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ओह! हताशा

हताशा कहती है, मैं क्यों न तुम्हारे दरवाजे पर दस्तक दूं। आखिर तुम जिस उल्लास, जिस सफलता के रंग से सराबोर होना चाहते हो, उसका वजूद मेरे बगैर कहां है। वह कहती है, मैं तो अपना काम करती हूं, तुममें हिम्मत हो, तो मुझे परास्त करो। सच्ची बात यह है कि हताशा का हिसाब-किताब दुरुस्त है। सिल्वर स्टेलेन की एक फिल्म रॉकी बालबोआ का एक पात्र कहता है कि जीवन में यह मायने नहीं रखता कि तुमने कितने वार किए, बल्कि यह अर्थ रखता है कि तुमने कितना सहा। उन वार को सहते हुए, लड़खड़ाते हुए किस तरह उठे। हताशा खुद में निहित एक बाधा है, जो आपकी पहचान का पैमाना तय करती है। एक रूसी कहावत है- हथौड़े की चोट शीशे को तोड़ देती है, लेकिन लोहे को फौलाद बनाती है। सवाल यह है कि आप हताशा के चक्रव्यूह में उलझ शीशे में बदलते हैं या चोट खाकर लोहे में ढल जाते हैं। अमेरिकी मनोवैज्ञानिक ब्रायन बोनर ने एक शोध में पाया कि हताश होते ही अपने बारे में आपकी धारणा बिल्कुल गलत हो जाती है। आप अपनी शक्ति करीब-करीब भूल जाते हैं। ऐसे में, खुद पर विश्वास बनाए रखने की जरूरत है। हताशा अक्सर यह सोच अपने साथ लेकर आती है कि जिदंगी ने उनके साथ नाइंसाफी की है। हताश लोग अपनी अड़चनों की फितरत समझ नहीं पाते। दरअसल, हताशा हर सफल इंसान को समान रूप से परेशान करती है। अब परेशानी के सामने घुटना टेक दिया जाता, तो पोलियोग्रस्त विल्मा रुडोल्फ जिंदगी भर अपनी किस्मत को कोसती रह जातीं। लेकिन उन्होंने अपनी इच्छाशक्ति से अपने पैरों में जान डाल दी और फिर ओलंपिक में तीन-तीन गोल्ड मेडल झटके। विल्मा ने अपनी जीत का श्रेय अपने पोलियोग्रस्त पैरों को दिया। उन्होंने अपनी हताशा के बारे में एक खूबसूरत बात कही, ‘वह अक्सर आती, कुछ पल रहती और मैं उसे विदा कर देती।’ वह विल्मा थी कि जिसने हमेशा हताशा से गिफ्ट झटक दिए।

 

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