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विनाश नहीं विकास के बीज बो रहे ‘गुरिल्ला-सेना’ के ये-बम

‘आओ चलें, कुछ बम फेंके।’ एक युवा महिला अपने साथियों से कहती है। उसके कंधे पर एक वॉटरप्रूफ बैग झूल रहा है, जिस पर फूल बने हुए हैं। यह सुन उसके 25 साथी खुश हो जाते हैं।

वे सभी पास में एक नीरस गार्डन की ओर भागते हैं। लेकिन ये कोई आतंकी नहीं बल्कि इन ‘बीज बमों’ से बंजर पड़ी जमीन में विकास की गंगा बहा रहे हैं। इन लोगों ने ‘बीज बम’ बनाने का तरीका वाशिंगटन के गुरिल्ला गार्डनरों की नि:शुल्क कार्यशाला में सीखा। यह भद्र बमबारी उस बड़ी परिघटना का हिस्सा है, जिसे एक्टिविस्ट गार्डनिंग या गुरिल्ला गार्डनिंग (छापामार बागवानी) के नाम से जाना जाता है। पोर्टलैंड, डेटरॉयट, बाल्टीमोर समेत कई शहरों में इसका प्रचार हो चुका है, जहां युवा अपने खाली समय को सामाजिक बदलाव के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं।

गुरिल्ला गार्डनिंग के तहत फल-सब्जियों और सूरजमुखी के बीज खाली जमीन पर छींटे जाते हैं। इसका मकसद शहरी पर्यावरण को सुंदर बनाना और लोगों तक स्वस्थ खाद्य सामग्री की पहुंच सुनिश्चित करना है। आंदोलन से जुड़े 25 वर्षीय एम्मी ग्रान का कहना है, ‘गुरिल्ला गार्डनिंग अच्छी है, मगर काफी विवादास्पद भी। यदि आप कोई खाली या उपेक्षित जमीन देखते हैं और तय करते हैं कि उसमें कुछ सब्जियां या जड़ी-बूटी उगाएंगे तो सवाल उठता है कि क्या आप कब्जा जमाने वाले हैं?’ गुरिल्ला गार्डनिंग के कार्यकर्ता अपने आंदोलन के पक्ष में दीवारों पर नारे भी लिखते हैं।

इसके सदस्यों में 20-25 साल के युवाओं की तादाद ज्यादा है। बेशक व्यवस्था के संदर्भ में गुरिल्ला गार्डनिंग कई बार कानून के उल्लंघन का मामला बनता है, पर इसमें शामिल लोगों का मानना है कि वे कुछ भी गलत नहीं कर रहे।

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