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समय का फेर

एक सज्जन हाल तक सत्ता में थे। उनके घर चौबीस घंटे बत्ती रहती थी। आसपास के घरों में भले अंधेरा हो, उनके यहां दूसरे फीडर से सप्लाई हो जाती थी। सब कुछ ऑटोमैटिक। उनका घर जगमग रहता था। धरना-प्रदर्शन भी हुए कि बगल में बत्ती आती है तो हमें क्यों नहीं मिलती? उनकी आंखों से गुस्सा झलकने लगा। हुंह कर बात उड़ा दी। चुनाव में जनता ने अपने तरीके से गुस्सा दिखा दिया। सत्ता से बाहर हो गए। अब बिजली ही नहीं, वे भी आम आदमी सरीखा व्यवहार करने लगे हैं। यह सिर्फ गाजियाबाद का किस्सा नहीं है, हमें कहीं भी दिख जाता है। सत्ता जाती है तो आदमी सामान्य हो ही जाता है!

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