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बीबी के हौसले को सलाम

शेरवां (मिर्जापुर)। अति पिछड़े जमालपुर ब्लाक के सिकंदरपुर गांव की बीबी की कहानी बेहद मार्मिक है। सबकुछ जानने-सुनने के बाद उनके जज्बे को सलाम करने के लिए हाथ खुद-ब-खुद उठ जाते हैं। मां टीबी की रोगी, पिता हृदयरोग से पीडिम्त और बूढ़ी दादी चलने-फिरने में असमर्थ। इसके बाद भी 15 साल की किशोरी का सेवाभाव काबिलेतारीफ है। वह राज ट्रॉली खींचकर अपने मां-बाप, दादी और छोटे भाई-बहनों का भरण-पोषण करती है। वह खुद पर गर्व करती है। वह कहती है-‘मुफलिसी के दौर में वह परिवार की बड़ी बेटी नहीं बेटा है, इसलिए जिम्मेदारियों का निर्वहन कर रही है।’ हृदयरोगी प्रकाश कुमार अपनी बेटी बीबी के सेवाभाव की प्रशंसा करते हुए रोने लगते हैं। वह कहते हैं कि उन्हें बीबी के रूप में बेटी नहीं बेटा मिला है। जिस दिलेरी से उसने आगे बढ़कर परिवार के भरण-पोषण की बागडोर संभाली है वह शायद बेटा भी नहीं कर पाता। उन्हें अपनी बेटी पर फर्क है।मां प्रेमा देवी बिटिया की हाड़-तोड़ मेहनत पर तरस खाती हैं। कहती हैं कि उससे बेटी का हाल देखा नहीं जाता लेकिन वह परिस्थितियों के आगे विवश है। बुलंद हौसलों वाली बीबी ने कहा कि प्रकृति से जो उपहार मिला है उससे संतुष्ट है। भूमिहीन व गरीब परिवार में उसका जन्म शायद इसी परीक्षा के लिए हुआ है। उसका कहना है कि यह वक्त घबड़ाने का नहीं बल्कि मुकाबले का है। बीबी ने कहा कि चार महीने पहले जब उसने ट्रॉली चलाना शुरू किया तो लोगों ने आश्चर्य किया। अब लोग उसका सहयोग करते हैं। वह शादी-विवाह के सामान और सब्जी की ढुलाई करती है। इससे होने वाली कमाई से वह परिवार की गाड़ी बढ़ाती है। उसने कहा कि समस्याओं ने उसे आठवीं के बाद पढ़ने नहीं दिया। वह अपना अरमान छोटी बहन सविता (12), मनीषा (10) और भाई कुंदन (3) को पढ़ाकर पूरा करेगी। इनसेट : सरकार से कोई सहायतासिकंदरपुर गांव की बीबी के तंगहाली के बाद भी सरकारी सुविधा के नाम पर कुछ भी नहीं मिला है। उसके पास न तो लाल कार्ड है, न ही जॉब कार्ड। प्रधान शांति देवी ने इस वर्ष कार्ड दिलाने का भरोसा दिलाया है।

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