना उतना मुश्किल नहीं है। होता यह है कि अधिकांश परिवारों में नई पीढ़ी व पुरानी पीढ़ी के बीच संवादहीनता की स्थिति हो जाती है।  नई पीढ़ी अगर उनसे अपने दिल की बात खुल कर कहे तो वह मानते हैं। फिर पुरानी पीढ़ी भी तो यह देख रही है कि जमाना बदल गया है, अब पहले की तरह बच्चों पर हुक्म चला कर नहीं रहा जा सकता।’ 

हर शहर में कई पुराने मोहल्लों में अब बच्चे दिखते ही नहीं हैं। पढ़ने और नौकरी के लिए घर से बाहर निकले बच्चे लौट कर अपने शहर नहीं आते। माता-पिता अकेले रह जाते हैं। आज का बुजुर्ग वर्ग भी कम खुद्दार नहीं। वह खुद बेवजह अपनी जमीं से नहीं उखड़ना चाहता। सत्तर साल की मालिनी अपनी मर्जी से अकेली रहती हैं गाजियाबाद में। उनकी बेटी महीने में एक बार उनसे मिलने आती है। मालिनी कहती हैं, ‘मैंने पूरी जिंदगी नौकरी की और अपनी तरह से जिंदगी बिताई है। अब इस उम्र में मैं एडजस्ट नहीं कर सकती। जब बहुत बीमार हो जाऊंगी, तो शायद किसी ओल्ड एज होम में रह लूंगी। पर मुझे अपने नाती-पोतों की नजर में इज्जत चाहिए। अगर आपको अपने बच्चों और पोते-पोतियों के साथ रहना है, तो खुद को काफी बदलना होगा।’

मालिनी कहती हैं, ‘सालों पहले जब मेरी दादी ने मेरे पिता से कहा कि लड़की को दसवीं के बाद पढ़ाने की जरूरत नहीं है, तो मुझे वो एक खलनायिका से कम नहीं लगी। मैं उनसे बहुत झगड़ा करती थी। तभी मैंने सोच लिया था कि मैं हमेशा समय के साथ चलूंगी। मेरी पोती ऑस्ट्रेलिया में पढ़ती है और साल में एक महीने मेरे पास आ कर रहती है। हम दोनों साथ में पिक्चर देखने जाते हैं, रेस्तरां जाते हैं, नए उपन्यासों पर चर्चा करते हैं। मुझे उसके आने का इंतजार रहता है और उसे मुझसे मिलने का। रिश्तों को बनाए रखने में अगर वो एक कदम पीछे चल रही है, तो मुझे दो कदम आगे बढ़ाने में दिक्कत क्यों होनी चाहिए?’

डॉ. उमा, मालिनी की बातों से पूरी तरह सहमत हैं, ‘बुजुर्ग किसी भी परिवार के लिए बहुत मायने रखते हैं। इसके लिए जरूरी है, उन्हें सब अपने परिवार का हिस्सा मानें। अगर मां-बाप को बुढ़ापे में अपने बच्चों की जरूरत है, तो बच्चों को भी उनकी जरूरत है।’

फासले बढ़ रहे हैं रिश्तों में
पिछले पांच सालों में बुजुर्गों पर होने वाले अत्याचार लगभग बाईस प्रतिशत बढ़े हैं। देश भर के करीब 2,248 वृद्धाश्रमों में पहले के मुकाबले रहने वाले बुजुर्गो की संख्या पांच गुना तक बढ़ी है। बड़े शहरों में अकेले रहने वाले बुजुर्ग 11 प्रतिशत बढ़े हैं और इनमें से अधिकांश डर और असुरक्षा के साए में जीते हैं।

साथ क्यों है जरूरी?
बड़े बच्चों के गाइड बनते हैं और घर को संभालने में भी बहुत मदद मिलती है।
साथ रहने से कई तरह के तनावों से मुक्ति मिलती है।
घर में खुशहाली का माहौल बना रहता है।

जमाने के साथ-साथ
किसी भी उम्र में यह न सोचें कि नया सीखने की उम्र बीत गई। आज की दुनिया में जब सब कुछ इतनी तेजी से बदल रहा है, तो पोते-पोतियों के साथ कदमताल करते हुए कंप्यूटर सीखें, नए जमाने की भाषा को अपनाएं।
अपने आपको स्वस्थ रखें। रोज टहलने जाएं। दोस्तों के साथ खूब हंसे-बोलें। घर की राजनीति में बिलकुल न पड़ें।
अपनी पसंद-नापसंद, जिद और अपने जमाने के किस्सों का पिटारा हर वक्त लेकर न बैठ जाएं।

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