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लोकतंत्र के रक्षक

पढ़े-लिखे और दफ्तरों में काम करने वाले लोगों से बात कीजिए। वे नेताओं पर बरसते मिलेंगे। कोई मसला हो, लोग उनकी ओर उंगली उठाने में देर नहीं करते। लेकिन वोट देने वक्त, पता नहीं क्यों, गायब रहते हैं। इस मामले में उन्हें सलाम करने का मन करता है जो कम पढ़े-लिखे या निरक्षर हैं, रोजाना की मजदूरी न करें तो खाने के लाले पड़ जाएं, जिनका रहन-सहन और खाना-पीना मोटा कहा जाता है। दिल्ली नगर निगमों के चुनावों में वोटिंग के आंकड़े देखकर भी यही लगता है कि ऐसे लोग न हों तो लोकतंत्र न बचे।

 

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