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भारत में बढ़ रहे हैं हीमोफीलिया के मामले

हीमोफीलिया सबसे पुराना जेनेटिक रक्तस्राव रोग है, जो खून के थक्के बनने की प्रक्रिया को धीमा करता है। चोट लगने के बाद हीमोफीलिया के रोगियों को अन्य मरीजों की तुलना में अधिक समय तक रक्तस्राव होता रहता है। खासतौर पर घुटनों, टखनों और कोहनियों के अंदर होने वाला रक्तस्त्राव अंगों और ऊत्तकों को भारी नुकसान पहुंचाता है। कभी खतरनाक माने जाने वाले इस रोग से पीड़ित रोगी आज लगभग सामान्य उम्र तक जी सकते हैं। हालांकि अभी पूरी तरह से इसका उपचार संभव नहीं हुआ है, लेकिन आधुनिक चिकित्सा हीमोफीलिया के प्रभावी उपचार में काफी प्रभावी साबित हुई है। इस दिशा में लगातार काम हो रहा है।

हीमोफीलिया के प्रकार
हीमोफीलिया को हीमोफीलिया ए व हीमोफीलिया बी दो वर्गों में वर्गीकृत किया गया है। हीमोफीलिया ए में फैक्टर-8 की मात्रा बहुत कम या शून्य होती है। दूसरी ओर, फैक्टर-9 के शून्य या बहुत कम होने से हीमोफीलिया बी होता है। लगभग 80 प्रतिशत हीमोफीलिया रोगी, हीमोफीलिया ए से पीड़ित होते हैं। हल्के हीमोफीलिया के मामले में पीड़ित को कभी-कभी रक्तस्राव होता है, जबकि गंभीर स्थिति में अचानक व लगातार रक्तस्त्राव हो सकता है।

क्या कहते हैं आंकड़े
विश्वभर में हीमोफीलिया ए का अनुपात 1/10,000 है। अकेले भारत की बात करें तो भारत में कम से कम 1,00,000 हीमोफीलिया ए रोगी हैं और कम से कम 50,000 लोग गंभीर हीमोफीलिया से पीड़ित हैं। इनमें से अनुमानित पहचाने गए रोगियों की संख्या 15 प्रतिशत से कम है। हीमोफीलिया फेडरेशन ऑफ इंडिया के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार हीमो-फीलिया का उपचार करा रहे रोगियों की संख्या 12,500 है। यह एक कटु सत्य है कि विकसित और विकासशील देशों के बीच हीमोफीलिया के उपचार के मामले में विशाल अंतर है।

भारत में केवल 12 प्रतिशत हीमोफीलिया पीड़ितों की ही पहचान हुई है। 55 उपचार केन्द्र हैं और प्रति व्यक्ति खपत 0. 03 यूनिट फैक्टर्स है। परिणामस्वरूप भारत में 50 प्रतिशत से अधिक रोगी गंभीर रूप से अशक्त हैं। गंभीर रूप से पीड़ित हीमोफीलिया रोगियों की औसत उम्र 20-30 वर्ष है।

जागरूकता का है अभाव
हीमोफीलिया के बारे में जागरूकता अत्यंत कम है। अस्पताल के आंकड़ों से पता चलता है कि भारत में रोगी उन मौतों के शिकार हो जाते हैं, जिन्हें रोका जा सकता है। परेशानी यह भी है कि चिकित्सकों को हीमोफीलिया के निदान या उपचार के लिए पर्याप्त संसाधन और इंफ्रास्ट्रक्चर उपलब्ध नहीं हो पाता। इस वजह से अधिकांश मामले बिना पहचाने रह जाते हैं। कई राज्य सरकारें जैसे तमिलनाडु, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, बिहार, असम पहले से ही हीमोफीलिया के उपचार में योगदान दे रहे हैं, लेकिन यहां भी हीमोफीलिया का प्रबंधन रिप्लेसमेंट थैरेपी से किया जाता है।

इस सम्बंध में दिल्ली सरकार ने हीमोफीलिया की पूर्ण देखभाल के लिए सर्वोत्तम केन्द्रों में से एक का निर्माण किया है। वर्ष 2008 में मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज व लोक नायक अस्पताल में हीमोफीलिया डे केयर सेंटर की स्थापना की गई। लंबे समय तक इस बीमारी का रहना व्यक्ति में अवसाद की समस्या पैदा कर देता है। इसी कारण हीमोफीलिया में मात्र दवा से उपचार करना संभव नहीं है। रक्तस्त्राव समस्याओं के सभी चिकित्सकीय व मनोवैज्ञानिक पहलुओं का उपचार करना जरूरी होता है।

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