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ब्याज दरों में राहत

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने ब्याज दरों में 0.5 प्रतिशत की कमी करके जानकारों को आश्चर्य का झटका दिया है। कल तक तमाम विशेषज्ञ और उद्योग-व्यापार के प्रतिनिधियों के बीच बहस का मुद्दा यह था कि क्या रिजर्व बैंक ब्याज दरें उतनी ही रखेगा या उनमें 0.25 प्रतिशत की कमी कर सकता है। ये लोग मान रहे थे कि रिजर्व बैंक की नजर में महंगाई अब भी बड़ा खतरा है, इसलिए जून तक रिजर्व बैंक ब्याज दरों में या तो कमी नहीं करेगा या फिर 0.25 प्रतिशत की कमी करेगा। रिजर्व बैंक की अपनी आर्थिक समीक्षा भी यह कह रही थी कि महंगाई के बढ़ने का खतरा बना हुआ है, इसलिए बैंक की नीति ऐसी होनी चाहिए, ताकि महंगाई नियंत्रण में रहे और विकास दर को इस नीति से समन्वित किया जाए। लेकिन लगता यह है कि रिजर्व बैंक ने अपने सतर्क रवैये के विपरीत जाकर ब्याज दरों में अपेक्षाकृत बड़ी कटौती करने का फैसला किया है। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। एक कारण तो यह है कि महंगाई के बढ़ने की रफ्तार कम हुई है। महंगाई फिलहाल सात प्रतिशत से कुछ नीचे है, लेकिन यह भी साफ है कि आने वाले दिनों में इससे कम होना बहुत मुश्किल है, बल्कि हो सकता है कि इससे ज्यादा ही महंगाई हो। अंतरराष्ट्रीय बाजारों में तेल के दाम कम होने के कोई आसार नहीं हैं, ईरान के मामले में अमेरिकी नीति बदलने से रही, क्योंकि फिलहाल अमेरिकी नेता राष्ट्रपति चुनावों की भागदौड़ में लगे हैं।

पश्चिम एशिया की हालत में जब तक कोई बड़ा बदलाव नहीं आता, तब तक तेल के व्यापारी मुनाफा बढ़ाते रहेंगे। खाने-पीने की चीजों की कीमतों में भी कमी आने के कोई आसार नहीं नजर आते, उम्मीद सिर्फ यही की जा सकती है कि महंगाई ज्यादा न बढ़े। इस सूरते हाल के मद्देनजर रिजर्व बैंक के कर्ताधर्ताओं ने शायद यही सोचा कि ब्याज दरें घटाने का यही मौका है, इसके बाद बहुत जल्दी ऐसा मौका नहीं मिलेगा। अगर महंगाई सात प्रतिशत से जरा भी ऊपर जाती है, तो रिजर्व बैंक के लिए ब्याज दरें घटाना नामुमकिन हो जाएगा। इसलिए रिजर्व बैंक ने ब्याज दरें घटाकर विकास को तेज करने का संकेत दिया, क्योंकि महंगाई पर उसका जितना नियंत्रण मुमकिन था, उतना हो चुका है। ब्याज दरें कम करने से औद्योगिक उत्पादन की रफ्तार तेज होने की उम्मीद है, विनिर्माण और वाहन उद्योग को इससे निश्चित रूप से काफी फायदा होगा। अगर सरकार विकास दर बढ़ाने के लिए कुछ जरूरी कदम उठाती है, तो विकास दर को बढ़ाने  के लिए लिया गया यह जोखिम सफल हो सकता है।

यूं भी सरकार के लिए अब उम्मीद विकास दर से ही हो सकती है। इस बजट ने साफ कर दिया है कि सरकार बजट घाटा कम करने के लिए कड़े कदम उठाने की स्थिति में नहीं है। जो भी जन-कल्याणकारी या लोक-लुभावन योजनाएं हैं, उनके मद में कटौती नामुमकिन है। ज्यादा से ज्यादा यह हो सकता है कि भ्रष्टाचार और कुप्रबंध में कमी करके यह सुनिश्चित किया जाए कि सचमुच ज्यादा से ज्यादा गरीबों तक फायदा पहुंचे। अगर सरकार अपने सहयोगियों और विपक्षियों को वस्तु तथा सेवा कर (जीएसटी) जैसे एक-दो मुद्दों पर सहमत कर सकी, तो निवेश का माहौल सुधरेगा और विकास की दर ऊंची हो सकती है। फिर भी यह देखने की बात होगी कि जो लोग ब्याज की दरें घटने पर खुशियां मना रहे हैं, उनके लिए महंगाई और बड़ा झटका तो नहीं देगी। न तो सरकार के लिए और न ही रिजर्व बैंक के लिए मौजूदा माहौल में फैसले करना आसान है। हम उम्मीद यही कर सकते हैं कि भारत की विकास की गाड़ी जोर पकड़ेगी और महंगाई की मार उतनी तेज नहीं होगी।

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