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विकास बढ़ाने के लिए उठा कदम

यह होना ही था। भारतीय रिजर्व बैंक ने जिस तरह से ब्याज दरों को आधा फीसदी घटाया, उसकी हम लोग उम्मीद कर रहे थे। ब्याज दरें ज्यादा होने का असर विकास दर पर पड़ रहा था, इससे मंदी का खतरा दिखने लगा था। यह इस काम को करने का सही मौका भी था, क्योंकि मुद्रास्फीति यानी महंगाई थोड़ी कम भी हुई है।

पिछले काफी समय से रिजर्व बैंक का सारा जोर महंगाई कम करने पर था, इसलिए काफी समय तक ब्याज दरों को बढ़ाया गया। महंगाई काफी बढ़ भी गई थी। मुद्रास्फीति की दर नौ फीसदी से ऊपर चली गई थी, जो आम आदमी को परेशान करने लगी थी। इसे कम किए जाने पर जोर दिया जाना जरूरी था। अर्थव्यवस्था में दो तरह के ‘फेज’ होते हैं। एक वह होता है, जब लोग चाहते हैं कि महंगाई को किसी तरह से कम किया जाए। दूसरा वह होता है, जब लोग चाहते हैं कि रोजगार के ज्यादा अवसर पैदा किए जाएं। इस समय दूसरा वाला दौर है। ब्याज दरें ज्यादा होने की वजह से निवेश ज्यादा हो नहीं रहा। नए उद्योग नहीं लग रहे, इसलिए रोजगार के ज्यादा अवसर नहीं पैदा हो रहे। यह मौका भी ठीक था, क्योंकि अब महंगाई कोई बहुत बड़ा मुद्दा नहीं है। अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब वगैरह में चुनाव हुए। इन चुनावों में कई तरह के मुद्दे थे, लेकिन यह कहीं नहीं लगा कि महंगाई उन चुनावों में एक मुद्दा थी। इसलिए इस मौके पर ध्यान महंगाई से हटाकर विकास पर दिया जा सकता था। यह खतरा नहीं है कि रिजर्व बैंक के इस कदम से महंगाई बढ़ेगी। जहां तक खाद्य मुद्रास्फीति का मामला है, तो रिजर्व बैंक इसमें ज्यादा कुछ नहीं कर सकता। पेट्रोलियम पदार्थो के रेट घटते-बढ़ते हैं, तो इसमें रिजर्व बैंक की नीति की ज्यादा भूमिका नहीं होती। इसके अलावा महंगाई बढ़ने का खतरा फिलहाल नहीं है। अगर महंगाई बढ़ रही है और इसके साथ ही आपकी आमदनी भी बढ़ रही है, तो महंगाई आपको उतना परेशान नहीं करती। लेकिन जब बाजार की कीमतों और आमदनी का संतुलन गड़बड़ाता है, तो वह ज्यादा परेशान करता है।

पिछले वित्त वर्ष में रिजर्व बैंक ने 6.9 फीसदी विकास दर का लक्ष्य रखा था, वर्तमान वित्त वर्ष के लिए 7.3 फीसदी का लक्ष्य रखा गया है। हालांकि इस विकास दर को हासिल करना भी आसान नहीं होगा। यह काम बाजार में निवेश बढ़ाकर ही किया जा सकता है। यह तभी हो सकता है, जब औद्योगिक उत्पादन में लगातार आ रही गिरावट किसी तरह रुके। ब्याज दरें नए निवेश को बढ़ाने का सबसे बड़ा उत्प्रेरक हो सकती हैं।

ब्याज दरें ज्यादा होने से डिफॉल्ट का खतरा भी बढ़ जाता है। खासतौर पर प्रॉपर्टी के बाजार में। आमतौर पर जब ब्याज दरें बढ़ती हैं, तो होम लोन लेने वाले पर सीधा भार नहीं डाला जाता। होता यह है कि उनका पेआउट पीरियड बढ़ा दिया जाता है। यानी जो कर्ज आपको 15 साल में निपटाना था, हो सकता है कि अब आपको वह 25 साल में निपटाना पड़े। कई बार यह पेआउट पीरियड इतना आगे चला जाता है कि व्यक्ति की सक्रिय तौर पर कमाने की उम्र ही खत्म हो जाती है, लेकिन उस पर लदे कर्ज की किस्तें खत्म नहीं होतीं। यही वह जगह है, जहां डिफॉल्ट का खतरा सबसे ज्यादा होता है। इस लिहाज से देखें, तो ब्याज दरों का घटना होम लोन बाजार में और प्रॉपर्टी बाजार में असंतुलन को दूर करेगा।

इस बार की नीति में रिजर्व बैंक ने आवश्यक नगदी अनुपात यानी कैश रिजर्व रेशो या सीआरआर में कोई बदलाव नहीं किया है। हालांकि बीते दिनों में कई बार उसने सीआरआर में कटौती की थी। सीआरआर में कटौती से होता यह है कि बैंकों के पास कर्ज देने लायक धन और ज्यादा उपलब्ध हो जाता है। यानी इसका सीधा असर मुद्रा आपूर्ति यानी बाजार की लिक्विडिटी पर पड़ता है। पिछली बार सीआरआर घटाने का असर निवेश पर ज्यादा नहीं पड़ा था। क्योंकि समस्या सिर्फ यह नहीं थी कि बाजार में कर्ज देने के लिए धन उपलब्ध नहीं था, बल्कि वह यह थी कि ब्याज दर ज्यादा होने की वजह से नए निवेश के लिए कर्ज लिया नहीं जा रहा था। ऐसे में, ब्याज दर में कटौती ही ज्यादा कारगर तरीका होता है। इसलिए इस बार रिजर्व बैंक ने इसी रास्ते को अपनाया।

हालांकि रिजर्व बैंक की नीति तब तक बहुत ज्यादा कारगर नहीं होती, जब तक उसे सरकार की वित्तीय नीति से बहुत समर्थन नहीं मिले। हम देख रहे हैं कि सरकार का वित्तीय घाटा परेशान करने वाले स्तर पर पहुंचता दिख रहा है। जब भी चुनाव नजदीक आते हैं, तो घाटा बढ़ने का यह खतरा और बढ़ जाता है। इसलिए सबसे आवश्यक यह है कि सरकार गैरजरूरी खर्चों पर पैसा जाया करना कम करे। अगर खर्च हो रहा है और उसके मुकाबले संपत्ति का निर्माण नहीं हो रहा, तो इस तरह का खर्च सबसे ज्यादा महंगाई बढ़ाता है। ऐसी बहुत सारी नीतियां हैं, जो बाजार में कीमतें बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाती हैं। महंगाई हो या निवेश, अर्थव्यवस्था से जुड़े मसलों को निपटाने का काम अंतत: रिजर्व बैंक से कहीं ज्यादा सरकार को ही करना होगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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