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पांच सौ महिलाएं दे रही हैं पर्यावरण संरक्षण का संदेश

‘पेड़ जितने हरे थे, तिरस्कृत हुए, ठूंठ जितने खड़े थे, पुरस्कृत हुए‘, इस कथन को सत्य किया है गुमला जिले के भरनो प्रखंड की आदिवासी महिलाओं ने। आर्थिक आजादी की संवाहक बननेवाली इन महिलाओं ने पर्यावरण संरक्षण की दिशा में अनोखा अभियान शुरू किया है।

भरनो कुशवाहा, कुम्हरो, परसा, दुड़िया, डुम्बा, मारासिल्ली, पोखरटोली, पतरामर्चा, सत्तीटोली और लेकोटोली समेत 20 गांव की पांच सौ महिलाओं ने खाना पकाने के लिए कोयला, लकड़ी या रसोई गैस का उपयोग बंद कर दिया है। इन घरों में जंगल में पड़े सूखे पत्ते जलाकर खाना पकाया जाता है।

महिलाओं के इस अभियान के कई लाभ हुए हैं। पहला लाभ तो यह हुआ कि जलावन के लिए पेड़ अब नहीं कटते। दूसरे जंगल में पड़े सूखे पत्तों में आग लगने का खतरा कम हो गया है, क्योंकि महिलाएं पत्ते बटोर लेती हैं। तीसरा लाभ उन पत्तों को जलाने से जो राख मिलती है, उसका उपयोग खाद के रूप में होता है और चौथा लाभ यह हुआ है कि इन गावों की बेसहारा महिलाओं को आय का एक साधन मिल गया है।

इस अभियान की शुरुआत कुम्हरो गांव की फूलो देवी ने की। गरीबी के कारण उन्होंने एक दिन ऐसा करने का फैसला किया। अगली सुबह वह जंगल में गईं, झाड़ से पत्ते एकत्र किए और शाम को पत्तों को बेच कर दाल-रोटी का जुगाड़ कर लिया। फिर उन्होंने अपने गांव की महिलाओं को इस बारे में बताया।

इसके बाद इस अभियान ने जोर पकड़ा। अब मारासिल्ली की सुधा और परसा की सनियो देवी कहती हैं : गुमला लोहरदग्गा, सिमडेगा के जंगलों में सूखे पत्तों की भरमार है। इसके उपयोग से महंगाई से छूटकारा पाने का रास्ता तो निकलेगा ही, आर्थिक आजादी भी मिलेगी।

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