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मल्हारों ने तकदीर और सूरत बदलने का देखा था सपना

मगनपुर(रामगढ़) ’ मोबिन अख्तर। जनजातीय समुदाय के उत्थान के लिए राज्य सरकार भले ही करोड़ों रुपए खर्च कर सूरत बदलने का दावा कर रही है। लेकिन उन दावों की खोखली हकीकत का पता रामगढ़ जिले की बंदा पंचायत के बाजारटांड़ में बसे मल्हारों से मिल कर किया जा सकता है। यहां बसे मल्हार आज भी सरकारी उपेक्षा का दंश झेल रहे हैं।

बुनियादी सुविधाओं के लिए जारी है जद्दोजहद सौ वर्ष पूर्व यहां बसे मल्हारों के 40 परिवारों में कुल 280 सदस्य हैं। जो अनगिनत समस्याओं से जूझते हुए जीवन बसर कर रहे हैं। अलग राज्य बनने के साथ इनमें उम्मीद जगी कि अब उनके दु:खों के दिन बीत गए और रोजगार सृजन के साथ उनकी तकदीर और टोले की सूरत बदलेगी। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।

आज भी यह समुदाय बुनियादी सुविधाओं के लिए जद्दोजहद कर्र रहा है। बच्चों शिक्षा से दूरशिक्षा से कोसों दूर टोले के बच्चों फटे-पुराने कपड़ों में खेलते हुए तो कुछ माप-तौल का पैला, सेर व मूर्ति, हाथी, शेर सहित अन्य खिलौने गढ़ने में अपने माता-पिता की मदद करते नजर आते हैं।

जमीन मिली, पर नहीं मिला आजतक इंदिरा आवासरोजगार की तलाश में टोले के कम से कम पांच दर्जन लोगों का पलायन दूसरे प्रदेशों में हो चुका है। बिरसाय मल्हार, यमुना मल्हार, गांगू मल्हार, दुंडला मल्हार, अर्जुन मल्हार, गोलमा मल्हार, सोमरा मल्हार, रामचरण मल्हार, जयराम मल्हार, हजारी मल्हार, खेदा मल्हार को भूमिदान में एक-एक डिसमिल जमीन तो दी गई है, लेकिन आज तक इन्हें इंदिरा आवास सरकार मुहैया नहीं करा सकी।

पंचायत की हकीकत’ मल्हारों के 40 परिवारों में कुल 280 सदस्य रहते हैं यहां, सरकारी योजनाएं बेमानी, रोजगार की तलाश में पलायन ’ घासफूस की झोपडिम्यों में जीवन बसर कर रहे हैं मल्ह

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