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कानूनी पेंच में फंसाने का चुनावी तिकड़म

वरीय संवाददाता पटना। ‘सर, .. नंबर वार्ड के पार्षद के रिश्तेदार ने स्थानीय दुकानदार के साथ मारपीट की है। उसकी दबंगई के खिलाफ थाने में शिकायत दर्ज कराई गई है। उस पर कार्रवाई कीजिए।’ इन दिनों पटना पुलिस के विभिन्न स्तर के अफसरों के पास ऐसे फोन आ रहे हैं जिनमें वार्ड पार्षद या उसके परिजनों से जुड़े मामलों में कार्रवाई के लिए अनुरोध किया जाता है। वैसे यह विरोधी प्रत्याशी के पक्ष की खास ‘चाल’ है।

जनसंपर्क के दौरान विरोध कर रहा प्रत्याशी इसी केस की दुहाई देते हुए लोगों को हड़काते-समझाते हैं-‘देख लीजिए। अभी इनके कुछ रिश्तेदारों का ही आतंक है। पुलिस उन्हें खोज रही है। ..जब चुनाव जीत जाएंगे तो क्षेत्र में कहर बरपाएंगे और पुलिस भी कुछ नहीं करेगी।..’ दरअसल नगर निकाय के चुनावी अखाडेम् में कूदे प्रत्याशी अपने विरोधी को चित करने का कोई दांव नहीं छोड़ना चाहते।

कानूनी पेंच में फंसाने का चुनावी तिकड़म भी चल रहा है ताकि आरोपित उम्मीदवार का ध्यान चुनावी गणित या वोट की जुगाड़ करने के बदले अपने बचाव पर ही रहे। इससे मानसिक परेशानी भी होगी। आलम यह है कि अधिकांश प्रत्याशी अपने विरोधी की हर गतिविधियों पर नजर रखते हैं।

इनका एक ही मकसद होता है उनकी गड़बड़ी या खामियों की तलाश करना ताकि उन्हें किसी न किसी तरह कोई उलझन या परेशानी में डाला जा सके। कई बार तो इसी चक्कर में विरोधी पक्ष परेशान हो या नहीं पर पुलिस की फजीहत हो जाती है।

कभी-कभार पुलिस को किसी प्रत्याशी द्वारा समर्थकों के बीच शराब और कबाब परोसने और असलहे लहराने की सूचना मिलती है। जब पुलिस वहां पहुंचती है तो कुछ नहीं मिलता। फिलहाल तिकड़म या साजिशों की रफ्तार तो थोड़ी कम है पर अगले सप्ताह से इसमें तेजी आना तय है। आने वाले दिनों में कुछ इलाकों में चुनावी जंग को लेकर जोर-आजमाइश हिंसक रूप भी ले सकती है।

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