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कार्ल मार्क्स का नया अवतार

यह मात्र संयोग है या इतिहास की कोई नियोजित व्यवस्था क्रम का एक हिस्सा कि दुनिया के मशहूर इतिहासकार एरिक हॉब्सबॉम की प्रसिद्ध पुस्तक हाउ टू चेंज द वर्ल्ड: टेल्स ऑफ मार्क्स ऐंड मार्कसिज्म का आना और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा पश्चिम बंगाल के स्कूल की पाठय़ पुस्तकों से कार्ल मार्क्स की जीवनी को हटाना, दोनों बातें आस-पास ही हुईं। हॉब्सबॉम की पुस्तक कार्ल मार्क्स की आज के दौर में वापसी, उनके नए अवतार की प्रासंगिकता को महत्वपूर्ण ढंग से उजागर करती है। हालांकि पश्चिम बंगाल की राजनीति कार्ल मार्क्स के इस महत्व से अलग है। वहां इसकी शुरुआत छोटे बच्चों को विचारधारा की खुराक पिलाने के लिए की गई थी। अब ममता ने इस खुराक को बंद कर दिया है। इस मामले में दिलचस्प तथ्य यही है कि जब दुनिया कार्ल मार्क्स से मुंह मोड़ रही थी, तो पश्चिम बंगाल के बच्चे उनकी जीवनी पढ़ रहे थे, लेकिन जब दुनिया उनकी ओर देख रही है, तो वहां के बच्चे उनके बारे में नहीं पढ़ सकेंगे।

पश्चिम बंगाल के इस कार्ल मार्क्स विमर्श से अलग एरिक हॉब्सबॉम बताते हैं कि 21वीं सदी में मार्क्स का नया अवतार हुआ है। यह अवतार सोवियत क्रांति और मार्क्सवादी-लेनिनवादी रूढ़ अर्थों से भिन्न है। वर्तमान ग्लोबल बाजार पर आधारित अर्थव्यवस्था ने इसमें नया अर्थ भर दिया है। बीबीसी ने पिछले दिनों अपने ब्रिटिश श्रोताओं के बीच ‘महान दार्शनिकों’ पर एक सर्वेक्षण किया था। यह आश्चर्यजनक था कि ब्रिटेन जैसे पूंजीवादी और पूर्व उपनिवेशवादी देश के इस सर्वेक्षण में कार्ल मार्क्स शीर्ष पर आए। अगर आप गूगल सर्च पर जाकर ‘मार्क्स’ का नाम टाइप करेंगे, तो उनकी सर्वाधिक बौद्धिक उपस्थिति आपको दिखाई पड़ेगी। साइबर स्पेस में गूगल सर्च द्वारा पकड़े गए दुनिया के बौद्धिक विमर्श में कार्ल मार्क्स की उपस्थिति एडम स्मिथ और फ्रायड से भी ज्यादा है। हालांकि डार्विन तथा आइंस्टीन की तुलना में उनकी उपस्थिति कमतर है। एरिक हॉब्सबॉम एक रोचक तथ्य की ओर इशारा करते हैं कि कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो का 150वां वर्ष 1998 में पूरा हुआ, जो एक प्रकार से ग्लोबल अर्थव्यवस्था के उभार का दशक था। उस वर्ष कार्ल मार्क्स द्वारा रचित कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो का नाम समाजवादियों और वामपंथियों से ज्यादा पूंजीवादियों ने लिया था। दरअसल, समाजवादी और वामपंथी जहां कार्ल मार्क्स का नाम लेते शरमाए हुए से लगते हैं, वहीं पूंजीवादी व बाजारवादी ताकतें उनकी स्मृति का उत्सव मना रही हैं। यहां तक की यूनाइटेड एयर लाइंस ने अपनी पत्रिका मेंकम्युनिस्ट मैनिफेस्टो पर एक विस्तृत लेख छापा, जबकि इस पत्रिका के 80 प्रतिशत पाठक अमेरिका के व्यापारी वर्ग के लोग होते हैं। दूसरी तरफ, अगर आप मलयेशिया, सिंगापुर, वियतनाम, शंघाई जैसे एशियाई देशों के एयरपोर्ट से गुजरें, तो वहां पर बनी एयर शॉप में आपको कार्ल मार्क्स और चे ग्वेरा जैसे मार्क्सवादी आइकॉन के चित्रों वाली टी-शर्ट बिकती हुई दिख जाएंगी। चे ग्वेरा वाली टी-शर्ट्स तो दिल्ली के जनपथ में भी बड़ी संख्या में दिख जाती हैं।

लैटिन अमेरिकी विश्वविद्यालयों में पढ़ रहे अश्वेत छात्रों के अनेक जत्थे अपनी पार्टियों में आपको ‘हम होंगे कामयाब’ (वी शैल ओवरकम) गाते हुए मिल जाएंगे। ऐसा ही एक अनुभव मुझे सूरीनाम की यूनिवर्सिटी में इतिहास के छात्रों को पढ़ाते वक्त हुआ। कोर्स की समाप्ति के दिन ज्यादातर छात्र ‘वी शैल ओवरकम’ गीत गा रहे थे। यह वही गीत है, जो हमने अपने छात्र जीवन में मार्क्सवादी आंदोलन में गाए थे।

यह तय है कि 21वीं सदी का यह ‘कार्ल मार्क्स’ का अवतार 20वीं सदी के मार्क्स के प्रतीकों और छवियों से भिन्न है। आज के दौर में समाजवादियों से ज्यादा पूंजीवादियों को उनकी जरूरत है। जॉर्ज सोरो नामक चिंतक कहते हैं, ‘क्योंकि पूंजीवाद को 150 वर्ष पहले मार्क्स ने खोजा था, अत: उन्हें याद करना ही चाहिए।’

ग्लोबल पूंजीवाद सदैव अपने में संशोधन करता रहता है और शायद यही उसकी आत्मशक्ति भी है। इसलिए वह कार्ल मार्क्स की अंतर्दृष्टियों का इस्तेमाल करना चाह रहा है। ग्लोबल इकोनॉमी पिछले दिनों ‘डिप्रेशन’ के दौर से गुजरी है और कुछ हद तक अब भी गुजर रही है। यूरोपीय देशों और अमेरिका की अर्थव्यवस्था अनेक अंतर्विरोधों व परेशानियों से गुजर रही है। ऐसे में, कार्ल मार्क्स जैसे दुश्मन को भी उसने अपने रोगों की पहचान के लिए एक डॉक्टर के रूप में आविष्कृत किया है। इंग्लैंड के कैंब्रिज, ऑर्क्सफोर्ड जैसी यूनिवर्सिटी और अमेरिका के अनेक विश्वविद्यालय, जो ग्लोबल इकोनॉमी के लिए मानवीय कार्यशक्ति उत्पादित करते हैं, वहां पढ़ाए जाने वाले समाज विज्ञान के अनेक अनुशासनों में कार्ल मार्क्स अत्यंत महत्वपूर्ण ढंग से शामिल किए गए हैं। यह सब सोवियत रूस की क्रांति से उपजी वामपंथी क्रांतिकारी परंपरा से भिन्न है।

कार्ल मार्क्स का यह ‘नया अवतार’ आज भी न केवल वामपंथियों को वरन पूंजीवादियों को भी सावधान कर रहा है। पूंजीवाद की आर्थिक प्रगति अत्यंत गतिमान होती है, उसे रोकना असंभव होता है। इस प्रक्रिया में जो भी उसके सामने आता है, उसे वह नष्ट कर देती है। इस विनाश को कुछ लोग अनंत ‘रचनात्मक विनाश’ के रूप में देखते हैं। शायद आज का ग्लोबल पूंजीवाद भी अपने द्वारा किए जा रहे और किए जाने वाले अवश्यंभावी विनाश को कैसे रचनात्मक बनाए, इस दिशा में सोचने लगा है। दूसरी ओर, इस तरह का विकास जितना अमीरी लाता है, उससे बहुत ज्यादा गरीबी उत्पादित करता है। हम जब भी दुनिया को देखते हैं, तो इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी और अमेरिका ही हमें दिखाई पड़ते हैं, जबकि दुनिया के दो तिहाई से ज्यादा हिस्से यानी अफ्रीकी, लैटिन अमेरिकी देशों और अन्य भू-भागों में भयानक गरीबी फैली है।

वहां एक तरफ पूंजीवाद अपने पांव पसारना चाह रहा है, वहीं कार्ल मार्क्स वहां चल रहे छोटे-छोटे सामाजिक आंदोलनों में गरीबी से लड़ने और पूंजीवाद के प्रतिरोध के वामपंथी क्रांतिकारी प्रतीक के रूप में आज भी याद किए जा रहे हैं। उत्तर आधुनिक विमर्श ने अकादमिक जगत में मार्क्सवाद के लिए सबसे ज्यादा चुनौतियां खड़ी की थीं, लेकिन अब इस विमर्श के प्रमुख प्रवर्तक देरिदा भी गरीबी और अमीरी में विभाजित दुनिया में मार्क्स की प्रासंगिकता को स्वीकार करते हैं।

कार्ल मार्क्स को अगर बदलते समय में हमारे मानवीय ज्ञानकोश के एक फिक्सड डिपॉजिट के रूप में देखा जाए, तो उनके ज्ञान से छात्रों को वंचित करना ठीक नहीं माना जाना चाहिए और कार्ल मार्क्स का पुनर्पाठ किया ही जाना चाहिए। लेकिन क्या कार्ल मार्क्स के पुनर्पाठ में भविष्य का पुनर्पाठ खोजा जा सकता है?(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

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