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चीन चिंतन!

डॉक्टर स्वर्ण सिंह, प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, जेएनयू, सेंटर ऑफ इंटरनेशनल पॉलिटिक्स, ऑर्गेनाइजेशन एंड डिस्आर्मेट।

चीन में विकास का पहिया घूम रहा है। आर्थिक विकास की दर में इजाफा हो रहा है। लेकिन यह तसवीर का सिर्फ एक पहलू है। दूसरे पहलू में समस्याएं हैं। जन-जीवन में उथल- पुथल है। सामाजिक और सांस्कृतिक क्रांति की सुगबुगाहट है। विरोध और प्रदर्शन के स्वर हैं। नए नेतृत्व की तलाश और राजनीतिक साजिशें हैं। पूरा हाल बता रहे हैं डॉ.स्वर्ण सिंह


पिछले तीस साल में चीन की कारोबारी दुनिया में तेजी से इजाफा हुआ है। इस इजाफे का नतीजा यह है कि चीन की ताकत तेजी से बढ़ रही है और वह नए क्षेत्रों में दखलअंदाजी कर रहा है। चीन की दिलचस्पी कई ऐसे क्षेत्रों में बढ़ी है, जहां पहले उसका दखल कम दिखाई देता था। आर्कटिक, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका ऐसे ही क्षेत्र हैं। इतना ही नहीं, विज्ञान के क्षेत्र में भी चीन के नए रुझान दिखाई दे रहे हैं। समुद्र के अंदर जाकर चीजों की खोज करना, चांद की यात्रा पर जाना, एयरक्राफ्ट कैरियर का निर्माण करना, साइबर योद्धाओं की सेना तैयार करना ऐसे ही काम हैं। इस सारे विकास के साथ चीन अपनी सुरक्षा पर भी जी भर कर खर्च कर रहा है। चीन के रक्षा मंत्रालय के खर्चों का ब्योरा देखें तो इस साल चीन ने अब तक 100 बिलियन डॉलर खर्च कर दिए हैं। दूसरे क्षेत्रों मसलन शिक्षा, खेल और खेती पर भी चीन ने अपने खर्चे बढ़ाए हैं और इन क्षेत्रों के विकास पर पूरा ध्यान दिया है। लेकिन यह चीन की तसवीर का केवल एक पहलू है। इसके उलट चीन कई तरह की आंतरिक समस्याओं से भी जूझ रहा है। चीन की सामाजिक जिंदगी में बड़ी तेजी से बदलाव की लहर फैल रही है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि चीन के लोगों पर साठ साल से भी ज्यादा एक ही राजनीतिक पार्टी का नियंत्रण रहा है। इसीलिए बदलाव की जरूरत शिद्दत से महसूस की जा रही है। इसके अलावा चीन में अमीर वर्ग और गरीब वर्ग के बीच दूरियां बढ़ रही हैं। आधुनिक युवा अंसतुष्ट हैं। बावजूद इसके कि चीन में बार-बार साइबर कैफे और इंटरनेट को मिटाने की कोशिशें की गई हैं, चीन के नेट शौकीनों ने अपने लिए मौजूद दूसरे विकल्पों को नहीं चुना है। विरोध प्रदर्शन भी एक बड़ी समस्या है। किसान लगातार विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं, जिससे देश में शांति टूट रही है। तिब्बती भिक्षु अपना आंदोलन तेज कर रहे हैं। वे चीन के लिए जीते-जागते इनसानी बमों से भी ज्यादा घातक साबित हो रहे हैं। कुल मिला कर भीतरी स्तर पर एक तरह की उथल-पुथल मची हुई है। अहम बात यह है कि ये सारी समस्याएं ऐसी हैं, जिनका फिलहाल कोई समाधान भी दिखाई नहीं दे रहा है। जहां तक चीन के राजनीतिज्ञों का सवाल है तो वे पूरी कोशिश कर रहे हैं कि इस अनियंत्रित बदलाव की गति धीमी हो जाए। अमीर और गरीब क्षेत्र के बीच विकास की जो खाई है, वह पट जाए। लेकिन वे सफल नहीं हो पा रहे हैं। उनकी कोशिशें केवल आध्यात्मिक सभ्यता और संभ्रांत समाज की दुहाई देती नसीहतों तक सिमट गई हैं। ये सारी समस्याएं चीन के लिए एक ऐसी पहेली बन गई हैं, जिन्हें फिलहाल सुलझाना खासा मुश्किल काम हो रहा है। इसीलिए चीन की सरकार अपना ध्यान इन समस्याओं की बजाय चीन के अगले राजनैतिक उत्तराधिकारी पर लगा रही है। अगला नेतृत्व भी इस समय चीन के लिए एक बड़ा मुद्दा है। सूचना क्रांति ने इस मुद्दे को चीन के लिए हिमालय जितना विराट बना दिया है, जिसकी वजह से चीन की कम्युनिस्ट पार्टी संस्थागत रूप में कमजोर पड़ने लगती है। हालांकि चीन की यह पार्टी अभी भी अपने सबसे पुराने हथियार राष्ट्रवाद को ही बढ़ावा देने में लगी है, जो साफ तौर पर जता रहा है कि विचारधारा के आधार पर चीन कई दिशाओं में बंटा हुआ है और यह स्थिति तब तक बने रहने की आशंका है, जब तक चीन में पांचवीं पीढ़ी के नेता सत्ता न संभाल लें, जो कि इस साल के आखिर या अगले साल की शुरुआत में ही संभव होगा।

मौजूदा समय में चीन का चौथी पीढ़ी का नेतृत्व पूरी कोशिश में लगा है कि उसकी विदाई शांति से हो जाए और उसके रहते कोई बड़ी अनहोनी न घटे। इसके उलट चीन के पांचवीं पीढ़ी के नेता पूरी कोशिश कर रहे हैं कि चीन के भौगोलिक-राजनैतिक समीकरणों, आर्थिक स्थितियों और सामाजिक हालात पर उनकी पकड़ बन जाए। साथ ही वे लोगों के बीच अपनी पहचान और साख भी बना पाएं। इस समय चीन में भावी नेतृत्व के लिए जो नाम चल रहे हैं, वे नाम चीन में उस चलन की पैरवी ही करते हैं, जिसके तहत माना जाता है कि चीन में हर नई सरकार पुरानी सरकार के मुकाबले कम करिश्माई होती है। ऐसे में चीन के भविष्य के लिए कोई अच्छी संभावना नहीं दिखती, जो चीन के पड़ोसियों के लिए भी चिंता की बात है।

सबसे पहले बात करते हैं चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की, जो चीन की राजनीति का सबसे मजबूत खंबा है और चीन की आर्थिक प्रगति के लिए इंजन के समान है। लेकिन अगर ऊपर से देखें तो चीन के संभ्रांत तबके में इस पार्टी की सदस्यता को लेकर आकर्षण काफी कम हुआ है। चीन के ऐसे युवा जो आधुनिक विचारधारा के हैं या विदेश में रह कर आए हैं, पार्टी की सदस्यता नहीं लेना चाहते। चीन के युवा जानकार भी अक्सर पार्टी की नीतियों की आलोचना करते हैं। चीन में आलोचकों का एक पसंदीदा काम यह है कि जब सत्ता परिवर्तन का समय आता है तो वह कम्युनिस्ट पार्टी की मनगढ़ंत कहानियों का प्रचार-प्रसार करने लगते हैं, जिससे युवा और नए नेताओं को दरकिनार किया जा सके।

इस बाबत पिछले कुछ हफ्तों में चीन के ग्लैमरस छवि वाले नेता पो शिलाई की कहानी खूब प्रचारित की गई है, जिसे सुन-सुन कर चीन के लोगों ने चीन के ऐतिहासिक नेता लिन पियाओ से पो शिलाई का मुकाबला करना भी शुरू कर दिया है, जो खासी अतिश्योक्ति वाली बात है। एक समय में पो शिलाई चीन की म्युनिसिपैलिटी में सचिव हुआ करते थे। पिछले कुछ सालों में उन्होंने चीन में भ्रष्टाचार के खिलाफ कई मुहिमें छेड़ीं, जिससे लोग उन्हें पहचानने लगे और धीरे-धीरे वह चीन की राष्ट्रीय राजनीति का जाना-माना चेहरा बन गए। उन्होंने लगातार कोशिशें करके खुद को बतौर राष्ट्रीय नेता स्थापित कर लिया। अब से कुछ साल पहले उनका नाम चीन के पोलित ब्यूरो यानी अगली स्टैंडिंग कमेटी के शीर्ष के सात संभावित सदस्यों में गिना जाने लगा था। लेकिन हाल ही में पो शिलाई को पोलित ब्यूरो से इसलिए निष्कासित कर दिया गया, क्योंकि उन पर अनुशासनहीनता के साथ-साथ अपनी पत्नी पर हिंसा करने और एक ब्रिटिश व्यवसायी की हत्या के आरोप लगाए गए थे। ये सारे आरोप पो शिलाई के युवा दिनों के साथी नेता, चीन के पुलिस प्रमुख वांग लिचन और एक अन्य पूर्व नेता शिया टी-लियांग ने लगाए थे। इस सारे घटनाक्रम का असर यह हुआ कि शी जिन पिंग का रास्ता पूरी तरह से साफ हो गया और हु जिंताओ की जगह देश के अगले राष्ट्रपति बनने की उनकी राह भी आसान हो गई।

यह भी काफी दिलचस्प बात है कि इसी साल फरवरी में चीन के पुलिस प्रमुख वांग लिचन ने अपनी जान बचाने के मकसद के यूएस काउंसलेट के पास जाकर खुद को मानसिक अस्पताल में भर्ती कराने की मांग की। इस अधिकारी को डर था कि सरकार उसकी जान की दुश्मन है। हालांकि बाद में काफी नाटकीय घटनाक्रम के बाद इस अधिकारी ने चीन की केंद्रीय पुलिस के सामने समर्पण कर दिया। केंद्रीय पुलिस उन्हें जांच-पड़ताल के लिए बीजिंग ले आई। इस घटना की लगभग विदेश के मीडिया में न सिर्फ निंदा की गई, बल्कि इसके बाबत सफाई भी मांगी गई।


चीन और भारत!
यह काफी दिलचस्प बात है कि चीन के बाद भारत अकेला ऐसा देश है, जिसकी जनसंख्या 1.2 बिलियन के करीब है और जिसकी आर्थिक दर तेजी से बढ़ रही है। चीन की तरह भारत भी अपना नेतृत्व युवा हाथों में सौंपने की तैयारी कर रहा है। माना जा सकता है कि सन 2014 में भारत की कमान युवा हाथों में होगी। मजे की बात यह है कि भारत की मजबूत लोकतांत्रिक संस्थाओं को देखते हुए कई विशेषज्ञ अनुमान लगा रहे हैं कि आने वाले वक्त में भारत का विकास लंबे समय तक टिकेगा और धीरे-धीरे भारत चीन से ज्यादा विकसित देश बन जाएगा। विशेषज्ञों की यह बात भारतीयों के लिए खुशखबरी के समान है, लेकिन इससे भारत और चीन के सबंधों में मुश्किलें आने की संभावना है, जिसका असर पूरी दुनिया पर भी दिखाई देगा। मौजूदा हालात में जिस तेजी से चीन का विस्तार हो रहा है, उसके चलते पूरी दुनिया की नजर चीन और भारत के रिश्तों पर है। इसीलिए जरूरत है कि दोनों देश सावधानी और संजीदगी से अपने संबंधों को बनाए और बचाए रखें। हम भारतीयों को जिस बात का सबसे ज्यादा ध्यान रखना है, वह यह कि हमें चीन में हो रहे विकास की जानकारी रखनी है। चीन और भारत दोनों ने ही इतनी साख तो बना ली है कि दोनों देश अपने अतीत और साझा समस्याओं के मद्देनजर अपने वर्तमान के संबंधों को पटरी से उतरने नहीं देंगे।

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