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तालिबान को कम न आंकिए

काबुल की गलियों में खामोशी लौट आई है। इससे पहले अठारह घंटों तक तालिबान लड़ाकों और अफगान सुरक्षा बलों के बीच खूनी मुकाबला हुआ। बंदूकें गोलियां बरसा रही थीं, रॉकेट गोले उगल रहे थे और फिदायीन अपने साथ-साथ अपने विरोधियों को तबाह कर रहे थे। दहशतगर्दो के निशाने पर सरकारी एजेंसियां, इदारे और सहूलियतें थीं। अफगानी पार्लियामेंट पर हमला बोला गया। डिप्लोमेटिक एरिया में ब्रिटिश और जर्मन दूतावासों को निशाना बनाया गया। सुपरमार्केट और होटल पर हमले किए गए। इसमें कोई दो राय नहीं कि हमला पूरी तैयारी के साथ किया गया था। फौज की जवाबी कार्रवाई के बावजूद तालिबान लड़ाके अपने मनसूबे में काफी हद तक कामयाब रहे। इससे यह भी पता चलता है कि तालिबान रसद और हथियार पर काफी खर्च कर रहा है। वे गुरिल्ला लड़ाई में माहिर तो हैं ही, उनमें गजब का तालमेल है। वे मुश्किल हालात में भी अपनी साजिशों को अंजाम देते हैं। ऐसे में, अगर कोई यह सोचता है कि तालिबान मिट रहा है या उसके लड़ाके अब नाउम्मीद हो रहे हैं, तो उन्हें दोबारा गौर करने की जरूरत है। साल 2001 के बाद से ही तालिबान को अफगानिस्तान से मिटाने की हरसंभव कोशिश हुई है। इस लिहाज से यह हमला काफी बड़ा और खतरनाक था। हालांकि, उसके 19 फिदायीन मारे गए हैं और दो पकड़े गए। दूसरी तरफ, अफगानिस्तान में अमेरिकी राजदूत को शक है कि हक्कानी नेटवर्क ने इसे अंजाम दिया है। उनके मुताबिक, अब तालिबान में इतनी कुव्वत नहीं बची है कि वह ऐसे खौफनाक हमले को अंजाम दे सके। साफ है, पाकिस्तान की तरफ अंगुलियां उठने लगी हैं। इसे ‘हक्कानियों का पनाहगाह’ बताया ही जाता है। वैसे तालिबान जानता है कि अफगान की साझा फौज के लिए इससे बुरा वक्त नहीं आ सकता है। दरअसल, नाटो की बैठक से एक महीने पहले इस हमले को अंजाम दिया गया है। इसी बैठक में अंतरराष्ट्रीय फौजों की वापसी का मसौदा तैयार होना है। इधर ठीक हमले के दिन पाकिस्तान के बन्नू जेल पर तालिबान ने धावा बोलकर 384 कैदियों को छुड़ा लिया है।
द न्यूज, पाकिस्तान

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