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नीलामी में गांधी

फिर महात्मा गांधी की कुछ चीजें एक अंग्रेज नीलामीघर की नीलामी में बिकी हैं। फिर भारत में वैसे ही विरोध के स्वर जाग उठे हैं, जैसे पिछले कई मौकों पर जाग उठे थे। नीलामी में गांधीजी का एक चश्मा, एक चरखा और उनकी हत्या के वक्त की खून सनी मिट्टी थी, इसके अलावा एक प्रार्थना की किताब और कुछ चिट्ठियां वगैरह थीं। जाहिर है, वह गांधीजी का एकमात्र चश्मा नहीं होगा, न ही एकमात्र चरखा होगा, जिस पर गांधीजी ने सूत काता होगा। अपने जीवन में गांधीजी ने कई चश्मे इस्तेमाल किए होंगे और चरखे को बेहतर बनाने के कई प्रयोग वह करते रहे, इसलिए चरखे भी उन्होंने कई इस्तेमाल किए होंगे। उनके खून से सनी मिट्टी को ऐतिहासिक धरोहर माना जा सकता है, लेकिन उस पर एक कीमती और दुर्लभ वस्तु की तरह बोली लगाने का विचार कुछ अजीब लगता है। दरअसल, भारत में ऐसी नीलामी के खिलाफ जो आवाज उठती है, उसके पीछे ऐसी चीजों के प्रति भारतीय और पश्चिमी धारणा का फर्क है। पश्चिम में पूंजीवाद काफी पुराना और खांटी है, वहां कोई व्यक्ति किसी प्राचीन चित्र को, किसी फिल्म स्टार द्वारा किसी फिल्म में पहनी हुई पोशाक को और गांधीजी की खून सनी मिट्टी को लगभग एक ही भावना के साथ सजाकर रख सकता है और उसका बाजार में मूल्य आंक सकता है। भारत में या पूर्वी सभ्यताओं में नीलामी का कुछ दूसरा अर्थ होता है और कुछ चीजें ऐसी नहीं मानी जातीं, जिन्हें खरीदा-बेचा जाए। चीजों के मूल्य की भी हमारे यहां कुछ दूसरी अवधारणा है और वह ऐतिहासिकता की हमारी अवधारणा से जुड़ी है। हमारे यहां कोई चीज सिर्फ पुरानी होने से ऐतिहासिक महत्व की नहीं हो जाती, इसीलिए संरक्षण को लेकर एक तरह की लापरवाही हमारे देश में दिखती है। अभी हम ऐतिहासिकता की अपनी और पश्चिमी अवधारणा के बीच झूल रहे हैं, इसलिए ऐसी बातों पर हमारे यहां बवाल मच जाता है।

महात्मा गांधी को लेकर हमारे देश में एक बड़ी समस्या यह भी है कि हमने उन्हें उसी तरह से राष्ट्रीय संवेदनशीलता का विषय बना दिया है, जैसे धार्मिक कट्टरपंथी हर धार्मिक मसले को संवेदना या भावना का मुद्दा बना देते हैं। गांधीजी के प्रति सम्मान जाहिर करने का ज्यादा कठिन रास्ता यह है कि उनके आदर्शो और मूल्यों को ग्रहण किया जाए। आसान रास्ता यह है कि स्थूल प्रतीकों को लेकर उन्हें सम्मान या संवेदना का विषय बना दिया जाए। गांधीजी के विचारों को अपनाने की बजाय उनके चश्मे को लेकर हाय-तौबा मचाना आसान है, इसलिए हम कभी उनके सामान की नीलामी को लेकर विरोध प्रदर्शन करते हैं, तो कभी किसी किताब को लेकर शोर मचाते हैं। जैसा कि मराठी लेखक पु ल देशपांडे ने लिखा था कि महात्मा गांधी के रास्ते पर चलना मुश्किल है, इसलिए हम जिस रास्ते पर चलते हैं, उसका नाम महात्मा गांधी मार्ग रख देते हैं। चूंकि एक संस्कृति में ऐतिहासिक वस्तुओं की नीलामी एक स्वाभाविक घटना है, इसलिए हमें हर उस मौके पर शोर मचाने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। अपनी समूची जिंदगी में गांधीजी हजारों जगहों पर गए होंगे, सैकड़ों इमारतों में रहे होंगे और हजारों चीजें उन्होंने इस्तेमाल की होंगी। हम उन तमाम चीजों को अगर सहेजने के पीछे पड़ गए, तो गांधीजी खुद एक ऐतिहासिक स्मारक बन जाएंगे, जिसका खतरा आज भी दिख रहा है। गांधीजी की प्रासंगिकता काफी हद तक इतनी ही बची है कि हर भाषण में रस्मी तौर पर उन्हें याद किया जाए और हर कार्यक्रम में पहले उन्हें फूलमाला पहना दी जाए। गांधीजी की असली धरोहर उनका कर्म और उनके विचार हैं, उन्हें प्रासंगिक बनाए रखना उनके प्रति असली सम्मान है।

 

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