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टीवी और ट्विटर

मुझे ऐसा क्यों लगता है कि टीवी ट्विटर हो गया है? जैसे आप ट्विटर में करते हैं, उसी तरह से टीवी में होने लगा है। ट्विटर में कोई वक्ता एक से अधिक पहचान के साथ आपको फॉलो करता है। टीवी में भी यही होता है। कई वक्ता हैं, जो एक से अनेक मुद्दों पर अलग-अलग पहचान के साथ बोलने आते हैं। एंकर भी अब ट्वीट की तरह बड़बड़ा रहा है। कुछ भी बोलता है। बोलकर छोड़ देता है। लोग आपस में भिड़ जाते हैं। ऐसा नहीं है कि टीवी पर बहस के कार्यक्रम नहीं थे। मगर वे बहस और चर्चा के कार्यक्रम थे। अब तो टीवी पर लगातार मुद्दे ट्विटर की तरह ट्रेंड कर रहे हैं। रिपोर्ट गायब है। स्पीड न्यूज एक किस्म का खुंदकिया खबर ट्वीट है। लो ये लो दनादन। एक पढ़ा नहीं, सुना नहीं कि दूसरा लोड होकर आ गया।

स्पीड न्यूज एक किस्म का ट्वीट है। खबर अफवाह की तरह लगती हैं इसमें। कौन बोला, किसने बोला और कैसे बोला, यह सब कुछ नहीं। कोई विवरण नहीं है। मुङो नहीं मालूम कि यह दर्शकों में क्यों लोकप्रिय है? यह भी नहीं मालूम कि दर्शकों ने इसे थोपे जाने पर पसंद किया या फिर उन्हें वाकई अब यह काम का लगता है। जिस दर्शक के पास आधे घंटे में पांच खबर के लिए वक्त नहीं था, वह अब उसी आधे घंटे में दो सौ खबरें सुन रहा है। इसलिए मुङो लगता है कि टीवी की प्रवृत्ति ट्विटर की तरह हो गई है। हम खबर दिखाते हैं, इस टाइप के स्लोगन जल्दी ही बदल जाएंगे। हम करते हैं बकर-बकर। आप सुनते हैं बकर-बकर।
कस्बा में रवीश

 

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