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तिग्मांशु की सफलता

कई दिनों से सोच रहा था कि कुछ लिखूं। लेकिन, मन-मस्तिष्क में कोई विचार नहीं आ रहा था। आजकल जो राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियां चल रही हैं, उन्हें समाचार में देखकर कोफ्त होती है। कोई प्रतिक्रिया ही जन्म नहीं लेती। सस्ती भाषा में कहूं, तो न्यूज चैनलों पर इस तरह की खबरें देखकर मैं ‘चट’ गया हूं। इधरपान सिंह तोमर के जरिये तिग्मांशु धूलिया की सफलता से मुझे अति प्रसन्नता हुई। उनकी साहब, बीवी और गैंगस्टर और पान सिंह तोमर के बॉक्स ऑफिस पर ठीक-ठाक चलने से उनके जैसे निर्देशकों को एक जगह मिलती दिख रही है, जो सुखद है। मेरा और उनका साथ लंबा रहा है। मैंने उनके निर्देशन में एक सीरियल भी किया है, यह किसी चैनल पर कभी आया ही नहीं। बहरहाल, तिग्मांशु जैसे निर्देशक जब आते हैं, तो अपने तौर पर कुछ न कुछ बदलते ही हैं। यह माध्यम ही निर्देशकों का है। शायद इसीलिए मैं सिनेमा को लेकर इतना जुनूनी नहीं हूं, जितना अभिनय को लेकर हूं। मुझे लगता है कि इस माध्यम में अभिनेता का बस नहीं चलता। हम पूरी तरह से एक निर्देशक की बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता पर निर्भर करते हैं। और शायद मैं इसलिए इस माध्यम से जुड़ा कि दस साल के रंगमंच के बाद यह अहसास हुआ कि जो भी काम करूं, उसका मुझे पैसा मिले। थोड़ा-बहुत जो भी मिलता है, उससे मैं खुश हूं। लेकिन सिनेमा ऐसा ही फलता-फूलता रहे। अच्छे निर्देशक आते रहें और अच्छी फिल्में बनती रहें, क्योंकि इसी से सभी का भला होगा। 
अपने ब्लॉग में मनोज बाजपेयी

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