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बदलते माहौल में हिंसक होती युवा पीढ़ी

फिरौती के लिए अपने ही दोस्त को अगवा करके उसकी हत्या कर देना या विदेश जाने की ख्वाहिश पूरी करने के लिए इंजीनियरिंग के छात्रों द्वारा मासूम बच्ची का अपहरण कर लेना, ऐसी घटनाएं समाज के लिए खतरे की सूचक होनी चाहिए। पढ़ने में तेज, शानदार कॅरियर के मुहाने पर खड़े और दिखने में सभ्य-सुशील युवकों का यह एक नया चेहरा है, जो महानगरों, छोटे शहरों यहां तक कि कस्बों व गांवों में बेखौफ अपराध को अंजाम दे रहा है। ये युवा आक्रामक हैं, सब कुछ तुरंत पा लेने की लालसा में लिप्त हैं, फिर चाहे वह संपत्ति हो या एकतरफा प्रेम। चाही गई वस्तु न मिलने की स्थिति में हिंसक हो जाने से भी ये परहेज नहीं करते। हैरानी वाली बात तो यह है कि ये युवा अपराधी न तो आर्थिक दृष्टि से बेहाल हैं और न ही मानसिक बीमारी के शिकार, फिर भी ये पेशेवर अपराधियों की अपेक्षा कहीं ज्यादा खतरनाक हैं, क्योंकि इन पर न तो कानून और व्यवस्था की जिम्मेदारी संभालने वालों का ध्यान जाता है और न ही समाज का।

ऐसा संभव नहीं है कि कोई युवा एकाएक आक्रामक बन जाए। किसी व्यक्ति का व्यक्तित्व सकारात्मक या नकारात्मक एक लंबी प्रक्रिया का परिणाम होता है और इसके बीज बचपन में ही पड़ते हैं। दौड़ती-भागती जिंदगी व अकूत धन की इच्छा में अभिभावक दिन-रात की सीमाओं से परे काम में जुटे हुए हैं और उनके बच्चे इस कारण एक घर पर अकेले होते हैं और इस दौरान अगर कोई संगी-साथी बनता है, तो प्ले स्टेशन और कंप्यूटर गेम्स। वैज्ञानिक मार्शल मेकलुहान ने अपने शोध से यह सिद्ध कर दिया है कि दृश्य-श्रव्य माध्यम दिमाग को आंतक फैलाने के लिए उकसाते हैं। इन खेलों का हिंसात्मक द्वंद्व बच्चों के मन में खीझ, गुस्सा भरता है और फिर युवा होते बच्चे अपनी संवेदना खोने लगते हैं। यह संवेदनहीनता मन की कोमल भावनाओं व सकारात्मक ज्ञान को कुंद कर देती है।
आंकड़े बताते हैं कि कई युवा अपने अभिभावकों के अंध-प्रेम के चलते बेफ्रिकी से अपराधों को अंजाम देते हैं, वे जानते हैं कि कानून की संकरी गलियों से निकलने के लिए बहुत सारे रास्ते हैं। इन सबसे इतर इन युवाओं को संवेदनहीन बनाने में शिक्षा पद्धति भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रही है। बीते दशकों में शैक्षिक परिसरों में ‘नैतिक मूल्यों’ की आधार-भूमि को उखाड़ दिया गया है और हर दर्जे की व्यावहारिकता का पाठ पढ़ाया जा रहा है, जिसके चलते ऐसी पीढ़ी तैयार हो रही है, जिसके लिए ‘स्वयं’ से बढ़कर कुछ भी नहीं है। बच्चों में पनपते आक्रामक भावनाओं व व्यवहारों को आरंभ से ही रोके जाने पर समाज में, फैलता अपराधों का यह सिलसिला थम सकता है, परंतु यह तभी संभव है, जब जीवन की आरंभिक अवस्था से ही बच्चों के साथ सकारात्मक और मृदु व्यवहार किया जाए।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं) 

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